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राघव चड्ढा ने नहीं, संदीप पाठक ने दी केजरीवाल को सबसे बड़ी चोट! AAP की चुनावी मशीनरी के असली दिमाग तो वही थे
2022 के बाद संदीप पाठक AAP के संगठन के सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरे। डेटा, सर्वे और चुनावी रणनीति में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि उन्हें पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाने लगा। उनकी तुलना भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह से की जाती थी।

नई दिल्ली: Split in Aam Aadmi Party: आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर सियासी उथल-पुथल ने शुक्रवार को बड़ा रूप ले लिया, जब पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने एक साथ इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया। इन इस्तीफों ने न केवल AAP की संसदीय ताकत को झटका दिया, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी गहराई से हिला दिया। हालांकि इस घटनाक्रम में कई बड़े नाम शामिल हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा और हैरानी संदीप पाठक (Sandeep Pathak) के फैसले को लेकर हो रही है, जिन्हें अब तक अरविंद केजरीवाल का सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार माना जाता था।
संदीप पाठक का जाना क्यों सबसे बड़ा झटकापार्टी के भीतर संदीप पाठक की पहचान सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि रणनीतिकार की रही है। एक वरिष्ठ AAP नेता के शब्दों में, “हम कई तरह के झटकों के लिए तैयार थे, लेकिन संदीप पाठक का जाना अकल्पनीय था।” पाठक उन चुनिंदा लोगों में शामिल थे जिन्हें केजरीवाल की गैरमौजूदगी के दौरान भी निर्णय लेने की अहम जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। यहां तक कि जब केजरीवाल जेल में थे, तब उनसे मिलने की अनुमति पाने वाले तीन लोगों में पाठक भी शामिल थे।‘केजरीवाल के चाणक्य’ की भूमिका 2022 के बाद संदीप पाठक AAP के संगठन के सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरे। डेटा, सर्वे और चुनावी रणनीति में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि उन्हें पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाने लगा। उनकी तुलना भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह से की जाती थी। पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले पाठक ने संगठन को सख्ती से चलाने की शैली अपनाई थी। चुनावी रणनीतियों को जमीन पर उतारने में उनकी भूमिका निर्णायक मानी जाती थी। शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल की गैरमौजूदगी के दौरान भी पाठक ने न केवल संगठन को संभाला, बल्कि कांग्रेस के साथ राजनीतिक बातचीत में भी अहम भूमिका निभाई, खासकर हरियाणा जैसे संवेदनशील राज्य में।2025 के बाद बदली तस्वीरहालांकि 2025 के बाद पार्टी के भीतर समीकरण तेजी से बदलने लगे। दिल्ली विधानसभा चुनाव AAP के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुए और यहीं से संदीप पाठक की रणनीतियों पर सवाल उठने लगे। पार्टी के अंदर ‘ओवरप्रॉमिस और अंडरडिलीवर’ के आरोप लगे, जिसके बाद उन्हें कई अहम फैसलों से दूर कर दिया गया। इसी दौरान पार्टी के भीतर राघव चड्ढा और नेतृत्व के बीच टकराव भी खुलकर सामने आया। 2 अप्रैल 2026 को AAP ने चड्ढा को राज्यसभा में डिप्टी लीडर के पद से हटाकर उनकी जगह अशोक कुमार मित्तल को नियुक्त कर दिया। इस फैसले ने पार्टी के अंदर असंतोष को और बढ़ा दिया।अंदरूनी विवाद और बढ़ती नाराजगी15 अप्रैल को अशोक मित्तल के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया। AAP ने इस कार्रवाई के पीछे साजिश का आरोप लगाया और राघव चड्ढा पर भी निशाना साधा। वहीं, स्वाति मालीवाल पहले से ही पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मुखर थीं और ‘फ्लैगस्टाफ रोड’ विवाद के बाद उन्होंने बागी तेवर अपना लिए थे। इन घटनाओं के बीच पार्टी के कई नेताओं में असंतोष बढ़ता गया, जो अंततः बड़े पैमाने पर टूट के रूप में सामने आया।