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त्योहारी सीजन में दुकानदारों को बड़ी राहत: दिवाली तक नहीं लगेगा यूपीआई पर चार्ज; सरकार ने क्यों लिया फैसला?

दिवाली और अन्य त्योहारों के दौरान बाजारों में खरीदारी बढ़ जाती है। ऐसे समय में दुकानदारों के लिए भुगतान से जुड़ी अतिरिक्त लागत बढ़ना कारोबार पर दबाव डाल सकता है। व्यापारी संगठनों और फिनटेक कंपनियों की ओर से प्रस्तावित शुल्क को लेकर आपत्तियां जताए जाने की खबरें भी सामने आई थीं।

त्योहारी सीजन में दुकानदारों को बड़ी राहत: दिवाली तक नहीं लगेगा यूपीआई पर चार्ज; सरकार ने क्यों लिया फैसला?
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नई दिल्ली: त्योहारी सीजन में दुकानदारों और कारोबारियों को राहत देते हुए यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के कुछ चुनिंदा लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने का फैसला फिलहाल टाल दिया गया है। पहले चर्चा थी कि 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ यूपीआई भुगतानों पर 0.4 फीसदी तक शुल्क लगाया जा सकता है। हालांकि, अब इस व्यवस्था को दिवाली तक के लिए टाल दिया गया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की ओर से मंगलवार, 13 अक्टूबर को जारी सूचना में इसकी पुष्टि की गई। इससे कारोबारियों को त्योहार के दौरान अतिरिक्त भुगतान लागत से फिलहाल राहत मिलेगी।

दिवाली के बाद लागू होगा शुल्क

एनपीसीआई की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी ने चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (पीटूएम) लेनदेन पर एमडीआर लागू करने का फैसला दिवाली के तुरंत बाद तक टाल दिया है। इसका मतलब है कि निर्धारित श्रेणियों के लेनदेन पर फिलहाल यह शुल्क नहीं लगेगा। हालांकि, शुल्क किस तारीख से लागू होगा, इस बारे में अभी कोई अंतिम तारीख घोषित नहीं की गई है। एनपीसीआई ने कहा है कि इसकी जानकारी अलग से दी जाएगी। ऐसे में कारोबारियों और डिजिटल भुगतान सेवाएं देने वाली कंपनियों को नए नियमों की औपचारिक घोषणा का इंतजार करना होगा। गौरतलब है कि हाल के दिनों में 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.4 फीसदी एमडीआर लगाए जाने की खबरें सामने आई थीं। इससे व्यापारियों के बीच अतिरिक्त लागत को लेकर चिंता बढ़ गई थी। अब समयसीमा टलने से उन्हें त्योहार के दौरान राहत मिलने की उम्मीद है।

क्या होता है एमडीआर और किस पर पड़ता है असर?

एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है, जो दुकानदार या कारोबारी से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले लिया जाता है। भुगतान व्यवस्था के नियमों के अनुसार, यह राशि बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता या संबंधित भुगतान नेटवर्क से जुड़ी कंपनियों को मिल सकती है। यदि किसी लेनदेन पर एमडीआर लागू होता है, तो व्यापारी को भुगतान की कुल राशि में से निर्धारित शुल्क देना पड़ सकता है। इसका असर कारोबार की लागत पर पड़ता है। हालांकि, वास्तविक शुल्क लेनदेन की श्रेणी और लागू नियमों पर निर्भर करेगा। यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि फिलहाल घोषित राहत चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट लेनदेन से संबंधित है। इसलिए इसे सभी यूपीआई भुगतानों पर लागू होने वाले किसी एक समान शुल्क के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

त्योहारी खरीदारी के बीच क्यों टाला गया फैसला?

दिवाली और अन्य त्योहारों के दौरान बाजारों में खरीदारी बढ़ जाती है। ऐसे समय में दुकानदारों के लिए भुगतान से जुड़ी अतिरिक्त लागत बढ़ना कारोबार पर दबाव डाल सकता है। व्यापारी संगठनों और फिनटेक कंपनियों की ओर से प्रस्तावित शुल्क को लेकर आपत्तियां जताए जाने की खबरें भी सामने आई थीं। व्यापारियों की चिंता थी कि अतिरिक्त लागत का असर उनके मुनाफे पर पड़ सकता है। यह आशंका भी जताई गई कि कुछ कारोबारी इस खर्च की भरपाई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के जरिये करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में ग्राहकों पर अप्रत्यक्ष बोझ पड़ने की संभावना रहती है। त्योहारी मांग को देखते हुए शुल्क लागू करने की समयसीमा आगे बढ़ाने से कारोबारियों को अपनी व्यवस्था तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भविष्य में लागू होने वाला शुल्क वस्तुओं की कीमतों या ग्राहकों के भुगतान व्यवहार को किस हद तक प्रभावित करेगा।

कार्ड और यूपीआई भुगतान में बड़ा अंतर

कार्ड से भुगतान और यूपीआई के जरिये लेनदेन की व्यवस्था में कई अंतर हैं। कार्ड भुगतान के लिए इस्तेमाल होने वाले टर्मिनल्स और उनसे जुड़े नियम अपेक्षाकृत स्थापित हैं, जबकि यूपीआई का इस्तेमाल छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और ग्रामीण क्षेत्रों के कारोबारियों तक फैला हुआ है। यूपीआई के व्यापक इस्तेमाल के कारण इस पर किसी भी नए शुल्क को लागू करने से पहले अलग-अलग कारोबारी श्रेणियों और लेनदेन की प्रकृति को ध्यान में रखना जरूरी है। इसी वजह से प्रस्तावित एमडीआर व्यवस्था को लेकर बाजार में चर्चा और विरोध देखने को मिला। फिलहाल एनपीसीआई ने शुल्क लागू करने का फैसला दिवाली के बाद तक टाल दिया है। अब कारोबारियों और भुगतान उद्योग की नजर इस बात पर रहेगी कि नई व्यवस्था की अंतिम तारीख क्या तय होती है और किन लेनदेन पर यह लागू होगी।


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