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मेरे पास 10 ठोस कारण… केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट के जज से कहा- ‘आप इस सुनवाई से अलग हो जाएं’
अपने तर्कों में केजरीवाल ने कहा कि अब तक के आदेशों से यह प्रतीत होता है कि जस्टिस शर्मा ने CBI और ED की दलीलों को पूरी तरह स्वीकार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कभी-कभी एजेंसियों की मांग से भी अधिक सख्त आदेश पारित किए गए।

नई दिल्ली: दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को आबकारी नीति से जुड़े मामले में एक अहम कानूनी कदम उठाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से सुनवाई से अलग होने (रिक्यूजल) की मांग की। यह याचिका केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की उस अपील से जुड़ी है, जिसमें ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। इस मामले की सुनवाई के दौरान केजरीवाल ने खुद कोर्ट में अपनी बात रखते हुए न्यायाधीश के समक्ष 10 बिंदुओं पर आधारित आपत्तियां रखीं।
कोर्ट में सम्मान के साथ रखी बात, लेकिन जताया संदेहसुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल ने शुरुआत में कहा कि उन्हें न्यायपालिका और जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के प्रति व्यक्तिगत रूप से पूरा सम्मान है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ परिस्थितियों के चलते उनके मन में संदेह उत्पन्न हुआ है, जिसके आधार पर उन्होंने रिक्यूजल की मांग की है। इसके जवाब में जस्टिस शर्मा ने भी कहा कि वह केजरीवाल का सम्मान करती हैं।रिक्यूजल के लिए गिनाईं 10 प्रमुख वजहेंकेजरीवाल ने अदालत के समक्ष कई बिंदुओं को रखते हुए कहा कि इन कारणों से निष्पक्ष सुनवाई को लेकर आशंका पैदा होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि सेशन कोर्ट के आदेश को आरोपियों को सुने बिना ही गलत ठहरा दिया गया। इसके अलावा उन्होंने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा मामला दर्ज न किए जाने के बावजूद हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट में ED से जुड़े मामले पर रोक लगा दी।केजरीवाल ने यह भी दलील दी कि CBI के जांच अधिकारी ने अदालत में केस दाखिल नहीं किया था, इसके बावजूद उससे संबंधित कार्रवाई पर रोक लगा दी गई। उन्होंने समय-सीमा को लेकर भी सवाल उठाया और कहा कि आरोपियों को जवाब दाखिल करने के लिए केवल एक सप्ताह का समय दिया गया, जबकि अन्य मामलों में आमतौर पर कई महीनों का समय दिया जाता है।बेल ऑर्डर और पूर्व टिप्पणियों पर भी सवालमुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने बेल याचिका पर आदेश देते समय आरोपियों को पहले ही दोषी करार देने जैसी टिप्पणियां की थीं। उन्होंने इसे न्यायिक निष्पक्षता के सिद्धांत के खिलाफ बताया। इसके अलावा केजरीवाल ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के एक कथित बयान का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के बारे में पहले से जानकारी सार्वजनिक होना भी संदेह पैदा करता है।विचारधारा और कार्यक्रमों में भागीदारी का मुद्दा उठायाकेजरीवाल ने अदालत में यह भी कहा कि उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा के खिलाफ है, जबकि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा कथित तौर पर अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में कई बार शामिल हो चुकी हैं। उन्होंने इसे संभावित पक्षपात का आधार बताया।CBI और ED के पक्ष में झुकाव का आरोपअपने तर्कों में केजरीवाल ने कहा कि अब तक के आदेशों से यह प्रतीत होता है कि जस्टिस शर्मा ने CBI और ED की दलीलों को पूरी तरह स्वीकार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कभी-कभी एजेंसियों की मांग से भी अधिक सख्त आदेश पारित किए गए। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत में मौखिक रूप से रखी गई बातों पर भी तुरंत आदेश पारित कर दिए जाते हैं, जिससे निष्पक्ष सुनवाई पर सवाल खड़े होते हैं।परंपरा और पूर्व मामलों का भी दिया हवालाकेजरीवाल ने सोशल मीडिया और न्यायिक परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी जज के करीबी या रिश्तेदार का किसी पक्ष से संबंध हो, तो उन्हें खुद को सुनवाई से अलग कर लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उनके और उनकी पार्टी से जुड़े कई मामले पहले इसी अदालत में आए, जिनमें प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों में हस्तक्षेप करते हुए राहत दी, यहां तक कि जमानत भी मंजूर की गई।जल्दबाजी में सुनवाई का भी आरोपमुख्यमंत्री ने सुनवाई की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उनके मामले में असामान्य रूप से जल्दबाजी दिखाई गई। उन्होंने इसे भी निष्पक्षता पर असर डालने वाला कारक बताया।अब नजर कोर्ट के फैसले परइस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली हाईकोर्ट इस रिक्यूजल याचिका पर क्या फैसला लेता है। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
केजरीवाल ने अदालत के समक्ष कई बिंदुओं को रखते हुए कहा कि इन कारणों से निष्पक्ष सुनवाई को लेकर आशंका पैदा होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि सेशन कोर्ट के आदेश को आरोपियों को सुने बिना ही गलत ठहरा दिया गया। इसके अलावा उन्होंने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा मामला दर्ज न किए जाने के बावजूद हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट में ED से जुड़े मामले पर रोक लगा दी।
