कांग्रेस को रवैया बदलने की जरूरत
उत्तर भारत में ग्रीन बिल्डिंग को अपनाने की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है, जिसमें एनसीआर पहले स्थान पर और उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर उभरकर सामने आया है। यह जानकारी विशेषज्ञों ने बुधवार को दी

असम चुनाव से कुछ पहले भाजपा ने कांग्रेस को तोड़ने में बड़ी सफलता हासिल की है। असम से कांग्रेस के लोकसभा सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने मंगलवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि यह फैसला उनके लिए बेहद कठिन था क्योंकि उन्हें कांग्रेस पार्टी के अंदर कई मुद्दों पर लगातार अपमान का सामना करना पड़ रहा था। इस अपमान का बदला श्री बोरदोलोई ने अब भाजपा की सदस्यता लेकर पूरा किया है। इससे पहले भूपेन बोरा भी इसी तरह की नाखुशी संगठन से जताकर अलग हुए थे और फौरन ही भाजपा के खेमे में चले गए। आखिर चुनावों से पहले ही मान-अपमान का ख्याल दल बदल करने वाले नेताओं को कैसे आता है, यह सवाल अब तक अनुत्तरित है। ऐसा नहीं है कि केवल कांग्रेस में ही दल बदल का सिलसिला चलता है, कमोबेश सभी पार्टियां इसका शिकार हैं। लेकिन खास बात ये है कि जिस राज्य में कांग्रेस मजबूती से भाजपा को चुनौती देती है, वहां इस तरह की फूट ज्यादा दिखाई देती है। इस समय असम ऐसा ही एक राज्य है, जहां इस बार भाजपा के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है। गौरव गोगोई को असम कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर आलाकमान ने एक बड़ा दांव चला और गोगोई के तेवर जैसे संसद में भाजपा के लिए तीखे रहते हैं, असम में भी हिमंता बिस्वासरमा के सामने वैसे ही तीखे बने हुए हैं। बिस्वासरमा ने गौरव गोगोई को पाकिस्तान का एजेंट बताने जैसे गंभीर आरोप तक लगाए हैं, मगर इनसे पीछे हटने की बजाए गौरव गोगोई सामने आकर बिस्वासरमा को चुनौती दिए जा रहे हैं। बीते दिनों जिस तरह प्रियंका गांधी ने असम में धुआंधार बैठकें कर राज्य इकाई को मजबूत करने की कोशिश की और अब टिकट वितरण का काम जमीनी रिपोर्ट के आधार पर शुरु हुआ है, उसमें भी नजर आ रहा है कि कांग्रेस से इस बार भाजपा को कड़ी टक्कर मिलने वाली है। भाजपा के लिए एंटी इनक्मबेंसी भी एक बड़ी चुनौती है। इन चुनौतियां का सामना करने के लिए भाजपा के पास सबसे सुविधाजनक तरीका यही है कि कांग्रेस में फूट डलवाई जाए। प्रद्युत बोरदोलोई और राज्य कांग्रेस के उपाध्यक्ष नवज्योति तालुकदार का पार्टी छोड़ना इसका प्रमाण है।
प्रद्युत बोरदोलोई ने अपने इस्तीफे के बारे में कहा कि 'मैंने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक को छोड़ दिया है और इसके लिए मैं खुश नहीं हूं। लेकिन मैंने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि कांग्रेस पार्टी, विशेष रूप से असम कांग्रेस के भीतर, मुझसे संपर्क करने वाले लोग मुझे बार-बार अपमानित कर रहे थे। कांग्रेस नेतृत्व भी मेरे प्रति सहानुभूति नहीं दिखा रहा था।' गौरतलब है कि बोरदोलोई 1998 से 2016 तक चार बार विधायक रहे। 2001 से 2015 के बीच असम की कांग्रेस सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री पद भी संभाले। और फिर नौगांव से दो बार सांसद रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें आलाकमान से शिकायत है। उनका कहना है कि उनके संसदीय क्षेत्र से एक कांग्रेस विधायक आसिफ नजर के करीबी ने बीते पंचायत चुनाव के दौरान उन पर हमला करवाया था। अब उनका सवाल है कि एक अपराधी को टिकट कैसे दे सकते हैं। बोरदोलोई का कहना है कि जब 13 मार्च को दिल्ली में कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में असम चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमिटी के सदस्य सांसद इमरान मसूद ने उनके आरोपों को 'झूठा' करार दिया और गोगोई चुप रहे। इससे उनके 'आत्म-सम्मान' को ठेस पहुंची।
