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लोकतंत्र के लिए निराशाजनक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 27 मई को बिहार और अन्य राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को बरकरार रखने का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

लोकतंत्र के लिए निराशाजनक फैसला
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 27 मई को बिहार और अन्य राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को बरकरार रखने का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि एसआईआर कराना चुनाव आयोग का अधिकार है और इससे मतदाता सूची को सही और पारदर्शी बनाए रखने में मदद मिलती है।

इस फैसले के बाद संविधान कुचलने और लोकतंत्र को हराने की भाजपा की कोशिश को बड़ी कामयाबी मिली है। भाजपा ने इसका इजहार भी कर दिया है। भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने इसे विपक्ष के लिए संवैधानिक हार बताया है। इस तरह जाहिर हो गया कि भाजपा और चुनाव आयोग एक टीम में हैं, अन्यथा इस फैसले में चुनाव आयोग की कार्रवाई को सही बताया गया है तो भाजपा उसकी खुशी क्यों मना रही है। सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्ष पर बेबुनियाद आरोप लगाते हुए कहा कि मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि एसआईआर के खिलाफ आरोप निराधार साबित हुए बल्कि मुद्दा इससे कहीं अधिक गंभीर है। उन्होंने कहा कि आज विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस पार्टी का चीन के साथ समझौता है, उनका परिवार इटली में है। उनकी विचारधारा का केंद्र इंग्लैंड और यूरोप में है, और प्रचार का केंद्र अमेरिकी संस्थान हैं और वोटों का प्रवाह बांग्लादेश से जुड़ा हुआ है।

जाहिर है एक बार फिर कांग्रेस और गांधी परिवार को निशाने पर लिया गया है, जबकि एसआईआर के खिलाफ टीएमसी, सपा, आरजेडी, डीएमके जैसे तमाम दल हैं। इन सबका एक ही तर्क है कि नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता और एसआईआर के जरिए ऐसा ही हो रहा है। पाठक जानते हैं कि आजादी के बाद जब संविधान बना और उसके तहत लोकतांत्रिक चुनाव करवाने की प्रक्रिया शुरु हुई तो नीति निर्माताओं का जोर इस बात पर था कि देश के हर वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार मिले, ताकि सही अर्थों में जनता अपने लिए सरकार चुन सके। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नागरिकों को चुनाव दर चुनाव मतदान के लिए जागरुक किया गया, चुनावों को लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व के तौर पर निरूपित किया गया। चुनाव आयोग की कोशिश रही कि जिन नागरिकों ने बतौर मतदाता अपना नाम दर्ज नहीं कराया है, उन तक पहुंचा जाए। क्योंकि एक भी नागरिक अगर मतदान के अधिकार से वंचित रहे तो यह लोकतंत्र की बड़ी हार होती। लेकिन एसआईआर के जरिए क्या इस लोकतंत्र को हराने की कोशिश हो रही है, ऐसी चिंता के साथ कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को लेकर याचिकाएं दाखिल की थीं।