केजरीवाल ने यह भी दलील दी कि CBI के जांच अधिकारी ने अदालत में केस दाखिल नहीं किया था, इसके बावजूद उससे संबंधित कार्रवाई पर रोक लगा दी गई। उन्होंने समय-सीमा को लेकर भी सवाल उठाया और कहा कि आरोपियों को जवाब दाखिल करने के लिए केवल एक सप्ताह का समय दिया गया, जबकि अन्य मामलों में आमतौर पर कई महीनों का समय दिया जाता है।
बेल ऑर्डर और पूर्व टिप्पणियों पर भी सवालमुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने बेल याचिका पर आदेश देते समय आरोपियों को पहले ही दोषी करार देने जैसी टिप्पणियां की थीं। उन्होंने इसे न्यायिक निष्पक्षता के सिद्धांत के खिलाफ बताया। इसके अलावा केजरीवाल ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के एक कथित बयान का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के बारे में पहले से जानकारी सार्वजनिक होना भी संदेह पैदा करता है।विचारधारा और कार्यक्रमों में भागीदारी का मुद्दा उठायाकेजरीवाल ने अदालत में यह भी कहा कि उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा के खिलाफ है, जबकि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा कथित तौर पर अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में कई बार शामिल हो चुकी हैं। उन्होंने इसे संभावित पक्षपात का आधार बताया।CBI और ED के पक्ष में झुकाव का आरोपअपने तर्कों में केजरीवाल ने कहा कि अब तक के आदेशों से यह प्रतीत होता है कि जस्टिस शर्मा ने CBI और ED की दलीलों को पूरी तरह स्वीकार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कभी-कभी एजेंसियों की मांग से भी अधिक सख्त आदेश पारित किए गए। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत में मौखिक रूप से रखी गई बातों पर भी तुरंत आदेश पारित कर दिए जाते हैं, जिससे निष्पक्ष सुनवाई पर सवाल खड़े होते हैं।परंपरा और पूर्व मामलों का भी दिया हवालाकेजरीवाल ने सोशल मीडिया और न्यायिक परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी जज के करीबी या रिश्तेदार का किसी पक्ष से संबंध हो, तो उन्हें खुद को सुनवाई से अलग कर लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उनके और उनकी पार्टी से जुड़े कई मामले पहले इसी अदालत में आए, जिनमें प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों में हस्तक्षेप करते हुए राहत दी, यहां तक कि जमानत भी मंजूर की गई।जल्दबाजी में सुनवाई का भी आरोपमुख्यमंत्री ने सुनवाई की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उनके मामले में असामान्य रूप से जल्दबाजी दिखाई गई। उन्होंने इसे भी निष्पक्षता पर असर डालने वाला कारक बताया।अब नजर कोर्ट के फैसले परइस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली हाईकोर्ट इस रिक्यूजल याचिका पर क्या फैसला लेता है। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
केजरीवाल ने अदालत में यह भी कहा कि उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा के खिलाफ है, जबकि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा कथित तौर पर अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में कई बार शामिल हो चुकी हैं। उन्होंने इसे संभावित पक्षपात का आधार बताया।
CBI और ED के पक्ष में झुकाव का आरोपअपने तर्कों में केजरीवाल ने कहा कि अब तक के आदेशों से यह प्रतीत होता है कि जस्टिस शर्मा ने CBI और ED की दलीलों को पूरी तरह स्वीकार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कभी-कभी एजेंसियों की मांग से भी अधिक सख्त आदेश पारित किए गए। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत में मौखिक रूप से रखी गई बातों पर भी तुरंत आदेश पारित कर दिए जाते हैं, जिससे निष्पक्ष सुनवाई पर सवाल खड़े होते हैं।परंपरा और पूर्व मामलों का भी दिया हवालाकेजरीवाल ने सोशल मीडिया और न्यायिक परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी जज के करीबी या रिश्तेदार का किसी पक्ष से संबंध हो, तो उन्हें खुद को सुनवाई से अलग कर लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उनके और उनकी पार्टी से जुड़े कई मामले पहले इसी अदालत में आए, जिनमें प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों में हस्तक्षेप करते हुए राहत दी, यहां तक कि जमानत भी मंजूर की गई।जल्दबाजी में सुनवाई का भी आरोपमुख्यमंत्री ने सुनवाई की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उनके मामले में असामान्य रूप से जल्दबाजी दिखाई गई। उन्होंने इसे भी निष्पक्षता पर असर डालने वाला कारक बताया।अब नजर कोर्ट के फैसले परइस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली हाईकोर्ट इस रिक्यूजल याचिका पर क्या फैसला लेता है। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
केजरीवाल ने सोशल मीडिया और न्यायिक परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी जज के करीबी या रिश्तेदार का किसी पक्ष से संबंध हो, तो उन्हें खुद को सुनवाई से अलग कर लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उनके और उनकी पार्टी से जुड़े कई मामले पहले इसी अदालत में आए, जिनमें प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों में हस्तक्षेप करते हुए राहत दी, यहां तक कि जमानत भी मंजूर की गई।
जल्दबाजी में सुनवाई का भी आरोपमुख्यमंत्री ने सुनवाई की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उनके मामले में असामान्य रूप से जल्दबाजी दिखाई गई। उन्होंने इसे भी निष्पक्षता पर असर डालने वाला कारक बताया।अब नजर कोर्ट के फैसले परइस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली हाईकोर्ट इस रिक्यूजल याचिका पर क्या फैसला लेता है। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली हाईकोर्ट इस रिक्यूजल याचिका पर क्या फैसला लेता है। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
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