छत्तीसगढ़ी लोककला को चतुर सिंह ने दिया नया मुकाम
मटका है रौशनी का मटका है... एक नदी का टुकड़ा जिसमें अटका है...यह जुमले वाला खनकता हुआ गीत आपने जरूर टीवी पर देखी व सुनी होगी

राजनांदगांव। मटका है रौशनी का मटका है... एक नदी का टुकड़ा जिसमें अटका है...यह जुमले वाला खनकता हुआ गीत आपने जरूर टीवी पर देखी व सुनी होगी। हैप्पीडेंट कंपनी का वेपगम नामक च्युइंगम वाला यह सुप्रसिद्ध टीवी एड का म्युजिक कम्पोज नाचा बहुआयामी प्रतिभा के धनी लोक कलाकार चतुरसिंग बजरंगे ने किया था। नाचा की दुनिया से लेकर रंगमंच की दुनिया में अपने नृत्य प्रतिभा व अभिनय जौहर के साथ-साथ गायन का चमत्कार दिखाने वाली सुप्रसिद्ध लोक गायिका पूनम विराट की खनकती हुई आवाज में लोक मधुरिमा को बिखेरने वाली इस एड गीत को इसके संगीत संयोजक चतुरसिंग ने छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय करमा धुन में आबद्ध किया था ।
मुम्बई की मां लक्ष्मी स्टुडियो में रिकार्डिंग की गई उक्त गीत के बारे में चतुरसिंग ने बताया कि इस गीत के बेस के लिए कोलकाता से आए एक सहायक कम्पोजर बंगाल के लोक वाद्य गदका के टुन-टुन का आधार लिया था जिसे उसने करमा टयून के साथ मिक्सप करके उक्त विज्ञापन गीत को तैयार किया, जिसे लोगों ने काफी सराहा व आज भी जब उक्त च्युइंगम वाला एड टीवी पर आता है तो आधुनिक जिंगल्स के साथ लोक टयून की मिश्रण वाली यह खूबसूरती मनोमस्तिष्क में तरावट ला देती है... हृदय आनंद से भर उठता है।
सन् 1949 को ग्राम कन्हारपुरी में टहल सिंह दाऊ के घर जन्मे चतुरसिंग एक बेहतर कलाकार, संगीत निर्देशक, गायक के अलावा अच्छे इंसान के रूप में जाने जाते हैं। पुस्तैनी जमीन से बचे शेष टुकड़े पर खेती कर बड़ी कठिनाई से परिवार का भरण-पोषण कर रहे माटी से जुड़ा यह कलाकार छत्तीसगढ़ी लोक कला व संस्कृति के लिए अपनी प्रतिभा के माध्यम से जन रंजन करने सतत् प्रयत्नशील है ।
लोककला की दुनिया में प्रवेश-राजनांदगांव को ऐसे ही संस्कारधानी नगरी नहीं कहा जाता, यहां के लोगों ने अपने से बड़े-बुजुर्गों, ज्ञानी पुरुषों के संस्कारों को बेहतर ढंग से जिया है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से संबंधित रहा हो... उनके सद्गुणों को आत्मसात करने की पूरी प्रतिबद्धता दर्शाई है। तभी तो यह नगरी कला, साहित्य, संगीत, खेल-कूद व समाजसेवा आदि के क्षेत्र में दूर-दूर तक जाना जाता है। छत्तीसगढ़ लोक रंग शैली नाचा के पुरोधा पुरुष दाऊ मंदराजी का अपना पूरा समय संस्कारधानी नगरी राजनांदगांव के एक वार्ड ग्राम कन्हारपुरी में ही बीतता था। नाचा कार्यक्रम से आने के बाद चतुरसिंग का डेरा कन्हारपुुरी में प्राय: इसलिए रहता था क्योंकि यहां के चुनू कारीगीर (विश्वकर्मा) के पास हारमोनियम था, मंदराजी दाऊ उस समय नाचा कार्यक्रम मेंं चिकारा बजाया करते थे सो उन्होंने उक्त हारमोनियम में हाथ फेरने तथा ग्राम की सेवा भजन व रामायण मण्डली की गतिशीलता बनाए रखने प्राय: यहां उपस्थित रहते थे। उनके