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फ्लिपकार्ट अधिकारियों को राहत नहीं, हत्या मामले में दर्ज एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का इनकार

यह मामला जुलाई 2025 में रायपुर में हुई हत्या और लूट की एक घटना से जुड़ा है। पुलिस जांच के दौरान सामने आया था कि आरोपितों ने कथित तौर पर ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से एक चाकू मंगाया था, जिसका इस्तेमाल अपराध में किया गया।

फ्लिपकार्ट अधिकारियों को राहत नहीं, हत्या मामले में दर्ज एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का इनकार
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट के अधिकारियों को बड़ा झटका देते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और दाखिल चार्जशीट को निरस्त करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के तत्व दिखाई देते हैं, तब हाई कोर्ट को जांच या ट्रायल कोर्ट की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। खंडपीठ के इस फैसले के बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।

रायपुर हत्या मामले से जुड़ा है पूरा प्रकरण

यह मामला जुलाई 2025 में रायपुर में हुई हत्या और लूट की एक घटना से जुड़ा है। पुलिस जांच के दौरान सामने आया था कि आरोपितों ने कथित तौर पर ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से एक चाकू मंगाया था, जिसका इस्तेमाल अपराध में किया गया। इसके बाद रायपुर पुलिस ने फ्लिपकार्ट, उसके लॉजिस्टिक पार्टनर के प्रबंधक, डिस्ट्रीब्यूटर और अन्य कर्मचारियों सहित कुल छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।

पुलिस का आरोप

पुलिस का आरोप है कि ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियों को पहले ही ऐसे उत्पादों की आपूर्ति को लेकर आवश्यक सावधानी बरतने के निर्देश दिए गए थे। जांच एजेंसियों का कहना है कि चेतावनी के बावजूद कथित रूप से पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती गई, जिससे अपराध में इस्तेमाल होने वाला सामान आरोपितों तक पहुंच गया। पुलिस के अनुसार, इस लापरवाही ने सार्वजनिक सुरक्षा और मानव जीवन को खतरे में डालने की स्थिति पैदा की।

फ्लिपकार्ट ने अदालत में क्या दलील दी?

एफआईआर दर्ज होने के बाद फ्लिपकार्ट के अधिकारियों ने हाई कोर्ट का रुख किया और एफआईआर तथा चार्जशीट रद्द करने की मांग की। कंपनी की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि फ्लिपकार्ट एक 'इंटरमीडियरी' (मध्यस्थ मंच) के रूप में कार्य करता है और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत उसे कानूनी संरक्षण प्राप्त है। यह भी तर्क दिया गया कि जिस चाकू की ऑनलाइन बिक्री हुई, वह सामान्य रसोई (किचन) में उपयोग होने वाला चाकू था और वह आर्म्स एक्ट के दायरे में आने वाला प्रतिबंधित हथियार नहीं है। कंपनी का कहना था कि अधिकारियों की अपराध में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी और उन पर अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी डाली जा रही है।

अदालत ने हस्तक्षेप से किया इनकार

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि मामले में जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है। ऐसे में उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर प्रथम दृष्टया अपराध के तत्वों की जांच ट्रायल कोर्ट में होना उचित होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस चरण में एफआईआर या चार्जशीट को रद्द करना न्यायोचित नहीं होगा।

डिलीवरी को लेकर पहले जारी हुए थे निर्देश

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, रायपुर पुलिस ने पहले ही विभिन्न ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्मों को निर्देश दिए थे कि चाकू जैसे धारदार उत्पादों की आपूर्ति करते समय निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाए। इन निर्देशों के तहत संबंधित ग्राहक की पहचान, मोबाइल नंबर और पता जैसी जानकारी पुलिस को उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। पुलिस का दावा है कि कई बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, जिसके बाद कानूनी कार्रवाई की गई।

ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर बढ़ी बहस

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि ऑनलाइन मार्केटप्लेस की जिम्मेदारी किस सीमा तक तय की जानी चाहिए। एक ओर कंपनियां स्वयं को केवल तकनीकी मंच (इंटरमीडियरी) बताती हैं, वहीं कानून प्रवर्तन एजेंसियां सार्वजनिक सुरक्षा के मद्देन=ज़र उनसे अधिक सतर्कता की अपेक्षा करती हैं। फिलहाल मामले की सुनवाई निचली अदालत में जारी रहेगी, जहां उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर आरोपों की जांच और परीक्षण किया जाएगा।


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