आत्मसम्मान की आड़ लेकर बोरदोलोई ने कांग्रेस छोड़ी और अब शायद सम्मान की तलाश में भाजपा चले गए हैं। वहीं असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष नवज्योति तालुकदार ने मंगलवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लिखे पत्र में नवज्योति तालुकदार ने पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। यहां भी सवाल वही है कि आखिर अपनी ही पार्टी की कार्यप्रणाली ऐन चुनाव के पहले तालुकदार को नागवार क्यों गुजरने लगी।
दरअसल दलबदल के लिए एक पुख्ता बहाना चाहिए ही होता है, तो अपमान का फैक्टर इसमें सबसे कारगर साबित होता है, क्योंकि इसमें जनता की सहानुभूति मिल जाती है। हालांकि असल में इसमें जनता का अपमान होता है, जिसने इससे पहले आपके काम और विचारधारा के लिए आपको अपना प्रतिनिधि बनाया, लेकिन आपने अपनी विचारधारा ऐसे बदली जैसे कोई वस्त्र बदलता है। वैसे यहां थोड़ी गलती कांग्रेस की भी है, आखिर उसे बगावत के बारे में तभी कैसे पता चलता है जब कोई खेल कर चुका होता है। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया पर भी कांग्रेस उम्मीद लगाए बैठे हुई थी कि वे पार्टी को नहीं छोड़ेंगे, लेकिन सिंधिया ने अपने साथ 22 और विधायकों को तोड़ लिया और कांग्रेस को खबर भी नहीं हुई।
ऐसी बेखबरी के साथ राजनीति तो नहीं की जा सकती, खासकर तब जब सामने भाजपा जैसा प्रतिद्वंद्वी मौजूद हो, जो साम, दाम, दंड, भेद सबका इस्तेमाल करके चुनाव जीतने में यकीन रखे। विधानसभा से पहले राज्यसभा में भी भाजपा का यही खेल बिहार, ओडिशा और हरियाणा में नजर आया। इन तीन राज्यों में कांग्रेस के कुल 11 विधायकों ने पार्टी के निर्देशों की अवहेलना की है। हरियाणा में कांग्रेस के 5 विधायकों ने पार्टी के खिलाफ जाकर वोट किया। ओडिशा में 3 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर मतदान किया। जिससे कांग्रेस-बीजेडी समर्थक उम्मीदवार की हार हुई। और बिहार में कांग्रेस के 3 विधायकों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा ही नहीं लिया। हरियाणा में तो जैसे तैसे करके कांग्रेस ने अपनी सीट बचा ली मगर बाकी राज्यों में अपनी कमजोरी ही दिखाई है।
कांग्रेस के कुछ कद्दावर नेताओं का कहना है कि सत्ता पक्ष यानी भाजपा की तरफ से मिलने वाले धनबल (प्रलोभन) के प्रभाव को बेअसर करना आसान नहीं है, क्योंकि इसके साथ ही सत्ताधारी दल की धमकियों का डर भी जुड़ा होता है। इस बात में कोई दो राय नहीं है, लेकिन जब कारण पता चल गया है तो उसका हल भी उसी तरीके से ढूंढना होगा कि यह कारण ही खत्म हो जाए। हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों के वक्त से कांग्रेस के भीतर गुटबाजी पर चिंता जताई जा रही थी, लेकिन कांग्रेस ने बात न सुनने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए लोकतांत्रिक मिजाज़ दिखाते हुए सख्ती नहीं अपनाई। अब शायद उसे इस रवैये को बदलने की जरूरत है।