रहते बड़े-बड़े कलाकारों की बैठकियां प्राय: हुआ करती थीं। चतुरसिंग ने दाऊ जी के इन्हीं सब कलाकारिता से प्रभावित होकर लोककला की दुलिया में प्रवेश लिया। चतुर के पिता टहलसिंह भी मंदराजी दाऊ के समकक्ष हारमोनियम वादन करने में सिद्धहस्त थे जो वे आगे चलकर रिंगनी साज के मैनेजर बने। घर में भी संगीत-नाचा के माहौल ने भी चतुरसिंग को उत्प्रेरित किया तथा वे ग्राम के ही कलाकारों छन्नू, इन्दरमन आदि के साथ नाचा पार्टी में शामिल होकर सन् 1963-64 में प्रथमत: डांसर (परी) नाचना शुरू किया। चतुर के पिता गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे उनकी मालगुजार जैसी हैसियत थी अत: लोगों के टोका-टाकी के कारण परी का अभिनय छोड़ नाचा में जोकर (गम्मतिहा) का रोल प्रारंभ कर दिया। वे नाचा के गीतों में उस समय पड़े अकाल का चित्रण इस तरह गा-गा कर किया करते थे -
- सन् पैसठ-छैसठ म कन्हिया ठेंठ भइगे गा... परगे दूनों साल अंकाल मुरिया मेट भइगें गा...।।
- दिखे बर दिखथे संगी बीता भर पेट गा... जीयत भर ले मनखे मन के लेवत हे परेट गा...।।
नाचा गीतों में भी उस समय राष्ट्रीय भावना का संचार होता था जिससे लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे। महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे की भर्त्सना वे इन शब्दों में करते थे-
गोली काबर तंै चलाये... गोली काबर तैं चलाये...?
भारत माता के रतन-बेटा... कोरा ले उठाये...।।
गोली काबर तंै चलाये...? ओ पापी रे... ओ.. बैरी रे...।।
सन् 63-64 में नाचा में गाये जाने वाले उक्त गीत को यहां के एक संगीतकार ने अपना नाम देकर एक चर्चित लोक संस्कृतिक संस्था के खाते में डाल दिया है।
वाद्य वादन- गांव में खंझेरी भजन गायन, रामायण गायन व सांगीतिकी बैठकी के माहौल ने चतुरसिंह को वाद्य-वादन की ओर आकर्षित किया। पहले पहल उन्होंने इस क्षेत्र के ख्यातिनाम नाच पार्टी 'बल्दू-बरातुÓ की पार्टी में बेंजो बजाना शुरू किया। मंदराजी दाऊ अपनी रवेली नाच पार्टी के कलाकारों यथा-मदन, नोहर दास, जगन्नाथ (जनाना परी) के साथ इस समय प्रसिद्धि के शिखर पर थे। ठीक यही समय उनके पिता टहल सिंग रिंगजी साज के ठाकुरराम, बोड़रा, बुलुवा, लालू बावा के साथ पूरे छत्तीसगढ़ में धूम मचा रहे थे। बाद में दोनों नाच पार्टियां एक होकर रिंगनी-खेली के साज रूप में छत्तीसगढ़ में चर्चित हुई ।
सुप्रसिद्ध नाचा पार्टियों में कार्य- चतुरसिंग ने नजदीक के गांव भेड़ीकला की नाच पार्टी (नवा किरन) के साथ 3 वर्षों तक हारमोनियम वादन का कार्य किया। सन् 74-75 में क्षेत्र की सुप्रसिद्ध नाचा पार्टी 'लखोली-रवेली रवि नाचा पार्टी' में जोकर की भूमिका अभिनीत की। बाद में इसके मुख्य कलाकार रवि सेन के हबीब तनवीर के साथ न्यू थियेटर-दिल्ली चले जाने के उपरांत शेष कलाकारों के साथ 'नवां गोंदा नाच पार्टी' का गठन कर उन्होंने हारमोनियम वादन के साथ-साथ जोकर की भूमिका अभिनीत की। इस कार्य में उन्हें मन्नूलाल 'प्यासा' आत्माराम कोशा 'अमात्य, कौशिल्या