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'सतलुज' फिल्म पर पूर्व आईएएस करण बीर सिद्धू की सलाह, 'इतिहास पूरा दिखाइए, जख्म कुरेदने से बचना चाहिए'

सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी करण बीर सिंह सिद्धू ने फिल्म 'सतलुज' को लेकर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि फिल्म एक संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय को उठाती है, लेकिन यदि इतिहास को प्रस्तुत किया जाए तो उसे पूरी सच्चाई और सभी पक्षों के साथ दिखाया जाना चाहिए, न कि केवल एक पक्ष को।

सतलुज फिल्म पर पूर्व आईएएस करण बीर सिद्धू की सलाह, इतिहास पूरा दिखाइए, जख्म कुरेदने से बचना चाहिए
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चंडीगढ़। सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी करण बीर सिंह सिद्धू ने फिल्म 'सतलुज' को लेकर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि फिल्म एक संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय को उठाती है, लेकिन यदि इतिहास को प्रस्तुत किया जाए तो उसे पूरी सच्चाई और सभी पक्षों के साथ दिखाया जाना चाहिए, न कि केवल एक पक्ष को।

करण बीर सिंह सिद्धू ने बताया कि वह वर्ष 1992 से 1996 तक अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर रहे। इससे पहले दो वर्षों तक वह अतिरिक्त उपायुक्त (विकास) के रूप में भी अमृतसर में कार्यरत रहे। उस समय आज का तरनतारन जिला भी अमृतसर जिले का हिस्सा था। उस वक्त पंजाब कठिन दौर से गुजर रहा था। राष्ट्रपति शासन से लेकर बेअंत सिंह सरकार के कार्यकाल तक पंजाब पुलिस आतंकवाद के खिलाफ लगातार अभियान चला रही थी। 1994 के मध्य तक हालात सामान्य होते दिखाई देने लगे थे, लेकिन 31 अगस्त 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बम विस्फोट में हत्या के कुछ ही दिनों बाद, 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा के कथित अपहरण की घटना सामने आई।

करण बीर सिंह सिद्धू ने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा शिरोमणि अकाली दल के नेता और मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव थे। प्रशासन से उनका नियमित संपर्क रहता था। यदि उन्हें किसी प्रकार की प्रशासनिक समस्या होती थी तो अधिकारी सहायता करने का प्रयास करते थे। साथ ही, वह कथित अवैध दाह संस्कारों को लेकर अपनी स्वतंत्र जांच भी कर रहे थे और इस संबंध में विदेश यात्राएं भी कर चुके थे। 6 सितंबर 1995 की सुबह जब खालड़ा के परिजन और समर्थक उनके पास पहुंचे, तो परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें घर से उठा ले गई है। सबसे पहले उन्होंने अमृतसर के एसएसपी से संपर्क किया, लेकिन वहां से बताया गया कि पुलिस के पास खालड़ा नहीं है। इसके बाद उन्होंने तत्कालीन तरनतारन एसएसपी अजीत सिंह संधू से संपर्क करने का प्रयास किया।

सिद्धू ने बताया कि जब पुलिस की ओर से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिली, तो उन्होंने तत्काल अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट, तरनतारन को मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए। गवाहों के बयान दर्ज किए गए और वाहन संबंधी जानकारी भी एकत्र की गई। मजिस्ट्रेट जांच का उद्देश्य सजा देना नहीं होता, बल्कि गवाहियों के आधार पर प्रारंभिक तथ्यों को स्थापित करना होता है। इसी दौरान जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी और एसजीपीसी के तत्कालीन अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहरा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही कथित अज्ञात शवों के दाह संस्कार संबंधी याचिका लंबित थी। अब उसी याचिकाकर्ता के अचानक लापता हो जाने के कारण अदालत ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया।

