कहां गुम हो गया वो भारत
सरकार तो अपने दायित्व से पूरी तरह चूक गई है, लेकिन समाज भी क्या खुद को राजनीति के मंच की तरह इस्तेमाल होने देगा, ये भारत की आम जनता को सोचना होगा

- सर्वमित्रा सुरजन
सरकार तो अपने दायित्व से पूरी तरह चूक गई है, लेकिन समाज भी क्या खुद को राजनीति के मंच की तरह इस्तेमाल होने देगा, ये भारत की आम जनता को सोचना होगा। कुछ साल पहले तक ईद और दीवाली दोनों की खुशियां एक जैसी देश भर में पसरी होती थीं और नागरिकों के बीच आपसी हेलमेल खुलकर नजर आता था। अब वो भारत कहां गुम हो गया है।
मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी,
अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं।
न मालूम ये पंक्तियां किसने लिखी हैं, लेकिन आज के माहौल में यह बिल्कुल सटीक बैठती हैं। हालांकि ईद के मुबारक मौके पर ऐसी पंक्तियां साझा करते हुए दुख भी हो रहा है, लेकिन हकीकत से मुंह चुरा कर हम कहां जाएंगे। त्योहार शब्द के साथ खुशी शब्द चस्पां हुआ करती थी, लेकिन बीते 12 सालों में अब त्योहार की परिभाषा और मायने भी बदले जा चुके हैं। जिन के पास धन-संपत्ति है, समाज में ताकत है, उनके लिए सारे त्योहार खुशियां लेकर आते हैं। लेकिन साधारण लोगों के लिए परेशानियां और तनाव त्योहार के सहउत्पाद (बायप्रोडक्ट) की तरह साथ चले आते हैं। उस पर भी अगर अल्पसंख्यकों के त्योहारों का वक्त आए, तो तनाव की रेखा कुछ ज्यादा गहरी और लंबी हो जाती है।
बहुसंख्यक हिंदुओं को मोदी शासनकाल में यही पाठ पढ़ा दिया गया है कि अपने त्योहार की खुशी भी आप तभी सही तरीके से मनाएंगे, जब अल्पसंख्यकों को परेशान करेंगे। इसलिए होली हो या दीवाली, रामनवमी हो या हनुमान जयंती, मुसलमानों और ईसाइयों को चिढ़ाना कुछ लोगों ने अपना सच्चा धर्म बना लिया है। मंदिर में भजन-कीर्तन की जगह मस्जिदों या चर्चों के सामने ढोल बजाकर गाने-बजाने से ही भगवान सुनेंगे, ऐसा इन्हें लगता है। और जब मौका ईद या क्रिसमस का आए, तो अल्पसंख्यकों को उनकी हदों में रहकर त्योहार मनाने की चेतावनी दी जाती है, मानो ये देश उनका नहीं है।
अभी क्रिसमस पर ही देश ने देखा है कि प्रधानमंत्री मोदी तो दिल्ली में चर्च जाकर बधाई दे रहे हैं, लेकिन मोदी को आदर्श मानने वाले लोगों ने देश के कई हिस्सों में चर्च में तोड़-फोड़ की या चर्च परिसर में बैठकर हनुमानचालीसा का पाठ किया। हैरानी की बात ये है कि ऐसा करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की खबर भी पूरी नहीं आती है। दिखाने को एकाध एफआईआर दर्ज हो भी जाए, तो आगे उन्हें सजा मिली या नहीं, ये कभी पता नहीं चलता। बाकी अल्पसंख्यकों को तो बिना कसूर के भी सजा देने का काम पुलिस से पहले उन्मादी भीड़ कर ही लेती है। कभी गो मांस के शक में, कभी गोतस्करी के शक में जो भीड़ द्वारा हत्याएं की गई हैं, वो इसका उदाहरण है। भीड़ तो उन्माद से संचालित हो जाती है, मगर ज्यादा दुख ये देखकर होता है कि अब अक्सर प्रशासन भी इसी तरह का उन्मादी व्यवहार दिखाने लगा है। कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश में कुछ मुसलमानों को महज इसलिए कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा क्योंकि वे खाली घर में नमाज पढ़ रहे थे। कई बार खुले में नमाज पढ़ने को लेकर भी मुसलमानों को चेतावनी दी जा चुकी है। जबकि पांच वक्त की नमाज के पाबंद लोग अगर घर पर या मस्जिद के पास न हुए, तो किसी खाली जगह को देखकर कुछ मिनटों की नमाज पढ़ लें तो उसमें कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। जब एयरपोर्ट पर गरबा हो सकता है, या क्लबों में भजन हो सकते हैं, तो नमाज क्यों नहीं पढ़ी जा सकती। लेकिन धर्म को खतरा बताकर जिस तरह लोगों के दिल-दिमाग पर ताले लगा दिए गए हैं, उसके बाद किसी भी समझदारी की उम्मीद करना बेमानी हो चुका है।
हाल ही में उत्तरप्रदेश के संभल में मस्जिद में नमाजियों की संख्या 20 तक सीमित करने का आदेश प्रशासन ने दिया। यहां अच्छी बात यह रही कि इस आदेश को रद्द करते हुए जिलाधिकारी और एसपी को कड़ी फटकार लगाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है, और अगर अधिकारी इसे नहीं संभाल सकते तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए या ट्रांसफर करवा लेना चाहिए। काश कि अदालतें ऐसी ही सख्ती धर्मांधता को बढ़ावा देने वाले तमाम प्रकरणों पर ले तब शायद समाज का माहौल थोड़ा सुधरे। क्योंकि समाज में नफरत किस कदर फैल चुकी है, इसके कुछ भयावह उदाहरण रमजान में ही देखने मिले। पुणे में रोज़ा तोड़ रहे मुस्लिम युवकों के एक समूह पर भीड़ ने हमला