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भारत का स्वच्छ ऊर्जा विस्तार कम कार्बन वाले ऊर्जा स्रोतों की ओर एक निर्णायक संरचनात्मक बदलाव का प्रतीक : केंद्र

भारत का स्वच्छ ऊर्जा विस्तार, जीवाश्म-ईंधन पर निर्भरता से हटकर विविध और कम कार्बन वाले ऊर्जा स्रोतों की ओर एक निर्णायक संरचनात्मक बदलाव का प्रतीक है

भारत का स्वच्छ ऊर्जा विस्तार कम कार्बन वाले ऊर्जा स्रोतों की ओर एक निर्णायक संरचनात्मक बदलाव का प्रतीक : केंद्र
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नई दिल्ली। भारत का स्वच्छ ऊर्जा विस्तार, जीवाश्म-ईंधन पर निर्भरता से हटकर विविध और कम कार्बन वाले ऊर्जा स्रोतों की ओर एक निर्णायक संरचनात्मक बदलाव का प्रतीक है। यह जानकारी केंद्र सरकार द्वारा मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई।

रिपोर्ट में कहा गया कि 'जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन' के तहत की गई प्रतिबद्धताओं और घरेलू सुधारों से निर्देशित, इस ट्रांजिशन का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा, स्थिरता और दीर्घकालिक आर्थिक सुदृढ़ता को बढ़ाना है।

भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से 50 प्रतिशत से अधिक संचयी स्थापित बिजली क्षमता हासिल कर ली, जो उसके 2030 के लक्ष्य से पांच वर्ष पहले है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि 31 जनवरी 2026 तक, भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता 520,510.95 मेगावाट है। इसमें 248,541.62 मेगावाट जीवाश्म ईंधनों से और 271,969.33 मेगावाट गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त होता है। गैर-जीवाश्म घटक में 8,780 मेगावाट परमाणु ऊर्जा और 263,189.33 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा शामिल है।

अंतरराष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (आईआरइएनए) के अक्षय ऊर्जा सांख्यिकी 2025 (दिसंबर 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार) के आधार पर, वैश्विक स्तर पर भारत सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता में तीसरे स्थान पर, पवन ऊर्जा की क्षमता में चौथे स्थान पर और कुल नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता में चौथे स्थान पर है।

रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में एनर्जी ट्रांजिशन हर स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। 9 अक्टूबर 2022 को गुजरात का मोढेरा एकीकृत सौर प्रणालियों के माध्यम से चौबीसों घंटे स्वच्छ ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने वाला भारत का पहला 24x7 सौर ऊर्जा संचालित गांव बन गया। इसी क्रम में, मध्य प्रदेश का ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर पार्क (4 जनवरी 2025 तक की स्थिति के अनुसार) भारत का सबसे बड़ा और एशिया के सबसे बड़े फ्लोटिंग सोलर पार्कों में से एक है। इस तरह की परियोजनाएं न केवल संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करती हैं, बल्कि नवाचार के माध्यम से देश की अक्षय ऊर्जा क्षमता का विस्तार भी करती हैं।

ऊर्जा दक्षता में सुधार, क्षमता विस्तार के पूरक होते हैं। बिजली क्षेत्र की कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन तीव्रता, जीडीपी की प्रति इकाई के हिसाब से, 2015–16 में 1 करोड़ रुपए पर 61.45 टन से घटकर 2022–23 में 1 करोड़ रुपए पर 40.52 टन हो गई, यह स्वच्छ विकास के रास्तों और तकनीकी सुधारों को दर्शाता है।

सरकार के मुताबिक, दक्षता में हुई इन वृद्धियों को उन नीतिगत साधनों का समर्थन प्राप्त है, जो विभिन्न क्षेत्रों में दीर्घकालिक उत्सर्जन कटौती को सुदृढ़ करते हैं। इस गति को बनाए रखने के लिए, भारत की जलवायु रणनीति विनियामक ढांचों को बाजार-आधारित तंत्रों और तकनीकी नवाचार के साथ जोड़ती है, जिससे जवाबदेही मजबूत होती है और कम-कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की ओर ट्रांजिशन की प्रक्रिया तेज होती है।


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