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इच्छामृत्यु के बाद हरीश राणा को अंतिम विदाई, ग्रीन पार्क में नम आंखों के साथ हुआ अंतिम संस्कार

दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क इलाके में हुए अंतिम संस्कार के दौरान माहौल बेहद भावुक रहा। परिवार, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने नम आंखों से हरीश को अंतिम विदाई दी।

इच्छामृत्यु के बाद हरीश राणा को अंतिम विदाई, ग्रीन पार्क में नम आंखों के साथ हुआ अंतिम संस्कार
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नई दिल्‍ली: Harish Rana Funeral: इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति मिलने के बाद जीवन से विदा लेने वाले हरीश राणा का बुधवार को दिल्ली में अंतिम संस्कार किया गया। दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क इलाके में हुए अंतिम संस्कार के दौरान माहौल बेहद भावुक रहा। परिवार, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने नम आंखों से हरीश को अंतिम विदाई दी। लंबे समय तक चली पीड़ा और संघर्ष के बाद उनकी मृत्यु ने जहां परिवार को गहरा आघात दिया, वहीं एक तरह से उन्हें असहनीय कष्ट से मुक्ति मिलने की भावना भी दिखाई दी। डॉक्टर्स के मुताबिक परिवार ने हरीश के फेफड़े, दोनों किडनी और कॉर्निया दान किया है। इससे 6 लोगों को नया जीवन मिलने की उम्मीद है।

एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी


हरीश राणा की जिंदगी 2013 में एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी। उस समय वह महज 19 साल के थे और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र थे। अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन, अपनी बहन से मोबाइल फोन पर बात करते समय वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। इस हादसे ने उन्हें गहरे कोमा में पहुंचा दिया। इसके बाद हरीश कभी सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट सके। इसमें शरीर की कुछ मूल क्रियाएं चलती रहीं, लेकिन वह न बोल सकते थे, न चल सकते थे और न ही किसी तरह की सामान्य प्रतिक्रिया दे पाते थे।

13 साल तक मशीनों के सहारे जीवन


हादसे के बाद हरीश ने करीब 13 वर्षों तक जीवन और मौत के बीच संघर्ष किया। इस दौरान वह पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर रहे और मशीनों के सहारे उनकी सांसें चलती रहीं। परिजनों के अनुसार, कभी-कभी उनकी आंखें झपकती थीं, लेकिन वह किसी से संवाद नहीं कर पाते थे। उनकी स्थिति ऐसी थी कि वे अपने दर्द या भावनाएं भी व्यक्त नहीं कर सकते थे। यह लंबा समय न केवल हरीश के लिए, बल्कि उनके परिवार के लिए भी बेहद कठिन रहा।

परिवार की लंबी कानूनी और चिकित्सा लड़ाई


हरीश के माता-पिता ने अपने बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किया। देश के विभिन्न अस्पतालों में इलाज, विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह और हर नई उम्मीद को उन्होंने आजमाया। लेकिन जब कोई सुधार नहीं हुआ और हरीश की स्थिति स्थायी हो गई, तब परिवार ने एक कठिन निर्णय लिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और बेटे को “सम्मानजनक मुक्ति” देने की अनुमति मांगी। उनका कहना था कि हरीश का शरीर केवल जीवित है, लेकिन वह असहनीय पीड़ा में कैद हैं।

सुप्रीम कोर्ट से मिली इच्छामृत्यु की अनुमति


लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। इस फैसले के तहत डॉक्टरों को जीवनरक्षक उपकरणों को धीरे-धीरे हटाने और केवल पालीएटिव केयर (दर्द से राहत देने वाली चिकित्सा) देने की अनुमति दी गई। यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जाता है, जहां मरीज लंबे समय से असाध्य स्थिति में हो और उसके जीवन की गुणवत्ता पूरी तरह समाप्त हो चुकी हो।

एम्स में इलाज और अंतिम दिन


हरीश राणा को 14 मार्च को दिल्ली के एम्स (AIIMS) में भर्ती कराया गया था। इसके बाद डॉक्टरों की निगरानी में उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे हटाया गया। बीते दिनों में उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें खाना-पानी भी बंद कर दिया गया था। इस दौरान उन्हें केवल दर्द और मानसिक तकलीफ से राहत देने के लिए दवाएं दी जा रही थीं। डॉक्टरों ने सुनिश्चित किया कि इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें किसी प्रकार की अतिरिक्त पीड़ा न हो।

एक कठिन लेकिन भावनात्मक फैसला


हरीश के परिवार के लिए यह फैसला लेना बेहद कठिन था। एक ओर अपने बेटे को खोने का दर्द, तो दूसरी ओर उसे लंबे समय से झेल रहे कष्ट से मुक्त कराने की इच्छा इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था। परिवार के करीबियों के अनुसार, यह निर्णय किसी हार का नहीं, बल्कि बेटे के प्रति प्रेम और करुणा का प्रतीक था।

समाज और कानून के लिए एक अहम उदाहरण


हरीश राणा का मामला इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। यह घटना उन सवालों को फिर से सामने लाती है, जो जीवन की गुणवत्ता, मरीज की गरिमा और परिवार की पीड़ा से जुड़े हैं। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है, लेकिन हर मामला अपनी परिस्थितियों के आधार पर तय होता है।

नम आंखों के साथ विदाई


अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद लोगों ने हरीश को श्रद्धांजलि देते हुए उनके संघर्ष को याद किया। 13 वर्षों तक चले इस कठिन सफर के बाद, उनकी विदाई ने सभी को भावुक कर दिया। हरीश राणा की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस संघर्ष, पीड़ा और मानवीय संवेदना की कहानी है, जिसे उनका परिवार वर्षों तक जीता रहा।


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