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'प्रक्रिया ही सजा बन जाती है', उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने पर बोले चिदंबरम

दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में न्यायिक हिरासत में बंद आरोपी उमर खालिद को अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया है

प्रक्रिया ही सजा बन जाती है, उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने पर बोले चिदंबरम
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नई दिल्ली। दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में न्यायिक हिरासत में बंद आरोपी उमर खालिद को अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। उमर खालिद ने अपने दिवंगत मामा के चेहलुम में शामिल होने और बीमार मां की देखभाल के लिए 15 दिनों की अंतरिम जमानत मांगी थी। इस पर कांग्रेस नेता और देश के पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रतिक्रिया दी है।

चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उमर खालिद को एक बार फिर जमानत देने से इनकार कर दिया गया है — यहां तक कि अपनी मां की निर्धारित मेडिकल प्रक्रिया में सहायता करने के लिए 15 दिनों की अंतरिम जमानत भी नहीं दी गई।

उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर का सिद्धांत 1977 में स्थापित किया गया था। शायद अब वह केवल कानून की किताबों में ही मिलता है और वास्तविक मामलों तथा वास्तविक आरोपियों पर लागू नहीं माना जाता। ट्रायल कोर्ट्स मानो यह सोचते हैं कि “हम पुलिस की बात मानकर आरोपी को जेल भेज देंगे और आरोपी उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय से जमानत हासिल कर ले।”

उन्होंने कहा कि यह अपने कर्तव्य से पीछे हटना है। यदि ट्रायल कोर्ट्स अपना काम करें और कानून को सही ढंग से लागू करें, तो उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय पर बोझ काफी कम हो जाएगा। और हजारों अंडरट्रायल कैदी बिना आरोप तय हुए, बिना मुकदमा चले और बिना सजा पाए जेलों में यूं ही नहीं सड़ेंगे। सही ही कहा गया है कि “प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।”

दरअसल, उमर खालिद ने अदालत से कहा था कि उनके परिवार में पिता, मां और पांच बहनें हैं, लेकिन उनके 71 वर्षीय पिता मां की देखभाल करने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी चार बहनें शादीशुदा हैं और अलग-अलग जगहों पर रहती हैं। ऐसे में परिवार के सबसे बड़े और इकलौते बेटे होने के नाते वही अपनी मां की सर्जरी से पहले और बाद में देखभाल कर सकते हैं।

याचिका में यह भी कहा गया कि उमर खालिद को पहले भी कई बार अंतरिम जमानत मिल चुकी है। हर बार उन्होंने अदालत की सभी शर्तों का पालन किया और समय पर सरेंडर किया।

बचाव पक्ष ने दलील दी कि अदालत ने सह-आरोपी तस्लीम अहमद, शिफा उर रहमान और अथर खान को भी पारिवारिक बीमारी जैसे आधारों पर अंतरिम जमानत दी थी, इसलिए समानता के आधार पर उमर खालिद को भी राहत मिलनी चाहिए।

वहीं, विशेष लोक अभियोजक ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी अदालत की नरमी का गलत फायदा उठा रहा है। अभियोजन पक्ष ने कहा कि पहले जिन कारणों को उचित माना गया था, उन आधारों पर जमानत दी गई थी, लेकिन इस बार दिए गए कारण पर्याप्त नहीं हैं।


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