मरकाम, बोहरिक, ललित, छन्नू, भृगुदाऊ जैसे सिद्धहस्त कलाकारों का साथ मिला। इसके बाद वे छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध नाचा पार्टी-झुमकराम-नियाईक दास के साथ (सत कबीर नाचा दल) में शामिल हो गए। उनकी सहज उपलब्धता व कला के प्रति जिजीविषा के चलते उनकी छत्तीसगढ़ी लोकरंग शैली-नाचा के समर्पण भाव ने उन्हें अंचल की अन्यान्य नाचा पार्टियों यथा- करकुटोला नाचा पार्टी, गुलाबगोंदा नाचा पार्टी, (घोरदा-भरदा) साजा-भेंडरा नाच पार्टी व नाम्ही चोर चरणदास वाली 'टेडेसरा नाच पार्टी' ने उन्हें सम्मानपूर्वक स्थान प्रदान किया।
उपलब्धियां-चतुरसिंग हबीब तनवीर के संगीत निर्देशक देवीलाल नाग के सानिध्य को भी अपनी बड़ी उपलब्धि मानते हैं। संगीतकार आत्माराम कोशा 'अमात्य' के संगीत निर्देशन से सजी आडियो कैसेट- पिया गेहे परदेश, सुरता के संगवारी व लोकप्रिय आडियो एलबम- फुंदरा में हारमोनियम प्लेइंग की है। यही नहीं वे कोशा के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म 'दहेज दानव' में भी भूमिका की है। वे नगर की संस्था चक्रधर कत्थक कल्याण की कला जत्था के साथ जुड़कर विभिन्न स्थानों में कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी। नगर की एक और लोक सांस्कृतिक संस्था- रंग छत्तीसा के साथ भी जुड़कर तथा सुप्रसिद्ध पण्डवानी गायक रेवाराम की महाभारत मण्डली के साथ रहकर देश के विभिन्न स्थानों में प्रस्तुतियां दी हैं। वे मटेवा पार्टी के साथ जहां रवीन्द्र भवन, दिल्ली में वहीं भोपाल भवन के अलावा उन्होंने मुंबई में पूनम विराट के साथ एड फिल्म का संगीत निर्देशन व मंदराजी मंच तथा मोर घर के दीया पार्टी का भी संगीत निर्देशन का काम किया। दूरदर्शन कलाकार अरुणा काचलवार के साथ बनी टीवी फिल्म भरम के भूत तथा हबीब तनवीर के मुख्य कलाकारों रवि सांगोड़े व अमर सिंग के निर्देशन में बनी विडियो फिल्म सपना के छांव में यादगार भूमिका अभिनीत की।
पुरष्कार एवं सम्मान- छत्तीसगढ़ी लोक कला के प्रति अपना सर्वस्व समय लगा देने वाले इस जीवट लोक कलाकार को भोरमदेव लोककला महोत्सव, भिलाई इस्पात संयंत्र, छत्तीसगढ़ी लोककला उन्नयन मंच-भाटापारा, लोककला महोत्सव-तरपोंगी (रायपुर), छत्तीसगढ़ी लोक महोत्सव-नंदिनी माइंस, छग लोककला महोत्सव-हिर्रीमाइंस, दल्लीराजहरा माइंस में सम्मानित किया गया है । शहर की संस्था उद्यांचल ने बेस्ट हारमोनियम वादन के लिए तथा भारत स्काउट गाइड-राजनांदगांव व प्रतिभा परिषद राजनांदगांव ने उनकी श्रेष्ठ कला प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया है। वे मंदराजी लोककला मंच द्वारा आयोजित कार्यशाला में संगीत निर्देशन के लिए पूर्व विधायक स्व. उदय मुदलियार के हाथों सम्मानित हो चुके हैं। यही नहीं चतुरसिंग संस्कृति विभाग छ.ग. शासन रायपुर द्वारा लोककला महोत्सव मंच-मनेरी (डोंगरगांव) में अपनी उत्कृष्ट कला प्रदर्शन के लिए प्रशंसित एवं पूर्व सांसद प्रदीप गांधी के हाथों सम्मानित हो चुके हैं।


