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मौसेरे भाई-बहन की शादी अमान्य: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, फिर भी पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण

मामला जांजगीर-चांपा जिले से जुड़ा है, जहां एक युवक ने वर्ष 2018 में अपनी मौसेरी बहन से विवाह किया था। कुछ समय बाद पति-पत्नी के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर इस विवाह को शून्य घोषित करने की मांग की।

मौसेरे भाई-बहन की शादी अमान्य: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, फिर भी पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण
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बिलासपुर : Chhattisgarh High कोर्ट Verdict: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक अहम फैसले में कहा है कि मौसेरे भाई-बहनों के बीच विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निषिद्ध नातेदारी (Prohibited Relationship) में आता है और ऐसे विवाह को कानूनी रूप से शून्य (Void) माना जाएगा। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह अमान्य होने के बावजूद पत्नी को भरण-पोषण (Maintenance) पाने का अधिकार रहेगा।

फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटा

जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए निचली अदालत, यानी फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। फैमिली कोर्ट ने पहले इस विवाह को सामाजिक प्रथा के आधार पर वैध माना था, लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

क्या था पूरा मामला?

मामला जांजगीर-चांपा जिले से जुड़ा है, जहां एक युवक ने वर्ष 2018 में अपनी मौसेरी बहन से विवाह किया था। कुछ समय बाद पति-पत्नी के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर इस विवाह को शून्य घोषित करने की मांग की। पति का तर्क था कि उसकी मां और उसकी पत्नी की मां सगी बहनें हैं, इसलिए यह विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निषिद्ध संबंधों की श्रेणी में आता है।

फैमिली कोर्ट ने प्रथा का दिया हवाला

फैमिली कोर्ट ने स्थानीय सामाजिक प्रथा और पटेल समाज में प्रचलित ब्रह्म विवाह की परंपरा का हवाला देते हुए इस विवाह को वैध ठहराया था। कोर्ट का मानना था कि समाज में इस तरह की शादियां स्वीकार्य हैं, इसलिए इसे अवैध नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने प्रथा को नहीं माना पर्याप्त आधार

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी भी सामाजिक प्रथा को कानूनी मान्यता मिलने के लिए यह जरूरी है कि वह प्राचीन, निरंतर और सार्वजनिक नीति के अनुरूप हो। अदालत ने कहा कि इस मामले में ऐसी कोई ठोस और स्थापित परंपरा प्रस्तुत नहीं की गई, जो निषिद्ध नातेदारी में विवाह को वैध ठहरा सके।

निषिद्ध नातेदारी पर कानून का रुख

हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार, कुछ रिश्तों के बीच विवाह करना कानूनन प्रतिबंधित है। इन रिश्तों को ‘निषिद्ध नातेदारी’ की श्रेणी में रखा गया है। अदालत ने कहा कि मौसेरे भाई-बहन का संबंध इसी श्रेणी में आता है, इसलिए इस प्रकार का विवाह कानून की नजर में अमान्य होगा।

विवाह को घोषित किया शून्य

सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने इस विवाह को शून्य घोषित कर दिया। इसका अर्थ यह है कि कानून की नजर में यह विवाह कभी अस्तित्व में ही नहीं था।

पत्नी के अधिकारों की रक्षा

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह के अमान्य होने का मतलब यह नहीं है कि पत्नी को उसके अधिकारों से वंचित कर दिया जाए। कोर्ट ने पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) पाने का अधिकार दिया। यह फैसला इस बात को दर्शाता है कि कानून महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की रक्षा के लिए संवेदनशील है।

कानून और सामाजिक परंपराओं के बीच संतुलन

इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि सामाजिक परंपराएं तभी मान्य होती हैं, जब वे कानून के अनुरूप हों। यदि कोई प्रथा कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, तो उसे मान्यता नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत या सामुदायिक मान्यताओं से ऊपर कानून का पालन जरूरी है।

भविष्य के मामलों के लिए मार्गदर्शन

यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, जहां विवाह की वैधता को लेकर विवाद होता है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि निषिद्ध संबंधों में विवाह को केवल परंपरा के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता।

अधिकार और कानून दोनों अहम

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला विवाह, परंपरा और कानून के बीच संतुलन को स्पष्ट रूप से सामने लाता है। एक ओर जहां अदालत ने कानून के तहत विवाह को अमान्य घोषित किया, वहीं दूसरी ओर पत्नी के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित की। यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी एक स्पष्ट दिशा प्रदान करता है।


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