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गिल के कैच छोड़ देहलक रे

गिल के कैच छोड़ देहलक रे'। वायकाम 18 द्वारा जियो सिनेमा नेटवर्क पर मुफ़्त में ब्राडकास्ट किए जा रहे आईपीएल फाइनल की भोजपुरी कमेंटरी करते हुए भाजपा सांसद रवि किशन इस पंक्ति को जाने कितनी बार दोहराते हैं

गिल के कैच छोड़ देहलक रे
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- अरविन्द मोहन

मजेदार मैच हुए, मजेदार व्यक्तिगत प्रदर्शन हुए पर इनसे ऊपर बाजार का खेल रहा-कभी प्रकट तो कभी अप्रकट। कभी करोड़ों में खरीदा दुनिया का नामी बॉलर आखिरी चार गेंद फुल टास फेंक देता है और प्रतिद्वंद्वी टीम का औसत खिलाड़ी चार छक्के मारकर अपनी टीम को जीत दिला देता है। ऐसे काफी वाकये हुए हैं।

गिल के कैच छोड़ देहलक रे'। वायकाम 18 द्वारा जियो सिनेमा नेटवर्क पर मुफ़्त में ब्राडकास्ट किए जा रहे आईपीएल फाइनल की भोजपुरी कमेंटरी करते हुए भाजपा सांसद रवि किशन इस पंक्ति को जाने कितनी बार दोहराते हैं। गिल के फार्म को देखते हुए बहुत साफ लग रहा था कि दीपक चाहर की यह गलती चेन्नई सुपरकिंग को भारी पड़ेगी और रवि किशन उचित बात का शोर मचा रहे हैं।

चेन्नई बाजार की पसंद वाली टीम थी। मुंबई उससे भी ज्यादा रही थी। और जिस तरह शुभमन गिल ने मुंबई की गेंदबाजी को गली वाली साबित करते हुए उसको ध्वस्त किया था, उससे भाजपा सांसद का शोर सही लग रहा था। पर मैच और कमेंटरी के आगे बढ़ते जाने के साथ रवि बाबू बार-बार 'नरेंद्र मोदी' स्टेडियम और सवा तीन करोड़ भोजपुरिया दर्शकों का आभार बताते-बताते भावुक हुए जा रहे थे (असल में जियो सिनेमा के स्क्रीन पर आ रही यह संख्या उसके सभी 11 भाषाओं के प्रसारण के दर्शकों की थी।) कहना न होगा कि अपनी हर जानकारी में थोड़ा-थोड़ा पक्षपात करते हुए भी रवि किशन अपनी जवाबदेही ढंग से निभा रहे थे-कम से कम अपने नियोक्ताओं के लिए तो जरूर। क्रिकेट का, बाजार का, भाजपा का, भोजपुरी का और अपना काम भी।

गिल का कैच छूटना मैच का टर्निंग प्वाइंट नहीं बना। हर कहीं से ठुकराए ऋद्धिमान साहा ने अच्छी ठुकाई की। फिर बीस लाख के बेस प्राइस पर खरीदे गए साई सुदर्शन ने चेन्नई की गेंदबाजी की कमजोरियों को ही नहीं उधेड़ा, जडेजा और दीपक चाहर जैसे धुरंधरों की भी धुनाई करके अपनी टीम को जीत के मुहाने पर ला दिया। चौतरफा वाहवाही। लेकिन आखिर में शून्य पर आउट धोनी और दो गेंद शेष रहते हारती लग रही चेन्नई की टीम ही जीती, आखिरी दो गेंदों पर छक्का और चौका लगाकर जडेजा ने मैच जीता दिया। कुछ खेल बारिश ने भी किया था, कुछ मैच के नियमों ने और कुछ अदृश्य दिखने वाली शक्तियों ने। आईपीएल-2023 में ऐसा काफी कुछ हुआ जिसे काफी समय तक याद रखा जाएगा।

200+ का स्कोर दर्जनों बार हुआ, सबसे ज्यादा छक्के मारे गए, कि बार 200+ ला लक्ष्य पूरा भी कर लिया गया। खिलाड़ियों में भी करोड़ों में खरीदे गए लोग फिसड्डी साबित हुए तो कौड़ियों के मोल खरीदे गए खिलाड़ी हीरा साबित हुए। मजेदार मैच हुए, मजेदार व्यक्तिगत प्रदर्शन हुए पर इनसे ऊपर बाजार का खेल रहा-कभी प्रकट तो कभी अप्रकट। कभी करोड़ों में खरीदा दुनिया का नामी बॉलर आखिरी चार गेंद फुल टास फेंक देता है और प्रतिद्वंद्वी टीम का औसत खिलाड़ी चार छक्के मारकर अपनी टीम को जीत दिला देता है। ऐसे काफी वाकये हुए हैं। बाजार की चले तो यह ज्यादातर अप्रकट ही रहे पर यह बेसम्भाल बड़ा बन चुका है और यह सब खेल दस टीमों के लगभग दो ढाई सौ खिलाड़ियों और करोड़ों दर्शकों के मत्थे ही हो रहा है। पर बाजार की पकड़ और आईपीएल का आकार-प्रकार हैरान करने वाली रफ्तार से बढ़ रहा है।