किया, जिसमें कम से कम पांच लोग घायल हो गए। बिहार के मधुबनी जिले में एक मुस्लिम महिला, रोशन खातून को कथित तौर पर एक स्थानीय नेता से शिकायत करने के बाद भीड़ ने खंभे से बांधकर पीटा, जिसके बाद उसकी मौत हो गई। आरोप है कि उसे पानी मांगने पर पेशाब पीने के लिए मजबूर किया गया। इस खबर को सुनकर ही दिल भीतर तक दहल गया कि आखिर दूसरे धर्म से नफरत करने में क्या अब हिंदुओं को रक्तपिपासु राक्षसों में तब्दील कर दिया गया है। एक घटना पंजाब के लुधियाना से सामने आई, जहां एक निजी विश्वविद्यालय में कश्मीरी मुस्लिम छात्रों ने शिकायत की कि उन्हें सहरी के लिए बासी/ठंडा खाना और इफ्तारी के लिए खजूर की जगह केला दिया गया। विरोध करने पर उन्हें कथित तौर पर धमकाया गया। वाराणसी में गंगा नदी में नाव पर इफ्तार करने के दौरान चिकन बिरयानी खाने और हड्डियां नदी में डालने की शिकायत पर पुलिस ने 14 लोगों को गिरफ्तार किया है। हालांकि इस मामले में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद, बनारस के संयुक्त सचिव एसएम यासीन का कहना है कि कुछ जाहिल नाव पर रोजा इफ्तार कर रहे थे। इस्लाम में इसके लिए कहीं जगह नहीं है। इफ्तार एक शुद्ध धार्मिक कार्य है। यह कोई सैर या पिकनिक नहीं है। इफ्तार के बाद तुरंत मगरिब की नमाज जरूरी है। इन जाहिलों को इनके घरवालों ने क्या सिखाया है? इस्लाम को बदनाम करने का मौका दिया है। इस कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए कम है।
गंगा नदी पर इफ्तार के इस प्रकरण पर अब पुलिस जांच कर रही है और दोषियों को कानून के हिसाब से ही सजा मिलनी भी चाहिए। लेकिन इसे सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के मौके की तरह इस्तेमाल करना गलत होगा। जिस तरह से एस एम यासीन ने इस घटना की निंदा की है, वैसा ही व्यवहार तमाम हिंदू धर्मगुरुओं से भी अपेक्षित है कि वे अपने ओहदे का इस्तेमाल धर्म की सही सीख देने में करें और धर्म की आड़ लेकर जो लोग कानून हाथ में लेते हैं और अल्पसंख्यकों को धमकाते हैं, उनकी निंदा करें।
वैसे इस मामले में सबसे बड़ी अपेक्षा तो सरकार से ही है, क्योंकि देश चलाने का जिम्मा उसी पर है। मगर मोदी सरकार कम से कम इस मामले में पूरी तरह पथभ्रष्ट है। भारत में सांप्रदायिक नफरत के आंतरिक मामले हों या विदेशों की घटनाएं, सरकार बड़े सुविधाजनक तरीके से अपना पक्ष चुन रही है, जो ठीक नहीं है।
अफगानिस्तान के एक नशामुक्ति वाले अस्पताल पर पाकिस्तान ने हमला किया, जिसमें कम से कम 4 सौ लोग मारे गए। इस घटना पर कुछ ही घंटों में मोदी सरकार ने प्रतिक्रिया दी और इसे अफगानिस्तान की संप्रभुता पर हमला बताया। अस्पताल पर हमले को युद्धविरोधी काम कहा और साथ ही याद दिलाया कि रमजान के पवित्र माह में यह हिंसा की गई है। लेकिन इसी मोदी सरकार को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत कई लोगों की हत्या पर प्रतिक्रिया देने में कई दिन लग गए। बल्कि नरेन्द्र मोदी ने तो अब तक खामेनेई की मौत पर शोक का एक शब्द भी नहीं कहा है। ईरान पर इजरायल और अमेरिका ने रमजान के मौके पर ही युद्ध छेड़ा था, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने उस पर भी कुछ नहीं कहा। मंगलवार को ईरान की सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी की हत्या की गई, मोदी फिर भी चुप रहे। दूसरी तरफ उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से बात की और उन्हें ईद की अग्रिम शुभकामनाएं दीं। इसके साथ ही यूएई में युद्ध में मारे गए नागरिकों के लिए शोकसंवेदना प्रकट कर हमलों को गलत बताया। हालांकि आम नागरिकों की जान ईरान में भी जा रही है और फिलीस्तीन में भी। बल्कि युद्ध पीड़ित इन देशों में ईद की सारी खुशियां बारूदी गंध की चपेट में आ चुकी हैं। अपनों की कब्र खोदते हुए लोग किस तरह ईद की मुबारकबाद का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इस बेहद बुरे दौर में अगर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेश नीति में चयनित संवेदनशीलता नहीं दिखाते और भारत के पुराने रसूख का इस्तेमाल करके हर तरह के युद्ध को रुकवाने की पहल करते, तब तो वाकई ईद की खुशियां दिल से जाहिर होतीं।
बहरहाल, सरकार तो अपने दायित्व से पूरी तरह चूक गई है, लेकिन समाज भी क्या खुद को राजनीति के मंच की तरह इस्तेमाल होने देगा, ये भारत की आम जनता को सोचना होगा। कुछ साल पहले तक ईद और दीवाली दोनों की खुशियां एक जैसी देश भर में पसरी होती थीं और नागरिकों के बीच आपसी हेलमेल खुलकर नजर आता था। अब वो भारत कहां गुम हो गया है, ये समाज को सोचना होगा।


