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कामयाबी के लिए कांग्रेस इंदिरा की चिकमंगलुरु जीत से सबक ले

कर्नाटक की वर्तमान जीत ने कांग्रेस को दो तात्कालिक अवसर दिये हैं जिसका लाभ उठाकर पार्टी दो विशेष पहल कर सकती है

कामयाबी के लिए कांग्रेस इंदिरा की चिकमंगलुरु जीत से सबक ले
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- कल्याणी शंकर

कर्नाटक की वर्तमान जीत ने कांग्रेस को दो तात्कालिक अवसर दिये हैं जिसका लाभ उठाकर पार्टी दो विशेष पहल कर सकती है। एक, संगठन को पुनर्जीवित करना है, जो आकार से बाहर है। दूसरा है विपक्ष को उसके नये उत्साह के साथ एकजुट करने का बीड़ा उठाना। कर्नाटक में रोजी-रोटी और स्थानीय मुद्दों को उठाकर कांग्रेस ने अच्छा खेल दिखाया। इसने स्थानीय नेताओं को खुली छूट भी दी

किस्मत किसी खास पल में हर पार्टी मेहरबान होती है। 137 साल की ग्रैंडओल्ड पार्टी (जीओपी) कांग्रेस, जिसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, कोई अपवाद नहीं है। एक जोरदार और महत्वपूर्ण कर्नाटक जीत ने हाल ही में कांग्रेस को वह सुनहरा पल दिया। अगर कांग्रेस खुद को पुनर्जीवित करना चाहती है, तो वह हाल की जीत के गौरव पर नहीं बैठी रह सकती।

कांग्रेस इस साल के अंत में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनावों का सामना करेगी और फिर ग्रैंडफिनाले 2024 के लोकसभा चुनावों में उतरेगी।

क्या कर्नाटक की जीत पर कांग्रेस आगे बढ़ेगी और अपने ही इतिहास पर दृष्टि डालेगी यह जानने के लिए कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने चिकमंगलुरु क्षण का उपयोग कैसे किया था? उन्होंने हमेशा हर मौके का फायदा उठाया।

पुराने समय के लोग याद करते हैं कि कैसे इंदिरा ने आपातकाल के बाद 1978 में चिकमंगलुरु उपचुनाव में अपनी जीत का इस्तेमाल 1980 के लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी को सत्ता में लाने के लिए किया था... वे यह भी याद करते हैं कि कैसे इंदिरा ने अपने बेलछी पल का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया था। जुलाई 1977 में, बिहार के बेलछी में एक गिरोह द्वारा आठ दलितों सहित 11 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गयी थी। उन्होंने हाथी और ट्रैक्टर की सवारी कर बेलछी में पीड़ितों से मुलाकात की।

इंदिरा की बहू सोनिया गांधी के लिए भी कर्नाटक भाग्यशाली रहा। उन्होंने अपना पहला चुनाव 1999 में कांग्रेस के गढ़ बेल्लारी निर्वाचन क्षेत्र से जीता था। उसने एक व्यवहार्य गठबंधन बनाया, 2004 में पार्टी को सत्ता में लाया और दस वर्षों तक शासन किया।

कर्नाटक की वर्तमान जीत ने कांग्रेस को दो तात्कालिक अवसर दिये हैं जिसका लाभ उठाकर पार्टी दो विशेष पहल कर सकती है। एक, संगठन को पुनर्जीवित करना है, जो आकार से बाहर है। दूसरा है विपक्ष को उसके नये उत्साह के साथ एकजुट करने का बीड़ा उठाना।

कर्नाटक में रोजी-रोटी और स्थानीय मुद्दों को उठाकर कांग्रेस ने अच्छा खेल दिखाया। इसने स्थानीय नेताओं को खुली छूट भी दी। आलाकमान ने केवल अभियान में सहयोग किया। इसने लाभांश का भुगतान किया।

