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एनआईए के पीएफआई साजिश मामले में सुनवाई तेज, अदालत ने 29 जुलाई से ट्रायल शुरू करने का आदेश दिया

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के पूर्व चेयरमैन ई. अबूबकर और प्रतिबंधित संगठन के अन्य पदाधिकारियों के खिलाफ नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) के टेरर कॉन्स्पिरेसी केस में ट्रायल 29 जुलाई से शुरू होगा।

एनआईए के पीएफआई साजिश मामले में सुनवाई तेज, अदालत ने 29 जुलाई से ट्रायल शुरू करने का आदेश दिया
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नई दिल्ली। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के पूर्व चेयरमैन ई. अबूबकर और प्रतिबंधित संगठन के अन्य पदाधिकारियों के खिलाफ नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) के टेरर कॉन्स्पिरेसी केस में ट्रायल 29 जुलाई से शुरू होगा। दिल्ली की एक अदालत में उन्होंने शनिवार को खुद को बेगुनाह बताया।

पटियाला हाउस कोर्ट में स्पेशल एनआईए कोर्ट के सामने पेश हुए सभी 21 आरोपियों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया और ट्रायल का सामना करने का फैसला किया। कोर्ट ने इस मामले में ट्रायल शुरू करने के लिए 29 जुलाई की तारीख तय की है।

आरोपियों पर गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है। इनमें भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने, आपराधिक साजिश रचने और आतंकवाद से जुड़े अन्य अपराध शामिल हैं।

यह घटनाक्रम एडिशनल सेशन जज प्रशांत शर्मा द्वारा आरोपियों की डिस्चार्ज (आरोप हटाने की) अर्जियों को खारिज करने और उनके खिलाफ आरोप तय करने का निर्देश देने के एक महीने से अधिक समय बाद हुआ है। जज ने माना था कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से उनके खिलाफ 'गंभीर संदेह' पैदा होता है।

5 जून के अपने आदेश में, स्पेशल एनआईए कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में आरोपियों के दोषी या निर्दोष होने का निर्धारण करना आवश्यक नहीं है, बल्कि केवल यह पता लगाना है कि क्या रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री आरोपियों के खिलाफ गंभीर संदेह पैदा करती है।

कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि वास्तव में कोई आतंकवादी घटना नहीं हुई थी। कोर्ट ने कहा कि यूएपीए के तहत साजिश रचने, फंड जुटाने, भर्ती करने और हथियार प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने जैसे अपराधों के लिए आपराधिक दायित्व तय करने के लिए किसी आतंकवादी घटना का होना जरूरी नहीं है।

एनआईए के अनुसार, आरोपियों ने पीएफआई और उसकी राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद (एनईसी) के माध्यम से भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकने और 2047 तक या उससे पहले हिंसक तरीकों से शरिया कानून द्वारा शासित इस्लामिक खिलाफत स्थापित करने की साजिश रची।

आतंकवाद-रोधी एजेंसी ने दावा किया है कि इस साजिश में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और कट्टरपंथ की ओर ले जाना, विभिन्न राज्यों में हथियार प्रशिक्षण शिविर आयोजित करना, विभिन्न माध्यमों से फंड जुटाना, हथियार हासिल करने की कोशिश करना और कुछ आरोपियों द्वारा चरमपंथी गतिविधियों का समर्थन करना शामिल था।

आरोप तय करने का निर्देश देते हुए कोर्ट ने यूएपीए और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत अबूबकर, पीएफआई अध्यक्ष ओ.एम.ए. सलाम, उपाध्यक्ष ई.एम. अब्दुल रहीमन, महासचिव अनीस अहमद और संगठन के कई अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के खिलाफ पर्याप्त सामग्री पाई।

इस मामले में पीएफआई को भी आरोपी बनाया गया है। केंद्र सरकार ने सितंबर 2022 में यूएपीए के तहत पीएफआई पर प्रतिबंध लगा दिया था। एनआईए ने 22 सितंबर 2022 को अबूबकर को गिरफ्तार किया था और वह 6 अक्टूबर 2022 से न्यायिक हिरासत में हैं।

पिछले साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने एम्स दिल्ली के डॉक्टरों के पैनल की रिपोर्ट देखने के बाद उन्हें मेडिकल जमानत देने से इनकार कर दिया था।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि उस समय उन्हें मेडिकल आधार पर रिहा करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन अगर उनकी हालत बिगड़ती है तो उन्हें ट्रायल कोर्ट में राहत मांगने की छूट दी गई थी। शीर्ष अदालत ने हाउस अरेस्ट की उनकी वैकल्पिक याचिका भी खारिज कर दी थी।


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