24 अप्रैल: जब सब कुछ बदल गया24 अप्रैल 2026 को घटनाक्रम ने अचानक मोड़ लिया, जब राघव चड्ढा ने AAP से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने का ऐलान किया। उनके साथ छह अन्य राज्यसभा सांसद भी भाजपा में चले गए। यह संख्या पार्टी के कुल राज्यसभा सांसदों के दो-तिहाई से अधिक थी, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए गंभीर झटका माना जाता है। सूत्रों के मुताबिक, 23 अप्रैल तक भी पार्टी नेतृत्व को इस बात का अंदेशा था कि कुछ नेता जा सकते हैं, लेकिन यह नहीं समझा गया कि जिन लोगों के साथ बातचीत चल रही थी, वही खुद भी पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं।हरभजन सिंह से संपर्क न होना भी संकेतपार्टी के भीतर हालात संभालने की कोशिशें भी हुईं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सांसद हरभजन सिंह से संपर्क करने की कई कोशिशें कीं, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। यह भी संकेत था कि पार्टी के भीतर स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।सबसे बड़ा संगठनात्मक नुकसानहालांकि सात सांसदों का जाना अपने आप में बड़ा झटका है, लेकिन AAP के भीतर यह माना जा रहा है कि संदीप पाठक का जाना सबसे बड़ा संगठनात्मक नुकसान है। उनकी रणनीतिक क्षमता और संगठन पर पकड़ को देखते हुए यह खाली जगह भर पाना आसान नहीं होगा।पार्टी अब राज्यसभा के मुख्य सचेतक एनडी गुप्ता के जरिए एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत कार्रवाई की तैयारी कर रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे वास्तविक नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी।कौन हैं संदीप पाठकसंदीप पाठक का सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। छत्तीसगढ़ में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। 2016 में वे आईआईटी दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर बने। इसी दौरान उनका संपर्क अरविंद केजरीवाल से हुआ। बताया जाता है कि उन्होंने पंजाब चुनाव को लेकर AAP के लिए सर्वे किया था। भले ही पार्टी वह चुनाव हार गई, लेकिन केजरीवाल का उन पर भरोसा बढ़ता गया। अंततः पाठक ने अपनी अकादमिक नौकरी छोड़कर पूरी तरह राजनीति में कदम रखा और AAP के प्रमुख रणनीतिकार बन गए। आज वही संदीप पाठक पार्टी छोड़कर विपक्षी दल में शामिल हो चुके हैं, जिससे न केवल AAP की सियासत में भूचाल आया है, बल्कि आने वाले समय में पार्टी की दिशा और दशा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
2022 के बाद संदीप पाठक AAP के संगठन के सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरे। डेटा, सर्वे और चुनावी रणनीति में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि उन्हें पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाने लगा। उनकी तुलना भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह से की जाती थी। पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले पाठक ने संगठन को सख्ती से चलाने की शैली अपनाई थी। चुनावी रणनीतियों को जमीन पर उतारने में उनकी भूमिका निर्णायक मानी जाती थी। शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल की गैरमौजूदगी के दौरान भी पाठक ने न केवल संगठन को संभाला, बल्कि कांग्रेस के साथ राजनीतिक बातचीत में भी अहम भूमिका निभाई, खासकर हरियाणा जैसे संवेदनशील राज्य में।
2025 के बाद बदली तस्वीरहालांकि 2025 के बाद पार्टी के भीतर समीकरण तेजी से बदलने लगे। दिल्ली विधानसभा चुनाव AAP के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुए और यहीं से संदीप पाठक की रणनीतियों पर सवाल उठने लगे। पार्टी के अंदर ‘ओवरप्रॉमिस और अंडरडिलीवर’ के आरोप लगे, जिसके बाद उन्हें कई अहम फैसलों से दूर कर दिया गया। इसी दौरान पार्टी के भीतर राघव चड्ढा और नेतृत्व के बीच टकराव भी खुलकर सामने आया। 2 अप्रैल 2026 को AAP ने चड्ढा को राज्यसभा में डिप्टी लीडर के पद से हटाकर उनकी जगह अशोक कुमार मित्तल को नियुक्त कर दिया। इस फैसले ने पार्टी के अंदर असंतोष को और बढ़ा दिया।अंदरूनी विवाद और बढ़ती नाराजगी15 अप्रैल को अशोक मित्तल के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया। AAP ने इस कार्रवाई के पीछे साजिश का आरोप लगाया और राघव चड्ढा पर भी निशाना साधा। वहीं, स्वाति मालीवाल पहले से ही पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मुखर थीं और ‘फ्लैगस्टाफ रोड’ विवाद के बाद उन्होंने बागी तेवर अपना लिए थे। इन घटनाओं के बीच पार्टी के कई नेताओं में असंतोष बढ़ता गया, जो अंततः बड़े पैमाने पर टूट के रूप में सामने आया।