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आतंकवाद के खिलाफ नीति में आया बड़ा बदलाव, लेकिन कश्मीर में चुनौतियां बरकरार: अर्थशास्त्री

आज ही के दिन 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम के बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले की बरसी पर उस घटना को याद किया जा रहा है

आतंकवाद के खिलाफ नीति में आया बड़ा बदलाव, लेकिन कश्मीर में चुनौतियां बरकरार: अर्थशास्त्री
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नई दिल्ली। आज ही के दिन 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम के बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले की बरसी पर उस घटना को याद किया जा रहा है, जिसमें आतंकियों ने धर्म पूछकर 26 से ज्यादा निर्दोष पर्यटकों की हत्या कर दी थी और कई अन्य को घायल किया था। इस घटना को लेकर अर्थशास्त्री और जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कई अहम बातें कही हैं।

हसीब द्राबू ने कहा कि इस घटना के बाद भारत की आतंकवाद विरोधी नीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। उन्होंने कहा कि अब किसी भी आतंकी हमले के बाद कार्रवाई के लिए पहले की तरह लंबी प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती, बल्कि सीधे और सख्त कदम उठाए जाते हैं। यह बदलाव एक 'डॉक्ट्रिनल शिफ्ट' यानी नीति स्तर पर बड़ा बदलाव है।

द्राबू ने आगे कहा कि बदलाव सिर्फ सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की सोच में भी बड़ा परिवर्तन आया है। आजकल कई फिल्में और जनमत ऐसे हैं जो सरकार की आतंकवाद विरोधी नीतियों का समर्थन करते नजर आते हैं। भले ही कुछ लोग इन्हें प्रचार कहें, लेकिन यह एक व्यापक राष्ट्रीय सोच को दर्शाता है।

उन्होंने बताया कि पहले ऐसा माहौल नहीं था, लेकिन अब देश और समाज दोनों स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता बढ़ी है, जो एक महत्वपूर्ण बदलाव है।

हालांकि, कश्मीर के हालात को लेकर द्राबू ने कहा कि जमीनी स्तर पर ज्यादा बदलाव नहीं दिखा है। सुरक्षा जरूर मजबूत हुई है, लेकिन ऐसे हमलों को पूरी तरह रोक पाना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि पिछले साल पर्यटन के लिहाज से काफी खराब रहा और इस साल भी स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं दिख रहा है।

द्राबू ने कहा कि ट्यूलिप सीजन, जो आमतौर पर पर्यटन का बड़ा आकर्षण होता है, इस बार अपेक्षा से काफी कमजोर रहा। इससे स्थानीय लोगों की आजीविका पर असर पड़ा है और पर्यटन कारोबार को नुकसान हुआ है।

द्राबू ने कहा कि पर्यटन में गिरावट का असर सिर्फ आय तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सामाजिक जुड़ाव भी कमजोर हुआ है। जब पर्यटक कश्मीर आते हैं, तो वे केवल पैसा ही नहीं लाते, बल्कि देश के अन्य हिस्सों के साथ रिश्ते और समझ भी बढ़ाते हैं।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कश्मीर की अर्थव्यवस्था में पर्यटन का योगदान 8 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है, इसलिए यह पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका नहीं है, लेकिन सामाजिक स्तर पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण है।

उन्होंने आगे कहा कि 2019 में जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक ढांचे में बदलाव के बाद विकास, निवेश और रोजगार बढ़ने के वादे किए गए थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अर्थव्यवस्था अपेक्षा के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई है।

अर्थशास्त्री ने कहा कि अब सरकार को इन वादों की समीक्षा करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है, ताकि अर्थव्यवस्था को गति दी जा सके और लोगों को रोजगार व बेहतर जीवन मिल सके।

उन्होंने यह भी बताया कि वैश्विक परिस्थितियों, जैसे टैरिफ युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर भी जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। खासकर सेब उद्योग जैसे क्षेत्रों को नुकसान हुआ है, जिससे बड़ी आबादी प्रभावित होती है।

द्राबू ने कहा कि कश्मीर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहा है, लेकिन पूरी तरह से हालात ठीक होने यानी 'हीलिंग' में अभी समय लगेगा। समाज को स्थिरता और भरोसा लौटाने के लिए सरकार को लोगों के साथ संवाद बढ़ाना होगा और राहत के कदम उठाने होंगे।


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