करण बीर सिंह सिद्धू ने कहा कि पंजाब सरकार, पुलिस अधिकारियों और जिला प्रशासन से जवाब मांगा गया है। तरनतारन के तत्कालीन एसएसपी अजीत सिंह संधू ने भी हलफनामे में कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा उनकी हिरासत में नहीं हैं। इसके बाद 15 नवंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को नई एफआईआर दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया। सीबीआई ने इस पूरे घटनाक्रम की कड़ी-दर-कड़ी जांच की और यह पता लगाने का प्रयास किया कि अपहरण के बाद क्या हुआ। इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण गवाह तत्कालीन एसपीओ कुलदीप सिंह बने। कुलदीप सिंह ने दावा किया कि जसवंत सिंह खालड़ा को अवैध हिरासत में रखा गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बाद में उन्हें गोली मार दी गई और शव को हरिके नहर क्षेत्र में ले जाकर ठिकाने लगा दिया गया।

सिद्धू ने बताया कि कुलदीप सिंह शुरू में अपनी जान के खतरे के कारण सामने नहीं आए। बाद में उन्होंने 1998 में सीबीआई के समक्ष बयान दिया और फिर एक पक्षकार से सामने अपनी बात सार्वजनिक की ताकि यदि उनके साथ कुछ हो जाए तो उनकी गवाही सुरक्षित रहे। इस मामले में मुख्य बयान और गवाह कुलदीप सिंह का रहा। मामले में लंबी सुनवाई के बाद सीबीआई की विशेष अदालत ने छह पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया। दो को हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा दी गई, जबकि अन्य को अपहरण सहित विभिन्न धाराओं में सजा सुनाई गई। यह एक दुर्लभ मामला था, क्योंकि जसवंत सिंह खालड़ा का शव कभी बरामद नहीं हुआ, फिर भी अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर हत्या को सिद्ध माना।

फिल्म 'सतलुज' पर टिप्पणी करते हुए करण बीर सिंह सिद्धू ने कहा कि कलाकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और यदि यह जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक है तो निर्माता उनका पक्ष दिखा सकते हैं। लेकिन, यदि इतिहास प्रस्तुत किया जा रहा है तो उसे पूर्ण और संतुलित होना चाहिए। फिल्म देखने वाला नया दर्शक यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि भारतीय राज्य ने संगठित रूप से सिख युवाओं के खिलाफ अभियान चलाया था, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी। पंजाब ने आतंकवाद, ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 के दंगे और हजारों निर्दोष नागरिकों तथा पुलिसकर्मियों की शहादत का दर्द झेला है। इसलिए इतिहास को केवल एक दृष्टिकोण से नहीं दिखाया जाना चाहिए।

सिद्धू ने कहा कि आज पंजाब शांति के दौर में है। ऐसे समय में अतीत के घावों को बार-बार कुरेदने के बजाय राज्य की मौजूदा समस्याओं, बेरोजगारी, नशा, कृषि संकट, गैंगस्टर नेटवर्क, सीमा पार से ड्रोन के जरिए हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी, पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। यदि अतीत की निष्पक्ष पड़ताल करनी ही है तो केंद्र सरकार के कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक ट्रुथ कमीशन बनाया जा सकता है, जो पूरे दौर की घटनाओं की संतुलित और निष्पक्ष समीक्षा करे।

करण बीर सिंह सिद्धू ने कहा कि उनका मानना है कि फिल्म का नुकसान उसके संभावित लाभ से अधिक हो सकता है। यदि फिल्म थिएटरों के लिए सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए अनेक संशोधनों के बिना सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य नहीं मानी गई थी, लेकिन वही सामग्री ओटीटी पर बिना समान नियमन के उपलब्ध हो जाती है, तो यह नीति-निर्माताओं के लिए विचार का विषय है। फिल्म अब व्यापक रूप से देखी जा रही है और छोटे बच्चे भी इसे देख रहे हैं। ऐसे में इसका सामाजिक प्रभाव गंभीर हो सकता है। इतिहास को तो अवश्य बताया जाना चाहिए, लेकिन विकृत या एकपक्षीय रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण संदर्भ और सभी पक्षों के साथ।


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