घटिया दवाओं पर सरकार का सख्त रुख, अब एनएसक्यू पाए जाने पर तुरंत निलंबित होगा निर्माण लाइसेंस
देश में दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 'ड्रग्स रूल्स, 1945' में संशोधन का प्रस्ताव रखा है

नई दिल्ली। देश में दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 'ड्रग्स रूल्स, 1945' में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत अगर कोई दवा तय किए गए महत्वपूर्ण गुणवत्ता मानकों पर 'मानक गुणवत्ता वाली नहीं' यानी एनएसक्यू पाई जाती है, तो उसके निर्माण लाइसेंस को तुरंत निलंबित किया जा सकेगा।
इन प्रस्तावित संशोधनों का मकसद घटिया दवाओं का पता चलते ही नियामक अधिकारियों को तुरंत हस्तक्षेप करने, उनके निर्माण और वितरण को रोकने और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का है। मंत्रालय ने संशोधनों के मसौदे को सार्वजनिक परामर्श के लिए अधिसूचित कर दिया है। हितधारक और आम जनता भारत के राजपत्र में मसौदा नियमों के उपलब्ध होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर आपत्तियां और सुझाव भेज सकते हैं।
मौजूदा नियमों के तहत किसी निर्माण लाइसेंस को निलंबित या रद्द करने से पहले एक तय नियामक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसमें 'कारण बताओ नोटिस' जारी करना भी शामिल है। इस प्रक्रिया में समय लग सकता है, जिससे दवा को एनएसक्यू घोषित करने और उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के बीच अंतराल आ जाता है। इस दौरान वह दवा बाजार में बनी रह सकती है, जिससे जनस्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो सकता है और ऐसी दवाओं को वापस मंगाना भी मुश्किल हो जाता है।
इस समस्या को दूर करने के लिए मंत्रालय ने नया प्रावधान प्रस्तावित किया है। इसके अनुसार, अगर सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट में कोई दवा 'एसे', 'डिसोल्यूशन', 'संबंधित पदार्थों', 'अशुद्धियों' या 'स्टेरिलिटी' के मानकों पर एनएसक्यू पाई जाती है, तो केंद्रीय लाइसेंसिंग अनुमोदन प्राधिकरण या राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण उस दवा के निर्माण लाइसेंस को तुरंत निलंबित कर सकेंगे। ये मानक दवाओं की गुणवत्ता तय करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
प्रस्तावित संशोधन में निलंबन हटाने से पहले सुधारात्मक उपाय करना अनिवार्य किया गया है। निलंबन तब तक जारी रहेगा जब तक निर्माता गुणवत्ता में कमी के कारणों का पता लगाने के लिए प्रभावी 'रूट कॉज एनालिसिस' नहीं कर लेता और संबंधित लाइसेंसिंग अथॉरिटी की संतुष्टि के अनुसार उचित 'सुधारात्मक और निवारक कार्रवाई' यानी सीएपीए लागू नहीं कर देता। निलंबन तभी हटाया जा सकेगा जब आवश्यक उपाय लागू कर दिए जाएं और लाइसेंसिंग अथॉरिटी द्वारा उनका उचित सत्यापन कर लिया जाए।
नियामक समन्वय को मजबूत करने के लिए सरकारी विश्लेषक की टेस्ट रिपोर्ट से जुड़े 'फॉर्म 13' में भी संशोधन प्रस्तावित किया गया है। इस व्यवस्था के तहत सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया, संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की लाइसेंसिंग अथॉरिटी और संबंधित दवा के निर्माता और मार्केटर को भेजी जाएगी। इससे गुणवत्ता में कमी की जानकारी समय पर सभी तक पहुंचेगी और नियामक कार्रवाई में बेहतर समन्वय हो सकेगा।
ये प्रस्तावित संशोधन 20 दिसंबर 2024 को हुई ड्रग्स कंसल्टेटिव कमिटी की 65वीं बैठक और 24 अप्रैल 2025 को हुई ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड की 92वीं बैठक की सिफारिशों पर आधारित हैं। इससे दवाओं की बिक्री के बाद की नियामक निगरानी मजबूत होने, घटिया दवाओं के खिलाफ समय पर कार्रवाई होने और देश में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता पर जनता का भरोसा और मजबूत होने की उम्मीद है।


