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सिंडिकेट बैंक घोटाला: ईडी को बड़ी सफलता, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 5 दोषी, 3 साल की सजा

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के लखनऊ जोनल कार्यालय को मनी लॉन्ड्रिंग के एक बड़े मामले में बड़ी सफलता मिली है। गाजियाबाद के विशेष न्यायाधीश ने 3 नवंबर 2026 को केस नंबर 5/23 में अपना फैसला सुनाते हुए वी.एन. माथुर, राजीव कुमार, अरविंद चौधरी, अंकित चौधरी और प्रमोद कुमार को दोषी ठहराया है

सिंडिकेट बैंक घोटाला: ईडी को बड़ी सफलता, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 5 दोषी, 3 साल की सजा
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लखनऊ। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के लखनऊ जोनल कार्यालय को मनी लॉन्ड्रिंग के एक बड़े मामले में बड़ी सफलता मिली है। गाजियाबाद के विशेष न्यायाधीश ने 3 नवंबर 2026 को केस नंबर 5/23 में अपना फैसला सुनाते हुए वी.एन. माथुर, राजीव कुमार, अरविंद चौधरी, अंकित चौधरी और प्रमोद कुमार को दोषी ठहराया है। यह अपराध प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002 की धारा 3 के तहत आता है, जिसके लिए धारा 4 के अंतर्गत सजा का प्रावधान है।

कोर्ट ने प्रत्येक आरोपी को 3 साल के कठोर कारावास और 50,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है। यदि जुर्माना नहीं भरा जाता है, तो इसके बदले 3 महीने की साधारण जेल की सजा काटनी होगी। इस फैसले के बाद ईडी ने इसे जांच एजेंसी के लिए एक अहम जीत बताया है।

ईडी ने अपनी जांच की शुरुआत केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), एसीबी गाजियाबाद द्वारा दर्ज की गई दो एफआईआर के आधार पर की थी, जो सिंडिकेट बैंक के मुख्य सतर्कता अधिकारी की शिकायत पर दर्ज की गई थीं। मुख्य अपराध के मामले में गाजियाबाद की सीबीआई कोर्ट नंबर 2 के विशेष न्यायाधीश ने तत्कालीन शाखा प्रबंधक वी.एन. माथुर को आईपीसी और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 के प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया, जबकि राजीव कुमार और प्रमोद कुमार को बरी कर दिया था।

भले ही राजीव कुमार और प्रमोद कुमार को मुख्य अपराध के मामले में बरी कर दिया गया था, लेकिन अब प्रवर्तन निदेशालय द्वारा पेश किए गए सबूतों और दस्तावेजों के आधार पर उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है।

ईडी की जांच से पता चला है कि 2006-07 के दौरान सिंडिकेट बैंक की गजरौला शाखा के प्रबंधक वी.एन. माथुर ने स्वर्गीय नरेंद्र सिंह, अरविंद चौधरी और अन्य लोगों के साथ मिलकर एक आपराधिक साजिश रची थी। इस साजिश के तहत उन्होंने फर्जी बिक्री विलेखों, झूठे 'नॉन-इनकम्ब्रेन्स सर्टिफिकेट' यानी संपत्ति पर कोई भार न होने के प्रमाण पत्र और गलत मूल्यांकन रिपोर्टों के आधार पर इन लोगों, उनकी फर्मों और सहयोगियों को लोन और ओवरड्राफ्ट लिमिट मंजूर कर दीं।


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