इसके उलट भाजपा ने गलत चुनावी रणनीति अपनाई जिससे कांग्रेस को फायदा पहुंचा। मोदी के जादू के भरोसे और भाजपा के शीर्ष नेताओं द्वारा हाई-वोल्टेज अभियान ने भाजपा को सीमित सफलता दी। कमजोर मुख्यमंत्री बोम्मई और भारी भरकम भ्रष्टाचार के आरोपों ने इसकी मुसीबतें और बढ़ा दीं। हिंदुत्व या राम मंदिर को कोई गंभीरता से लेने वाला नहीं है। हिंदुत्व केवल तटीय जिलों के भीतर काम करता था। कुछ ही स्थानीय मुद्दे थे जिन्हें भाजपा उठा सकती थी। चुनाव ने यह भी दिखाया कि दक्षिण में सफल होने के लिए उसे अलग चुनावी आख्यान की जरूरत है।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि कर्नाटक की हार का मतलब हुआ कि दक्षिण भारत में भाजपा की कोई उपस्थिति नहीं है। दक्षिण में 129 सीटें हैं, जिनमें से भाजपा ने 2019 में केवल 29 सीटें जीती थीं।

कांग्रेस को कर्नाटक चुनाव से सीख लेनी चाहिए। अगर पार्टी के आला नेताओं ने नव निर्वाचित विधायकों को अपना मुख्यमंत्री चुनने के लिए छोड़ दिया होता, तो यह अधिक लोकतांत्रिक होता। इसके बजाय, विधायक दल ने सामान्य एक-पंक्ति का प्रस्ताव पारित किया और चुनाव को हाईकमान पर छोड़ दिया।

दो उम्मीदवार- पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश कांग्रेस प्रमुख डी.के.शिवकुमार- चार दिन से दिल्ली में एड़ियां रगड़ रहे थे। सोनिया गांधी ने आखिरकार इस मुद्दे को सुलझा लिया। उन्होंने शिव कुमार को इस बात के लिए राजी कर लिया कि मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धारमैया रहें और शिव कुमार उपमुख्यमंत्री हो जायें।

दूसरे, असली परीक्षा तो यह होगी कि 2024 के चुनाव के लिए विपक्षी गठबंधन को एकजुट करने के लिए कांग्रेस अपने नये अधिग्रहीत दबदबे को कैसे संभालती है। इस संबंध में कांग्रेस ने शनिवार को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के शपथ ग्रहण समारोह का इस्तेमाल अपने नये जोश का प्रदर्शन करने के लिए किया।

एकजुट विपक्ष को आगामी चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने के मौके का फायदा उठाना चाहिए। कोई 209 लोकसभा सीटें 19 राज्यों में फैली हुई हैं, जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आमने-सामने की लड़ाई की बात करते रहे हैं।

तीसरा, कांग्रेस ने कर्नाटक में मुसलमानों, दलितों और पिछड़े वर्गों के अपने खोए हुए वोट बैंक को फिर से हासिल किया। इसे न केवल संरक्षित किया जाना चाहिए बल्कि आगामी चुनावों में भी दोहराया जाना चाहिए।

चौथा, सिद्धारमैया ने अच्छी शुरुआत की और अपनी पहली कैबिनेट बैठक में वादे के मुताबिक पांच चुनावी वादों को लागू किया। उनकी चुनौती सभी को साथ लेकर चलने और अपने झुंड को भाजपा द्वारा अवैध शिकार से बचाने की है। क ल्याणकारी उपायों में सभी घरों को 200 यूनिट मुफ्त बिजली, परिवार के मुखिया को 2000 रुपये प्रति माह और बीपीएल परिवार के प्रत्येक सदस्य को 10 किलोग्राम मुफ्त चावल की आपूर्ति करना शामिल है।

कांग्रेस के पास अन्य सिरदर्द भी हैं। इसे आगामी चुनावों से पहले राजस्थान और छत्तीसगढ़ सत्ता संघर्ष को हल करना चाहिए। इसे नाजुक तरीके से संभालने की जरूरत है। पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की जगह लेना चाहते हैं, लेकिन गहलोत जाने को तैयार नहीं हैं। दूसरे को पुरस्कार मिलने पर दोनों परेशानी का कारण बन सकते हैं।

छत्तीसगढ़ में भी ऐसी ही स्थिति है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कैबिनेट मंत्री टीएस सिंह देव के बीच सत्ता संघर्ष छिड़ा हुआ है। राहुल गांधी ने 2018 में ढाई साल बाद बारी-बारी से मुख्यमंत्री का वादा किया था। देव बदलाव की मांग करते रहे हैं।

हाल ही में हिमाचल प्रदेश में जीत और अब कर्नाटक ने कांग्रेस को दिखाया है कि आने वाले महीनों में पार्टी और विपक्ष में एकता, एक मजबूत संगठन और एक आकर्षक चुनावी आख्यान नया मंत्र होना चाहिए।


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