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मक्का समझौते जैसे पहचान-आधारित गठबंधन लंबे समय तक टिकने की संभावना कम : विश्लेषण

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए मक्का समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं, लेकिन रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि केवल धार्मिक या पहचान-आधारित गठबंधन लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होते। उनका कहना है कि किसी भी सफल गठबंधन की बुनियाद साझा सुरक्षा खतरे, स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य और सदस्य देशों की पारस्परिक प्रतिबद्धता होती है।

मक्का समझौते जैसे पहचान-आधारित गठबंधन लंबे समय तक टिकने की संभावना कम : विश्लेषण
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नई दिल्ली। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए मक्का समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं, लेकिन रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि केवल धार्मिक या पहचान-आधारित गठबंधन लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होते। उनका कहना है कि किसी भी सफल गठबंधन की बुनियाद साझा सुरक्षा खतरे, स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य और सदस्य देशों की पारस्परिक प्रतिबद्धता होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और यूरोपीय देशों का गठबंधन सोवियत संघ के साझा खतरे को रोकने के लिए बना था। सभी देशों के हित और खतरे समान थे, इसलिए वे गठबंधन की लागत और जिम्मेदारियां उठाने के लिए तैयार थे। इसके विपरीत, मक्का समझौते में शामिल पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये अलग-अलग क्षेत्रों से आते हैं और उनकी सुरक्षा चुनौतियां भी अलग हैं।

विश्लेषण में कहा गया है कि 7 अगस्त को मक्का में हुए इस समझौते को कुछ लोगों ने पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव बताया। तर्क दिया गया कि सऊदी अरब की आर्थिक ताकत, तुर्किये का रक्षा उद्योग और पाकिस्तान की सैन्य क्षमता मिलकर एक मजबूत धुरी बना सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञ सवाल उठाते हैं कि इन तीनों देशों का साझा सुरक्षा खतरा आखिर है क्या और किस स्थिति में एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है।

लेख में उदाहरण देते हुए कहा गया है कि यदि भारत के साथ तनाव की स्थिति में पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई का सामना करता है, तो क्या सऊदी अरब या तुर्किये उसकी सैन्य मदद करेंगे? इसी तरह यदि ईरान या हूती सऊदी अरब पर हमला करते हैं, तो क्या पाकिस्तान और तुर्किये सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेंगे? तुर्किये के मामले में भी उसका प्रमुख सुरक्षा मुद्दा कुर्द बलों से जुड़ा है, जिसमें पाकिस्तान या सऊदी अरब की भूमिका स्पष्ट नहीं है।

विश्लेषकों का कहना है कि केवल मुस्लिम पहचान साझा होने से अलग-अलग देशों के सुरक्षा हित एक जैसे नहीं हो जाते। इसका उदाहरण 2019 का कुआलालंपुर शिखर सम्मेलन भी है, जब पाकिस्तान और तुर्किये ने मलेशिया के साथ मिलकर मुस्लिम दुनिया में सऊदी नेतृत्व को चुनौती देने की कोशिश की थी। वहीं आज सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुस्लिम देश सूडान में अलग-अलग पक्षों का समर्थन कर रहे हैं।

लेख के अनुसार, मक्का समझौता पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों की प्रतिक्रिया के रूप में उभरा राजनीतिक समन्वय है, न कि दीर्घकालिक सुरक्षा व्यवस्था। इसमें तीनों देशों को जोड़ने वाली कोई व्यापक रणनीति या साझा रक्षा नीति दिखाई नहीं देती। फिलिस्तीन का मुद्दा साझा चिंता जरूर बताया जाता है, लेकिन फिलिस्तीन के समर्थन में सबसे सक्रिय ताकतें ईरान और हूती हैं, जिनके साथ सऊदी अरब के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं।

विश्लेषण में भारत की विदेश नीति का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत ने हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है और अपने सुरक्षा तथा आर्थिक हितों के आधार पर फैसले किए हैं। अमेरिका के साथ रक्षा और आर्थिक संबंध होने के बावजूद भारत ने क्यूबा, ईरान या चीन जैसे देशों के प्रति वाशिंगटन की नीतियों को स्वतः नहीं अपनाया।


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