भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद किया तो क्या नुकसान होगा?
भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते की चर्चा इन दिनों जोरों पर है. बाहर से देखने पर यह डील भारत के कई सेक्टरों के लिए फायदेमंद लगती है, लेकिन गहराई में जाने पर कई और चीजें सामने आती हैं

भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते की चर्चा इन दिनों जोरों पर है. बाहर से देखने पर यह डील भारत के कई सेक्टरों के लिए फायदेमंद लगती है, लेकिन गहराई में जाने पर कई और चीजें सामने आती हैं.
बीते 2 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका एक ऐसे व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं, जिसके तहत भारतीय वस्तुओं पर लगे प्रभावी टैरिफ को 50 फीसदी से घटाकर (दंडात्मक टैरिफ मिलाकर) 18 फीसदी कर दिया गया है.
साथ ही, ट्रंप ने भारत से भी एक सच्चे दोस्त की तरह ऐसा ही करने की उम्मीद जताते हुए कहा कि भारत भी अमेरिकी सामानों पर लगाए गए टैरिफों को घटाकर उन्हें ‘जीरो' करने की दिशा में आगे बढ़ेगा.
अमेरिका की 'पांचों उंगलियां घी में'
इसी व्यापार समझौते का हवाला देते हुए अमेरिका ने कहा कि भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से तेल खरीदना बंद करके वेनेजुएला से तेल खरीदेगा. ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया कि अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा, तो रूस की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी और यूक्रेन युद्ध को रोकना आसान हो जाएगा.
लेकिन वैश्विक कूटनीति में अक्सर जो कहा जाता है और जो किया जाता है, उसमें जमीन-आसमान का फर्क होता है. भारत और अमेरिका के संबंधों में ठीक ऐसा ही हो रहा है. भारत को टैरिफ में मिलने वाली रियायत मुफ्त नहीं है. इसके पीछे अमेरिका का स्वार्थ यह है कि वह भारत को न केवल रूस से दूर करके अपने पाले में लाना चाहता है बल्कि वेनेजुएला से निकलने वाला तेल बेचकर मोटा मुनाफा भी कमाना चाहता है.
इंडियन फॉरेन पॉलिसी की जानकार और ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर एलिजाबेथ रोश कहती हैं कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए सिर्फ रूस पर निर्भर नहीं है.
डीडब्ल्यू हिन्दी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "भारत कई सालों से अपनी रक्षा खरीद में विविधता ला रहा है – यानी रूस से ज्यादा अमेरिका, फ्रांस और इस्राएल से सैन्य सामान खरीद रहा है. उन्होंने कहा, "अगर 2018 के बाद रूस के साथ भारत के डिफेंस ऑर्डर्स को देखें, तो एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को छोड़कर कोई बड़ा नया ऑर्डर नहीं है. इसलिए अगर भारत रक्षा और तकनीक के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) की तरफ देखता है और वहां की सप्लाई चेन से जुड़ता है, तो मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं दिखती."
वेनेजुएला का विकल्प: उम्मीद बनाम हकीकत
अमेरिका ने सुझाव दिया है कि भारत रूसी तेल की जगह वेनेजुएला से तेल खरीदे. सुनने में यह एक सीधा समाधान लगता है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसमें कई बड़ी बाधाएं हैं. सबसे पहली चुनौती लॉजिस्टिक्स की है. रूस से तेल भारत पहुंचने में औसतन 36 दिन लगते हैं, जबकि अमेरिका या वेनेजुएला से तेल आने में लगभग 54 दिन का समय लगता है.
दूरी बढ़ने का सीधा असर लागत पर पड़ता है. अनुमान है कि वेनेजुएला से तेल मंगाने पर भारत को प्रति बैरल करीब 2 डॉलर अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा. इसके अलावा, क्षमता में भी बड़ा अंतर है. रूस से भारत रोजाना लगभग 16 लाख बैरल तेल आयात करता था, जबकि वेनेजुएला का कुल उत्पादन ही बमुश्किल 9 लाख बैरल प्रतिदिन है. ऐसे में यह सोचना बेमानी है कि वेनेजुएला अकेले दम पर रूसी आपूर्ति की भरपाई कर पाएगा.
दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में पोलिटिकल साइंस की प्रोफेसर रेशमी काजी कहती हैं कि यह काफी मुश्किल है. उन्होंने डीडब्ल्यू हिन्दी से कहा, "वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, लेकिन इसका वास्तविक उत्पादन बहुत कम रहा है. हाल के समय में लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन या उससे भी कम. तो भले ही वेनेजुएला का उत्पादन अमेरिकी प्रतिबंधों और निवेश की कमी से उबर जाए, फिर भी निकट भविष्य में ऐसा कोई रास्ता नहीं दिखता कि वह अकेले रूस से मिलने वाले तेल की मात्रा की बराबरी कर सके."
निजी कंपनियों का मुनाफा और सरकार का नुकसान
भारत में विदेशों से जो भी कच्चा तेल आता है, उसे बड़ी-बड़ी रिफाइनरियों में साफ करने के बाद इस्तेमाल के लायक बनाया जाता है. भारत में तेल रिफाइनिंग सेक्टर दो हिस्सों में बंटा है - प्राइवेट और सरकारी (पीएसयू).
रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी और नायरा एनर्जी (जिसमें रूसी हिस्सेदारी भी है) के पास ऐसी उन्नत तकनीक है, जो वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को साफ करके इस्तेमाल करने लायक बना सकती है. हालिया आंकड़ों के मुताबिक, रिलायंस ने दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में रूसी तेल का आयात कम किया है.
दूसरी तरफ, भारत की सरकारी तेल कंपनियां (जैसे- आईओसीएल, बीपीसीएल) की रिफाइनरियां मुख्य रूप से रूसी या मध्य पूर्वी देशों से आने वाले कच्चे तेल के लिए डिजाइन की गई हैं. वे वेनेजुएला के तेल को उतनी कुशलता और मुनाफे के साथ रिफाइन नहीं कर सकतीं.
अगर भारत पूरी तरह से रूसी तेल को नकारता है, तो सरकारी कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा, जबकि प्राइवेट कंपनियां 'वेनेजुएला रूट' से मुनाफा कमाती रहेंगी. प्रोफेसर काजी मानती हैं कि ऐसी स्थिति में आर्थिक बोझ वापस सरकार पर आ सकता है. ऐसे में सरकार को सरकारी कंपनियों (पीएसयू) को पारदर्शी तरीके से मुआवजा देना होगा और इसे अपने खातों में सब्सिडी के रूप में दिखाना होगा.
उन्होंने कहा, "इसके जोखिम साफ हैं क्योंकि इस असमानता से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है. यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है क्योंकि इससे जनता में नाराजगी हो सकती है. इसलिए सरकार को बहुत नपा-तुला रवैया अपनाना होगा ताकि यह असमानता इतनी जाहिर न हो जाए कि राजनीतिक विरोध शुरू हो जाएं.”
'मदर ऑफ ऑल डील्स' से डर गया अमेरिका?
डॉनल्ड ट्रंप द्वारा टैरिफ कम करने के पीछे एक बड़ा कारण 'यूरोपियन यूनियन-इंडिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' भी है. इस समझौते के तहत लगभग 99.5 फीसदी भारतीय उत्पादों पर अब यूरोप में कोई शुल्क नहीं लगेगा. इसका सीधा मतलब है कि अमेरिकी कंपनियों को भारत और यूरोप, दोनों बाजारों में कड़ी टक्कर मिल सकती है.
अमेरिकी मैनुफैक्चरिंग, खास तौर मशीनरी और कृषि उत्पादकों पर इसका बुरा असर पड़ सकता है. यूरोपीय मशीनरी अगर भारत में 20-30 फीसदी सस्ती मिलेगी, तो अमेरिकी सामान कौन खरीदेगा. इसी डर ने ट्रंप को मजबूर किया है कि वे भारत के साथ जल्द से जल्द व्यापार समझौता साइन करें, ताकि अमेरिकी कंपनियों का मार्केट शेयर बचा रहे.
भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनैतिक है. अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है, तो मौके का फायदा उठाते हुए चीन रूस का सबसे बड़ा ग्राहक बन सकता है. इसका परिणाम यह होगा कि रूस की चीन पर निर्भरता बढ़ जाएगी.
प्रोफेसर रेशमी काजी कहती हैं कि असली सवाल यह है कि क्या रूस पहले से ही चीन की तरफ पूरी तरह झुक चुका है - चाहे भारत तेल खरीदे या न खरीदे.