इस बार रफ्तार और तेज है जिसका कारण दो-तीन साल की परेशानी के बाद निर्बाध आयोजन था और बाजार ने जो अनुमान लगाया आईपीएल उससे ज्यादा तेजी से बढ़ा है। अब यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खेल लीग बन गया है। और फाइनल आंकड़े आने में कुछ वक्त लगेगा पर पहले पांच हफ्तों में ही टीवी, नेट और मोबाइल के माध्यम से 1300 करोड़ दर्शकों की उपस्थिति सबको हैरान किए हुए है। इससे भी ज्यादा हैरानी की बात है हर दर्शक द्वारा दिया गया औसत समय जो साठ मिनट से ज्यादा का था। और अगर वायकाम 18 अपनी दर्शक संख्या 660 करोड़ पार करने की उम्मीद करके विज्ञापन देता है तो गलती बताते-बताते भी रवि किशन फाइनल में सवा तीन करोड़ दर्शक होने की खबर दे ही देते हैं।

दूसरी ओर डिज्नी स्टार के दर्शक भी शुरुआती मैचों में ही पिछले साल से 33 फीसदी ज्यादा हो गए थे जबकि इस बार पहली दफे नेट का प्रसारण अलग से हुआ है और यह बाजार की उम्मीद के हिसाब से टीवी के सामान्य दर्शक से ज्यादा लोगों तक पहुंचने वाला था। तभी अगर डिज्नी स्टार ने इसके टीवी के पांच साल के प्रसारण अधिकार 23575 करोड़ में खरीदे थे तो वायकाम 18 ने नेट का अधिकार 27758 करोड़ में खरीदा। आईपीएल के आयोजक बीसीसीआई के लिए यही रकम मुख्य कमाई है (वह देश का ही नहीं दुनिया के सबसे अमीर खेल संगठनों में एक बन गया है) पर उसे स्पांसरशिप और फ्रेंचाइजी राइटस से भी काफी कमाई होती है। अब तो तीन हजार करोड़ से कम हैसियत वाली फ्रेंचाईजी कंपनी सदस्यता के लिए आवेदन भी नहीं कर सकती-पिछली बार गुजरात टाइटन्स ने सात हजार करोड़ से ज्यादा तो लखनऊ सुपर जाइन्ट्स ने साढ़े पांच हजार में राइट्स पाए।

प्रसारण कंपनियों का खेल ज्यादा रोचक है। इस बार वायकम 18 ने जियो सिनेमा के माध्यम से अपने प्रसारण मुफ़्त किए, ग्यारह भाषाओं में प्रसारण का इंतजाम किया तो 25 से 30 करोड़ वाले 28 स्पांसर मिले हैं-विज्ञापनों की कमाई अलग है। इससे दर्शकों की संख्या में कल्पनातीत विस्तार हुआ है। मैदान न छोड़ने के अंदाज में डिज्नी स्टार ने भी नौ भाषाओं में 13 लाइव चैनलों से प्रसारण का इंतजाम करने के साथ खास-खास मैचों को अपने स्टार-उत्सव जैसे उन चैनलों के माध्यम से भी जारी किया जो दूरदर्शन के मुफ़्त वाले डिश पर हैं। जियो ने भोजपुरी, पंजाबी और ऑडिया जैसी भाषाओं में लाइव प्रसारण कराया जो जबरदस्त सफल रहा। पर जिस चालीस करोड़ दर्शक का अनुमान था वह जाने कब का पीछे चला गया। कमाई के अंतिम आंकड़े अभी नहीं आए हैं पर बाजार का खेल सिर्फ दर्शकों के मत्थे रहता नहीं है। उसमें दर्शकों से ज्यादा प्रभावी मददगार खिलाड़ी, फ्रेंचाईजी के मालिक और खेल संगठन होते हैं। एक-एक ड्रेस और बिल्ला तक कमाई कराता है, दस सेकेंड का विज्ञापन लाखों का है।

इसलिए बीसीसीआई और फ्रेंचाईजी से सीधा सौदा करने के बाद बाजार खिलाड़ियों के माध्यम से और दूसरे तरीकों से 'गिल को कैच' करने की कोशिश करता है, सुदर्शन को जबरिया रिटायर्ड हर्ट करता है, यशस्वी जायसवाल को पीछे करता है, रिंकू सिंह को नहीं पूछता लेकिन ये अपनी प्रतिभा से ऊपर आते हैं। दूसरी ओर साल में डेढ़-दो सौ करोड़ कमाने वाले पिट जाते हैं, सबसे दुलारी टीम मुंबई में एक भी ढंग का बॉलर नहीं होता तो अधिकांश कप्तानों(जिन्हें टीम में सबसे ज्यादा पैसा मिलता है) का प्रदर्शन सबसे खराब। अब धोनी का, रोहित का, कोहली का या सैम करन का भाव भी यूं ही नहीं बना है। वे अब भी दुनिया के बड़े लीगों की कमाई में उनके खिलाड़ियों की तुलना में काफी कम पाते हैं।

बाजार उसी ब्रांड पर, उसी फ्रेंचाईजी पर, उसी खिलाड़ी से ज्यादा पाने की जुगत में रहता है जो उसके कंट्रोल में हों। खेल को खुला होना चाहिए। हर खिलाड़ी संभावनाओं से भरा है। आईपीएल अगर कमाई का रिकार्ड बना रहा है तो प्रतिभाओं को उभारने का भी। बस यह न हों यह काम क्रिकेट की जगह बाजार ही के भरोसे रह जाए। गिल को छूटने-पकड़ाने की आजादी होनी चाहिए।


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