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दिल्ली हाई कोर्ट ने विधवा की पारिवारिक पेंशन से वसूली रद्द की, ब्याज सहित वापसी का आदेश दिया

दिल्ली हाई कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को एक विधवा महिला से कथित तौर पर ज्यादा दी गई फैमिली पेंशन की वसूली करने से रोक दिया है

दिल्ली हाई कोर्ट ने विधवा की पारिवारिक पेंशन से वसूली रद्द की, ब्याज सहित वापसी का आदेश दिया
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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को एक विधवा महिला से कथित तौर पर ज्यादा दी गई फैमिली पेंशन की वसूली करने से रोक दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह अतिरिक्त भुगतान पेंशन प्रोसेसिंग में हुई बैंक की गलती की वजह से हुआ था, न कि महिला द्वारा गलत जानकारी देने या कोई तथ्य छिपाने के कारण।

न्यायमूर्ति संजीव नरूला की एकल पीठ ने इंदिरा नाम की महिला की याचिका स्वीकार करते हुए एसबीआई को निर्देश दिया कि उसकी फैमिली पेंशन से पहले काटी गई रकम 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ वापस की जाए। कोर्ट ने बैंक को भविष्य में किसी भी तरह की और वसूली करने से भी रोक दिया।

याचिकाकर्ता के पति दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के एसडीएम कार्यालय के चुनाव विभाग में अपर डिवीजन क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। जून 2003 में नौकरी के दौरान उनका निधन हो गया था।

पति की मृत्यु के बाद दिल्ली सरकार ने पेंशन भुगतान आदेश जारी कर महिला के लिए फैमिली पेंशन मंजूर की थी, जिसका भुगतान एसबीआई की कापसहेड़ा शाखा के जरिए किया जा रहा था। बाद में महिला ने देखा कि उनकी मासिक पेंशन में बड़ी कटौती की जा रही है। बैंक ने उन्हें बताया कि पेंशन रिकॉर्ड में 'गलत एन्हांस डेट' दर्ज होने की वजह से उन्हें कथित तौर पर 2.51 लाख रुपए से ज्यादा की अतिरिक्त पेंशन दे दी गई थी।

इसके बाद एसबीआई ने कथित अतिरिक्त भुगतान की दोबारा गणना की, जो करीब 3.60 लाख रुपए निकली। इसके बाद बैंक ने उनकी मासिक पेंशन से रकम काटना शुरू कर दिया।

याचिकाकर्ता ने इस वसूली को चुनौती देते हुए कहा कि उन्होंने न तो कोई गलत जानकारी दी थी और न ही अतिरिक्त भुगतान में उनकी कोई भूमिका थी। उन्होंने यह भी कहा कि बिना किसी पूर्व सूचना के उनकी पेंशन से एकतरफा तरीके से कटौती शुरू कर दी गई।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बैंक के रिकॉर्ड से साफ है कि ज्यादा भुगतान पेंशन प्रोसेसिंग में हुई गलती की वजह से हुआ था, न कि याचिकाकर्ता द्वारा किसी धोखाधड़ी या गलत जानकारी देने के कारण।

जस्टिस नरूला ने कहा, “रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता को पता था, या उसे पता होना चाहिए था, कि उसे उसके कानूनी अधिकार से ज्यादा रकम मिल रही थी।”

जज ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता एक फैमिली पेंशन पाने वाली महिला हैं और सॉफ्टवेयर या तारीखों से जुड़ी तकनीकी प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। ऐसे में उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे बैंक की अंदरूनी गणना में हुई गलतियों को समझ पातीं।

पेंशनभोगियों से अतिरिक्त भुगतान की वसूली से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला उस “सुरक्षा दायरे” में आता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों के लिए तय किया है, जहां वसूली से रिटायर्ड कर्मचारियों या पेंशनभोगियों को अनुचित परेशानी हो सकती है।

जस्टिस नरूला ने एसबीआई की इस बात पर भी आलोचना की कि बैंक ने याचिकाकर्ता को कथित अतिरिक्त भुगतान का पूरा विवरण और वसूली का तरीका बताए बिना ही उनकी पेंशन से रकम काटनी शुरू कर दी।

फैसले में कहा गया, “पेंशन से बिना पहले जानकारी दिए कटौती करना, और कटौती का कारण व तरीका न बताना, बुनियादी निष्पक्षता के खिलाफ है।”

दिल्ली हाई कोर्ट ने एसबीआई की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें बैंक ने 2004 में याचिकाकर्ता से साइन कराया गया वचनपत्र पेश किया था। इस वचनपत्र में अतिरिक्त भुगतान की रकम समायोजित करने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह पेंशन प्रक्रिया के दौरान लिया गया एक सामान्य दस्तावेज था और इसके आधार पर पेंशनभोगियों को सख्त वसूली कार्रवाई का सामना नहीं कराया जा सकता।

फैसले में कहा गया, “एसबीआई जिस सामान्य वचनपत्र का हवाला दे रहा है, वह फैमिली पेंशन शुरू होने के समय लिया गया था। ऐसे में केवल उसी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पेंशनभोगियों को दी गई कानूनी सुरक्षा को खत्म नहीं किया जा सकता।”

रिट याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस नरूला ने एसबीआई को निर्देश दिया कि वह आठ सप्ताह के भीतर पेंशन से काटी गई पूरी रकम वापस करे। कोर्ट ने कहा कि इस राशि पर हर कटौती की तारीख से लेकर भुगतान की तारीख तक 6 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज भी दिया जाए।


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