भाजपा में गए सातों सांसदों की सदस्यता समाप्त कराने के प्रयास में जुटी आप, उपराष्ट्रपति को लिखा पत्र
संजय सिंह ने शनिवार को प्रेस वार्ता में कहा कि सातों सांसदों का भाजपा में शामिल होना पूरी तरह गैर-कानूनी और असंवैधानिक है। उनके मुताबिक, दल-बदल विरोधी कानून स्पष्ट रूप से ऐसी स्थिति को अमान्य ठहराता है।

नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) ने भाजपा में शामिल हुए अपने सात राज्यसभा सांसदों के खिलाफ बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर ली है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने साफ किया है कि इन सांसदों की सदस्यता समाप्त कराने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जाएगी। उन्होंने इस संबंध में राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की है। संजय सिंह का आरोप है कि इन सांसदों ने संविधान और नियमों का उल्लंघन करते हुए भाजपा का दामन थामा है, इसलिए उन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
‘गैर-कानूनी तरीके से हुआ दल-बदल’
संजय सिंह ने शनिवार को प्रेस वार्ता में कहा कि सातों सांसदों का भाजपा में शामिल होना पूरी तरह गैर-कानूनी और असंवैधानिक है। उनके मुताबिक, दल-बदल विरोधी कानून स्पष्ट रूप से ऐसी स्थिति को अमान्य ठहराता है। उन्होंने कहा कि “किसी भी प्रकार की टूट चाहे वह विधानसभा, लोकसभा या राज्यसभा में हो को वैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती।” संजय सिंह ने शिवसेना से जुड़े मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि अदालतों ने भी इस तरह के मामलों में स्पष्ट रुख अपनाया है।
राज्यसभा सभापति को सौंपा गया पत्र
AAP नेता ने बताया कि उन्होंने राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर मांग की है कि राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक समेत भाजपा में शामिल हुए सभी सांसदों को अयोग्य घोषित किया जाए। उनका कहना है कि यह कदम संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत आता है, जिसके अनुसार यदि कोई सांसद स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
क्यों बढ़ा विवाद
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब AAP के कुछ प्रमुख राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ने का ऐलान किया और भाजपा में शामिल होने की खबरें सामने आईं। इस घटनाक्रम ने न केवल पार्टी के भीतर हलचल मचा दी, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया। संजय सिंह का बयान इसी पृष्ठभूमि में आया है, जहां पार्टी अपने संगठनात्मक ढांचे को बचाने और कानूनी लड़ाई लड़ने की रणनीति बना रही है।
सौरभ भारद्वाज का बयान
AAP के दिल्ली संयोजक सौरभ भारद्वाज ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी आम कार्यकर्ताओं द्वारा बनाई गई पार्टी है और यह किसी एक नेता पर निर्भर नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि पार्टी इस समय मुश्किल दौर से गुजर रही है—दिल्ली की सत्ता गंवाने, नेताओं की गिरफ्तारी और जांच एजेंसियों की कार्रवाई जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे समय में कुछ नेताओं का पार्टी छोड़ना असामान्य नहीं है।
क्या है 10वीं अनुसूची?
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और विधायकों/सांसदों के दलबदल को रोकना है। इस कानून के तहत, यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी के निर्देश (व्हिप) के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।
अयोग्यता के प्रमुख आधार
10वीं अनुसूची में अयोग्यता के कई आधार बताए गए हैं:
स्वैच्छिक त्याग: यदि कोई सदस्य खुद अपनी पार्टी छोड़ देता है।
व्हिप का उल्लंघन: पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान या अनुपस्थित रहना।
निर्दलीय सदस्य: चुनाव जीतने के बाद किसी पार्टी में शामिल होना।
मनोनीत सदस्य: छह महीने बाद किसी दल में शामिल होना।
इन सभी स्थितियों में संबंधित सदस्य को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
विवाद की असली जड़
हालांकि, इस कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है—विलय (Merger)। यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय का फैसला करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाता। यही बिंदु इस पूरे विवाद का केंद्र है, क्योंकि AAP के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 का अलग होना दो-तिहाई के करीब माना जा रहा है।
क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में 10वीं अनुसूची की व्याख्या जटिल हो जाती है। उनका कहना है कि यदि यह मामला “विलय” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो सांसदों को अयोग्य ठहराना मुश्किल हो सकता है। सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी के अनुसार, केवल विधायी दल (Legislative Party) का अलग होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मूल राजनीतिक पार्टी का भी औपचारिक विलय जरूरी होता है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि राजनीतिक पार्टी और विधायी दल दो अलग संस्थाएं हैं।
निर्णय का अधिकार किसके पास?
दल-बदल से जुड़े मामलों में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी—यानी लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति—के पास होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया अक्सर राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित हो सकती है, क्योंकि पीठासीन अधिकारी का चयन सत्ताधारी दल के समर्थन से होता है।


