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फेसबुक पेज पर प्रतिबंध के खिलाफ भाजपा नेता की अर्जी पर मेटा को दिल्ली हाईकोर्ट का नोटिस

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को भाजपा के तमिलनाडु प्रदेश प्रवक्ता एस.जी. सूर्या की ओर से दायर एक याचिका पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा इंक (पूर्व में फेसबुक) को नोटिस जारी किया

फेसबुक पेज पर प्रतिबंध के खिलाफ भाजपा नेता की अर्जी पर मेटा को दिल्ली हाईकोर्ट का नोटिस
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नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को भाजपा के तमिलनाडु प्रदेश प्रवक्ता एस.जी. सूर्या की ओर से दायर एक याचिका पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा इंक (पूर्व में फेसबुक) को नोटिस जारी किया। भाजपा नेता ने एक्सेस प्रतिबंधों और फेसबुक पेज को बंद करने (डिमोनेटाइजेशन) के खिलाफ याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया है कि ये कार्रवाई याचिकाकर्ता को दलील सुनाने का मौका दिए बिना की गई है।

मेटा और केंद्र को नोटिस जारी करते हुए न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव ने उन्हें 30 मार्च तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

अधिवक्ता मुकेश शर्मा के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि पिछले साल दिसंबर में यूट्यूब वीडियो वाले दो फेसबुक पोस्ट को सामुदायिक मानक उल्लंघन (कम्युनिटी स्टेंडर्ड वॉयलेशन) के तहत माना गया और इसलिए याचिकाकर्ता के फेसबुक पेज को एक महीने के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया।

याचिका में कहा गया है कि उक्त यूट्यूब वीडियो की सामग्री (कंटेंट) एक उपन्यासकार, वक्ता और पत्रकार जयकांतन द्वारा बनाई गई लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई या लिट्टे) के खिलाफ थी।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि हालांकि, मेटा ने कथित तौर पर दो वीडियो को लिट्टे समर्थक के रूप में चिह्न्ति किया और अपने फेसबुक तक पहुंच को प्रतिबंधित करने के लिए कार्रवाई की गई, जिसके बाद इसे भी डिमोनेटाइज कर दिया गया।

याचिका में कहा गया है, प्रतिवादी संख्या 2 ने उपरोक्त दो पोस्ट्स की सामग्री की गलत व्याख्या की, जो तमिल भाषा में पोस्ट की गई थी और याचिकाकर्ता की व्यापक जनता तक पहुंच को प्रतिबंधित करके गलत निर्णय लिया और यह याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना किया गया।

इसके अलावा याचिका में कहा गया है, सूचना प्रौद्योगिक अधिनियम, 2000 और नवीनतम सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत इस कार्रवाई के लिए कोई मंजूरी नहीं है।

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता राघव अवस्थी ने बताया कि प्रतिवादी मेटा ने उन पोस्ट्स की सामग्री की गलत व्याख्या की, जो तमिल भाषा में पोस्ट की गई थीं और याचिकाकर्ता की पहुंच को बड़े स्तर पर जनता तक सीमित करके गलत निर्णय लिया। उन्होंने तर्क दिया कि यह उन्हें सुनने का कोई अवसर दिए बिना किया गया।


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