24 अप्रैल: जब सब कुछ बदल गया24 अप्रैल 2026 को घटनाक्रम ने अचानक मोड़ लिया, जब राघव चड्ढा ने AAP से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने का ऐलान किया। उनके साथ छह अन्य राज्यसभा सांसद भी भाजपा में चले गए। यह संख्या पार्टी के कुल राज्यसभा सांसदों के दो-तिहाई से अधिक थी, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए गंभीर झटका माना जाता है। सूत्रों के मुताबिक, 23 अप्रैल तक भी पार्टी नेतृत्व को इस बात का अंदेशा था कि कुछ नेता जा सकते हैं, लेकिन यह नहीं समझा गया कि जिन लोगों के साथ बातचीत चल रही थी, वही खुद भी पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं।हरभजन सिंह से संपर्क न होना भी संकेतपार्टी के भीतर हालात संभालने की कोशिशें भी हुईं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सांसद हरभजन सिंह से संपर्क करने की कई कोशिशें कीं, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। यह भी संकेत था कि पार्टी के भीतर स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।सबसे बड़ा संगठनात्मक नुकसानहालांकि सात सांसदों का जाना अपने आप में बड़ा झटका है, लेकिन AAP के भीतर यह माना जा रहा है कि संदीप पाठक का जाना सबसे बड़ा संगठनात्मक नुकसान है। उनकी रणनीतिक क्षमता और संगठन पर पकड़ को देखते हुए यह खाली जगह भर पाना आसान नहीं होगा।पार्टी अब राज्यसभा के मुख्य सचेतक एनडी गुप्ता के जरिए एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत कार्रवाई की तैयारी कर रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे वास्तविक नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी।कौन हैं संदीप पाठकसंदीप पाठक का सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। छत्तीसगढ़ में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। 2016 में वे आईआईटी दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर बने। इसी दौरान उनका संपर्क अरविंद केजरीवाल से हुआ। बताया जाता है कि उन्होंने पंजाब चुनाव को लेकर AAP के लिए सर्वे किया था। भले ही पार्टी वह चुनाव हार गई, लेकिन केजरीवाल का उन पर भरोसा बढ़ता गया। अंततः पाठक ने अपनी अकादमिक नौकरी छोड़कर पूरी तरह राजनीति में कदम रखा और AAP के प्रमुख रणनीतिकार बन गए। आज वही संदीप पाठक पार्टी छोड़कर विपक्षी दल में शामिल हो चुके हैं, जिससे न केवल AAP की सियासत में भूचाल आया है, बल्कि आने वाले समय में पार्टी की दिशा और दशा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
15 अप्रैल को अशोक मित्तल के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया। AAP ने इस कार्रवाई के पीछे साजिश का आरोप लगाया और राघव चड्ढा पर भी निशाना साधा। वहीं, स्वाति मालीवाल पहले से ही पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मुखर थीं और ‘फ्लैगस्टाफ रोड’ विवाद के बाद उन्होंने बागी तेवर अपना लिए थे। इन घटनाओं के बीच पार्टी के कई नेताओं में असंतोष बढ़ता गया, जो अंततः बड़े पैमाने पर टूट के रूप में सामने आया।
24 अप्रैल: जब सब कुछ बदल गया24 अप्रैल 2026 को घटनाक्रम ने अचानक मोड़ लिया, जब राघव चड्ढा ने AAP से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने का ऐलान किया। उनके साथ छह अन्य राज्यसभा सांसद भी भाजपा में चले गए। यह संख्या पार्टी के कुल राज्यसभा सांसदों के दो-तिहाई से अधिक थी, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए गंभीर झटका माना जाता है। सूत्रों के मुताबिक, 23 अप्रैल तक भी पार्टी नेतृत्व को इस बात का अंदेशा था कि कुछ नेता जा सकते हैं, लेकिन यह नहीं समझा गया कि जिन लोगों के साथ बातचीत चल रही थी, वही खुद भी पार्टी छोड़ने की तैयारी में हैं।हरभजन सिंह से संपर्क न होना भी संकेतपार्टी के भीतर हालात संभालने की कोशिशें भी हुईं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सांसद हरभजन सिंह से संपर्क करने की कई कोशिशें कीं, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। यह भी संकेत था कि पार्टी के भीतर स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।