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सुपरपावर अमेरिका को घुटने टेकने पड़े : कासिम रसूल इलियास

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता कासिम रसूल इलियास ने अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर को लेकर कहा कि ईरान के आगे सुपरपावर अमेरिका को घुटने टेकने पड़े

सुपरपावर अमेरिका को घुटने टेकने पड़े : कासिम रसूल इलियास
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नई दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता कासिम रसूल इलियास ने अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर को लेकर कहा कि ईरान के आगे सुपरपावर अमेरिका को घुटने टेकने पड़े। नई दिल्ली में आईएएनएस से बातचीत में कासिम रसूल इलियास ने कहा कि सीजफायर का फैसला काफी सही समय पर लिया गया है।

उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच तनाव से सिर्फ ये तीन देश ही नहीं, बल्कि पूरी वेस्ट एशिया और दुनिया प्रभावित हो रही थी, इसलिए अब राहत की सांस ली जा सकती है। यकीनन ईरान की फतह हुई है। ईरान एक कमजोर मुल्क था, उसके मुकाबले में एक सुपर पावर देश खड़ा था, लेकिन सुपर पावर को घुटने टेकने पड़े। इजरायल अमेरिका के बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। बुनियादी तौर पर इजरायल ने ही अमेरिका को इस जंग के अंदर खींचा है।

इलियास ने कहा कि यह जंग ईरान पर थोपी गई थी। अगर इस नजर से देखें तो अमेरिका अपने मकसद में सफल नहीं रहा। सत्ता परिवर्तन की जो कोशिश की जा रही थी, वह कामयाब नहीं हुई, बल्कि ईरान और मजबूती से खड़ा हो गया। कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ रहे थे। चीजें मिल भी नहीं रही थीं। होर्मुज के खुलने से बेहतर नतीजे सामने आएंगे।

उन्होंने कहा कि वो शर्तें बहुत मुनासिब हैं। मसला सिर्फ एक-दो दिन का नहीं है। इससे पहले भी 10 दिन की जंग हुई थी। अब भी ये जंग हुई। ईरान ये चाहता है कि कोई बात फाइनल तय होनी चाहिए कि आप इस तरह की जंग नहीं करेंगे। दूसरी बात ये कि जो न्यूक्लियर एनरिचमेंट हो रहा है, यूरेनियम का वो जारी रहेगा। ये शर्तों में भी शामिल है। तीसरी चीज ये है कि आगे होर्मुज से जो जहाज जाएंगे, वो नियमों का पालन करेंगे।

इलियास ने सीजफायर को लेकर कहा कि इस संघर्ष में पाकिस्तान की भूमिका कितनी आगे बढ़ गई है। आज जो बातचीत हो रही है, जिसमें अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत की मेज पर आए हैं, वह पाकिस्तान के प्रयासों की वजह से ही संभव हो पाई है। शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर ने इस दिशा में प्रयास किए। यह काम भारत भी कर सकता था। भारत ने अवसर खो दिया।

महिला आरक्षण बिल पर उन्होंने कहा कि महिलाओं की तरफ से यह बहुत पुरानी लंबित मांग है। जाहिर है कि लोकतंत्र के अंदर, अगर हम अपनी आबादी का अनुपात देखें, तो लगभग देश में 50 फीसदी महिलाएं हैं तो उनका कम से कम 50 फीसदी प्रतिनिधित्व संसद और विधानसभा में होना चाहिए। लेकिन, अभी जो बिल आया है, उसमें 33 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है, जो कम है, फिर भी हम कह सकते हैं कि कुछ नहीं से बेहतर है कि उन्हें हिस्सा मिले।


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