ध्यान रहे कि पिछले साल बिहार से एसआईआर की शुरुआत की गई थी और तब सवाल उठे थे कि ठीक चुनाव के पहले ऐसी कवायद की क्या जरूरत है। अगर मतदाता सूची में गड़बड़ी थी तो क्या लोकसभा चुनाव के नतीजे अवैध कहे जा सकते हैं। क्या चुनाव आयोग के पास एसआईआर कराने का संवैधानिक अधिकार है? दस्तावेज जमा न कर पाने पर जो लाखों लोगों के नाम कटे हैं, क्या उन्हें अब नागरिकता के अधिकार से भी वंचित माना जाएगा। जिस तरह के दस्तावेज चुनाव आयोग ने मांगे, उस पर तो एनडीए के कई नेता भी असहज दिखे कि वो अपने मां-बाप का जन्म प्रमाण पत्र कहां से लाएं, या कैसे प्रवासी मजदूर अपने नागरिक होने का सबूत पेश करें, क्योंकि एसआईआर में आधार कार्ड को भी मान्य नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट में इन पर सुनवाई होती रही, लेकिन इस बीच, आयोग बिहार समेत कई राज्यों में एसआईआर करवा दिया, और उसी सूची से विधानसभा चुनाव भी संपन्न हो गए। कायदे से जब किसी विवादास्पद फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होती है, तो उसे अमल में लाने से रोका जाना चाहिए। मगर इस बार शायद भाजपा और चुनाव आयोग दोनों को यकीन था कि फैसला उनके पक्ष में ही आना है। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कई राज्यों में चुनाव इसी एसआईआर के आधार पर एक पक्षपातपूर्ण चुनाव आयोग द्वारा कराए गए थे, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे और यह प्रक्रिया पूरी तरह से अपारदर्शी थी। उन्होंने इसे न्यायपालिका के लिए काला दिन भी बताया। वहीं याचिकाकर्ताओं में एक योगेन्द्र यादव ने कहा कि इस मामले की दिशा पिछले साल अगस्त में ही तय हो गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को इस मामले पर पहले फैसला किए बिना और एसआईआर के बाद की सूचियों में साफ नजर आ रही खामियों को भी ठीक करने के लिए मजबूर किए बिना बिहार चुनाव जल्दबाजी में कराने की अनुमति दे दी थी। एक अन्य याचिका की सुनवाई के दौरान इस याचिका के ताबूत में आखिरी कील ठोंकी गई, जब एक माननीय न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि लाखों लोगों को, जिन्हें मतदान के अधिकार से वंचित किया गया है, चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे अगले चुनाव में मतदान कर सकते हैं।

योगेन्द्र यादव की इन बातों में गहरी निराशा दिख रही है, जो इस बात की परिचायक है कि जिस न्यायालय से अपेक्षा थी कि वह मताधिकार जैसे अहम मुद्दे पर संविधान के रक्षक की भूमिका सशक्त तरीके से अदा करेगा, वह पूरी नहीं हुई। गौरतलब है कि एसआईआर पर उठी आपत्तियों में सबसे अहम सवाल यही था कि क्या चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता सीमित दायरे में तय कर सकती है। इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयोग ऐसा कर सकता है, लेकिन सिर्फ यह तय करने के सीमित उद्देश्य से कि उस व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाए या नहीं। इससे उस शख्स की नागरिकता खत्म नहीं हो जाएगी। अदालत ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज संदिग्ध लगता है, तो चुनाव आयोग उसे मतदाता सूची में दर्ज करने से मना कर सकता है या कानून के अनुसार नाम हटाने की कार्रर्वाई कर सकता है।

अदालत ने कहा कि मतदाताओं से दस्तावेज मांगना नागरिकता की मौजूदा धारणा को खत्म करना नहीं है, बल्कि रिकॉर्ड की पुष्टि करने की एक प्रक्रिया है। जबकि याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि पहले से मतदाता सूची में शामिल लोगों पर दोबारा नागरिकता साबित करने का बोझ डालना कानून के खिलाफ है। वहीं अदालत ने कहा कि अगर आयोग किसी व्यक्ति की पात्रता को लेकर संतुष्ट नहीं होता, तो उसे उस व्यक्ति का मामला केंद्र सरकार के सक्षम अथॉरिटी को भेजना होगा। अब सोचने वाली बात यह है कि मतदाता सूची तैयार करने का काम आयोग के पास है लेकिन इस काम को सरकार के कर्मचारी अंजाम देते हैं। ऐसे में आम लोगों का पहला संघर्ष इस मतदाता सूची में बने रहने के लिए होगा।

कुल मिलाकर एसआईआर पर आए शीर्ष अदालत के फैसले से चुनाव आयोग और भाजपा को खुशी हुई होगी, लेकिन लोकतंत्र के लिए यह निराशाजनक फैसला है। इस फैसले से बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मुद्दे पर आए फैसले की कड़वी याद ताजा हो गई।


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