सबसे बड़ा संगठनात्मक नुकसानहालांकि सात सांसदों का जाना अपने आप में बड़ा झटका है, लेकिन AAP के भीतर यह माना जा रहा है कि संदीप पाठक का जाना सबसे बड़ा संगठनात्मक नुकसान है। उनकी रणनीतिक क्षमता और संगठन पर पकड़ को देखते हुए यह खाली जगह भर पाना आसान नहीं होगा।पार्टी अब राज्यसभा के मुख्य सचेतक एनडी गुप्ता के जरिए एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत कार्रवाई की तैयारी कर रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे वास्तविक नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी।कौन हैं संदीप पाठकसंदीप पाठक का सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। छत्तीसगढ़ में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। 2016 में वे आईआईटी दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर बने। इसी दौरान उनका संपर्क अरविंद केजरीवाल से हुआ। बताया जाता है कि उन्होंने पंजाब चुनाव को लेकर AAP के लिए सर्वे किया था। भले ही पार्टी वह चुनाव हार गई, लेकिन केजरीवाल का उन पर भरोसा बढ़ता गया। अंततः पाठक ने अपनी अकादमिक नौकरी छोड़कर पूरी तरह राजनीति में कदम रखा और AAP के प्रमुख रणनीतिकार बन गए। आज वही संदीप पाठक पार्टी छोड़कर विपक्षी दल में शामिल हो चुके हैं, जिससे न केवल AAP की सियासत में भूचाल आया है, बल्कि आने वाले समय में पार्टी की दिशा और दशा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
पार्टी के भीतर हालात संभालने की कोशिशें भी हुईं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सांसद हरभजन सिंह से संपर्क करने की कई कोशिशें कीं, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। यह भी संकेत था कि पार्टी के भीतर स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।
सबसे बड़ा संगठनात्मक नुकसानहालांकि सात सांसदों का जाना अपने आप में बड़ा झटका है, लेकिन AAP के भीतर यह माना जा रहा है कि संदीप पाठक का जाना सबसे बड़ा संगठनात्मक नुकसान है। उनकी रणनीतिक क्षमता और संगठन पर पकड़ को देखते हुए यह खाली जगह भर पाना आसान नहीं होगा।पार्टी अब राज्यसभा के मुख्य सचेतक एनडी गुप्ता के जरिए एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत कार्रवाई की तैयारी कर रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे वास्तविक नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी।कौन हैं संदीप पाठकसंदीप पाठक का सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। छत्तीसगढ़ में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। 2016 में वे आईआईटी दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर बने। इसी दौरान उनका संपर्क अरविंद केजरीवाल से हुआ। बताया जाता है कि उन्होंने पंजाब चुनाव को लेकर AAP के लिए सर्वे किया था। भले ही पार्टी वह चुनाव हार गई, लेकिन केजरीवाल का उन पर भरोसा बढ़ता गया। अंततः पाठक ने अपनी अकादमिक नौकरी छोड़कर पूरी तरह राजनीति में कदम रखा और AAP के प्रमुख रणनीतिकार बन गए। आज वही संदीप पाठक पार्टी छोड़कर विपक्षी दल में शामिल हो चुके हैं, जिससे न केवल AAP की सियासत में भूचाल आया है, बल्कि आने वाले समय में पार्टी की दिशा और दशा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
संदीप पाठक का सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। छत्तीसगढ़ में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। 2016 में वे आईआईटी दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर बने। इसी दौरान उनका संपर्क अरविंद केजरीवाल से हुआ। बताया जाता है कि उन्होंने पंजाब चुनाव को लेकर AAP के लिए सर्वे किया था। भले ही पार्टी वह चुनाव हार गई, लेकिन केजरीवाल का उन पर भरोसा बढ़ता गया। अंततः पाठक ने अपनी अकादमिक नौकरी छोड़कर पूरी तरह राजनीति में कदम रखा और AAP के प्रमुख रणनीतिकार बन गए। आज वही संदीप पाठक पार्टी छोड़कर विपक्षी दल में शामिल हो चुके हैं, जिससे न केवल AAP की सियासत में भूचाल आया है, बल्कि आने वाले समय में पार्टी की दिशा और दशा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
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