उन्होंने कहा, "2022 के बाद से ही चीन और रूस के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है. इसके अलावा, हाल के दिनों में उनके बीच सैन्य अभ्यास, आर्कटिक सहयोग और तकनीक जैसे मामलों में रिश्ते बहुत गहरे हुए हैं. जब रूस और चीन का गठबंधन पहले ही पक्का हो चुका है, तो ऐसे में भारत का तेल खरीदना उन्हें एक-दूसरे के करीब आने से रोकने में बहुत कम असरदार है. भारत का तेल व्यापार मॉस्को को कमाई का एक जरिया तो दे सकता है, लेकिन यह रूस की लंबी अवधि की रणनीतिक दिशा को शायद ही बदल पाए.”
भारत, रूस और चीन का 'लव ट्राएंगल'
रूस और चीन का गठजोड़ भारत के सुरक्षा हितों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. भारत हमेशा से चाहता है कि रूस एक स्वतंत्र शक्ति बना रहे, न कि चीन का जूनियर पार्टनर. अगर भारत अमेरिका के दबाव में आकर रूस को छोड़ता है, तो वह अपने पड़ोसी चीन को और ज्यादा शक्तिशाली बना देगा.
भारत और रूस के बीच स्थानीय मुद्रा (रुपया और रूबल) में ही व्यापार होता है. भारत ने तेल के बदले रूस को रुपये में जो भुगतान किया है, उससे रूस के पास भारतीय रुपये का एक बड़ा फंड जमा हो गया है. समझौते के मुताबिक, रूस इस पैसे को भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में निवेश करने वाला है.
अगर भारत तेल खरीदना बंद करता है, तो यह पूरा तंत्र ध्वस्त हो सकता है. रूस के पास जमा अरबों रुपया न तो रूस इस्तेमाल कर पाएगा और न ही भारत को निवेश के रूप में यह वापस मिलेगा. भारत के लिए यह एक बड़ा आर्थिक नुकसान साबित हो सकता है.
प्रोफेसर रोश कहती हैं, "असली मुद्दा भारत का रूसी कच्चा तेल खरीदना कम करना हो सकता है. भारत-रूस रिश्तों के लिए यह ज्यादा चिंता की बात है. रक्षा के लिए अमेरिका और ईयू की तरफ जाने की तुलना में तेल का मुद्दा ज्यादा असर डाल सकता है. हमें देखना होगा कि इसका भारत के रूस के साथ रक्षा रिश्तों पर क्या असर पड़ता है, क्योंकि मौजूदा सिस्टम के कल-पुर्जों और रखरखाव के लिए भारत की रूस पर निर्भरता अभी कुछ समय तक बनी रहेगी."
भारत के किसानों का विरोध
इस व्यापार समझौता का सबसे ज्यादा विरोध भारत के कृषि क्षेत्र में हो रहा है. समझौते के तहत, भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले सेब, अखरोट, बादाम और दालों पर से वह अतिरिक्त टैरिफ हटा दिया है जो 2019 में लगाया गया था.
किसानों को डर है कि अमेरिका अपनी डेयरी इंडस्ट्री (दूध और पनीर) और जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों के लिए भी भारत के दरवाजे खुलवाना चाहता है. अमेरिका लंबे समय से भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अमेरिकी 'फ्रोजन चिकन लेग्स' और डेयरी उत्पादों को भारतीय बाजार में बेचने की अनुमति दे.
इस पर प्रोफेसर रोश कहती हैं, "विचार यह है कि अमेरिका से ऐसे किसी भी आयात पर स्पष्ट रूप से लेबल लगा होगा ताकि ग्राहकों के पास यह चुनने का साफ विकल्प हो कि वे ये उत्पाद खरीदें या भारतीय किसानों का सामान खरीदें. अगर लोग नहीं खरीदेंगे, तो मांग नहीं होगी और आयातक अपने आप आयात बंद कर देंगे."
भारतीय किसान, जो ज्यादातर छोटे और सीमांत हैं, अमेरिका की विशालकाय कॉरपोरेट खेती का मुकाबला नहीं कर सकते. उन्हें डर है कि उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी.
प्रोफेसर रोश कहती हैं, "जहां तक खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका का सवाल है, भारत में कोई भी सरकार इन्हें खतरे में डालने का जोखिम नहीं उठा सकती. जब सरकार ने 2020 में एक बिल के जरिए कृषि सुधार लाने की कोशिश की थी तो क्या हुआ था. 2021 में किसानों के विरोध के बाद उसे वापस ले लिया गया था. किसी भी सरकार के लिए ये दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं और मुझे यकीन है कि इस सरकार ने अंतरिम समझौते पर बातचीत करते समय इन दोनों बातों का ध्यान रखा होगा."


