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मदरसा मामले पर न्यायिक टिप्पणियों को लेकर विवाद, विश्व हिंदू परिषद ने उठाए सवाल

मदरसा से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन की टिप्पणियों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है

मदरसा मामले पर न्यायिक टिप्पणियों को लेकर विवाद, विश्व हिंदू परिषद ने उठाए सवाल
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नई दिल्ली। मदरसा से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन की टिप्पणियों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार ने इस संबंध में प्रेस बयान जारी कर न्यायिक संयम बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

आलोक कुमार ने कहा कि 27 अप्रैल 2026 को दिए गए आदेश को पढ़कर उन्हें आश्चर्य हुआ। यह आदेश टीचर्स एसोसिएशन मदारीस अरबिया द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के खिलाफ दायर याचिका से संबंधित था। मामले में एनएचआरसी ने उत्तर प्रदेश सरकार के आर्थिक अपराध विंग (ईओडब्ल्यू) को मदरसों में वित्तीय अनियमितताओं सहित अन्य आरोपों की जांच करने और रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था।

बयान के अनुसार, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने समय की मांग की थी, क्योंकि मुख्य वकील उपलब्ध नहीं थे। वहीं, एनएचआरसी की ओर से भी कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था, क्योंकि आयोग को अभी तक औपचारिक नोटिस नहीं मिला था। अदालत ने सुनवाई टालने का अनुरोध स्वीकार कर लिया था।

हालांकि, आरोप है कि इसके बावजूद जस्टिस अतुल श्रीधरन ने बिना विस्तृत बहस के ही अपनी प्रारंभिक राय व्यक्त कर दी कि एनएचआरसी का आदेश उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इसके साथ ही उन्होंने आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और कुछ मामलों में उसके रुख की आलोचना की।

आलोक कुमार ने अपने बयान में कहा कि न्यायाधीश की कुछ टिप्पणियां संदर्भ से बाहर और तथ्यात्मक रूप से अनुचित प्रतीत होती हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मामले की सुनवाई कर रही पीठ के दूसरे न्यायाधीश, जस्टिस विवेक सरन ने इन टिप्पणियों से असहमति जताई और अपने साथी न्यायाधीश के विचारों से सहमति नहीं होने की बात कही।

विहिप अध्यक्ष ने कहा कि किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय के व्यक्ति के खिलाफ हो, पूरी तरह निंदनीय और कानूनन दंडनीय है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अपराधियों का कोई धर्म नहीं होता और ऐसे मामलों को किसी विशेष समुदाय से जोड़कर देखने से सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंच सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों से संतुलित और संयमित भाषा की अपेक्षा की जाती है, क्योंकि उनके शब्दों का व्यापक प्रभाव पड़ता है। इस मामले में न्यायिक संयम बनाए रखना संस्थागत संतुलन के लिए जरूरी है।

इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायपालिका की टिप्पणियों और उनकी सीमाओं को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।


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