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शेयर बाजार में भारी गिरावट: सेंसेक्स 72 हजार के नीचे, निवेशकों को 9 लाख करोड़ से ज्यादा का नुकसान

सप्ताह के पहले कारोबारी दिन बीएसई सेंसेक्स 1,635.67 अंक या 2.22% गिरकर 71,947.55 पर बंद हुआ। दिन के दौरान यह 1,809 अंक तक लुढ़ककर 71,774.13 के स्तर तक पहुंच गया।

शेयर बाजार में भारी गिरावट: सेंसेक्स 72 हजार के नीचे, निवेशकों को 9 लाख करोड़ से ज्यादा का नुकसान
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मुंबई: वित्त वर्ष 2025-26 के अंतिम कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के चलते निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा। सोमवार को सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही प्रमुख सूचकांक तेज गिरावट के साथ बंद हुए, जिससे निवेशकों को करीब 9.43 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

सेंसेक्स-निफ्टी में बड़ी गिरावट

सप्ताह के पहले कारोबारी दिन बीएसई सेंसेक्स 1,635.67 अंक या 2.22% गिरकर 71,947.55 पर बंद हुआ। दिन के दौरान यह 1,809 अंक तक लुढ़ककर 71,774.13 के स्तर तक पहुंच गया। वहीं, एनएसई निफ्टी 488.20 अंक या 2.14% टूटकर 22,331.40 पर बंद हुआ। यह लगातार दूसरा सत्र है जब बाजार में इतनी बड़ी गिरावट देखने को मिली है। खास बात यह रही कि सेंसेक्स करीब 26 महीनों में पहली बार 72,000 के स्तर से नीचे बंद हुआ।

मार्च बना सबसे खराब महीनों में से एक

मार्च महीने में बाजार का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में लगभग 10.5% की गिरावट दर्ज की गई, जो मार्च 2020 के बाद सबसे खराब मासिक प्रदर्शन माना जा रहा है। यह वित्त वर्ष 2020 के बाद का सबसे कमजोर वार्षिक प्रदर्शन भी साबित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार वैश्विक अनिश्चितता और पूंजी की निकासी ने बाजार की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।

निवेशकों की संपत्ति में बड़ी गिरावट

बाजार में आई इस तेज गिरावट का सीधा असर निवेशकों की संपत्ति पर पड़ा। एक ही दिन में निवेशकों के पोर्टफोलियो से करीब 9.43 लाख करोड़ रुपये साफ हो गए। बाजार की चौड़ाई (market breadth) भी नकारात्मक रही- 837 शेयरों में बढ़त, 3,419 शेयरों में गिरावट, 138 शेयर स्थिर रहे। यह आंकड़े बाजार में व्यापक बिकवाली का संकेत देते हैं।

गिरावट की बड़ी वजहें


1. पश्चिम एशिया में युद्ध का असर

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है। अमेरिकी सैन्य तैनाती और संभावित जमीनी ऑपरेशन की खबरों ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है। इस संघर्ष के और फैलने की आशंका से बाजार में जोखिम लेने की क्षमता कम हुई है।

2. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल

ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि इससे महंगाई और चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद रहता है, तो तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।

3. रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर

भारतीय रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 95 के पार पहुंच गया, जिससे बाजार का मनोबल और कमजोर हुआ। कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ाता है और आयात लागत को भी महंगा करता है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है।

4. विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली

विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार 20वें सत्र में नेट सेलर बने रहे। हाल ही में उन्होंने एक दिन में 4,367 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। लगातार पूंजी निकासी से बाजार में तरलता कम हो रही है और गिरावट का दबाव बढ़ रहा है।

5. RBI के फैसले का असर

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों की विदेशी मुद्रा पोजिशन पर सीमा तय करने के फैसले का असर बैंकिंग शेयरों पर पड़ा। इस कदम के चलते कई बैंकों को अपनी आर्बिट्राज पोजिशन बंद करनी पड़ी, जिससे बैंकिंग सेक्टर में बिकवाली बढ़ी और बाजार नीचे आया।

6. वैश्विक बाजारों में कमजोरी

एशियाई और अमेरिकी बाजारों में भी गिरावट देखने को मिली। जापान का निक्केई 3% से अधिक गिरा, कोस्पी और ताइवान इंडेक्स में 2-3% गिरावटअमेरिका में S&P 500 और नैस्डैक भी कमजोर रहे, इस वैश्विक रुझान का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा।

F&O एक्सपायरी ने बढ़ाया उतार-चढ़ाव

सोमवार को निफ्टी के फ्यूचर्स और ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स की मासिक एक्सपायरी भी थी। आमतौर पर ऐसे दिनों में बाजार में अस्थिरता बढ़ जाती है, क्योंकि ट्रेडर्स अपनी पोजिशन एडजस्ट करते हैं। इस बार भी एक्सपायरी के चलते बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला।

कई मोर्चों से दबाव में बाजार

शेयर बाजार की मौजूदा गिरावट केवल एक कारण से नहीं, बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। जब तक वैश्विक तनाव कम नहीं होता, तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती और विदेशी निवेश वापस नहीं लौटता, तब तक बाजार में स्थिरता की उम्मीद सीमित ही रहेगी। निवेशकों के लिए यह समय सतर्क रहने और दीर्घकालिक रणनीति अपनाने का संकेत दे रहा है।


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