धार्मिक नेताओं ने दुनिया में बढ़ती नफरत को लेकर चेताया, रक्षा बंधन को सुरक्षा और जिम्मेदारी के प्रतीक के तौर पर दिखाया
प्रमुख धार्मिक नेताओं की ओर से चेतावनी दी गई है कि सीमाओं के पार नफरत तेजी से फैल रही है, जबकि मानवता सशस्त्र संघर्षों, विस्थापन, पूर्वाग्रह और उभरती हुई टेक्नोलॉजी के बुरे प्रभावों से जूझ रही है।

न्यूयॉर्क। प्रमुख धार्मिक नेताओं की ओर से चेतावनी दी गई है कि सीमाओं के पार नफरत तेजी से फैल रही है, जबकि मानवता सशस्त्र संघर्षों, विस्थापन, पूर्वाग्रह और उभरती हुई टेक्नोलॉजी के बुरे प्रभावों से जूझ रही है। न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 'यूनिवर्सल वननेस' (सबकी एकता) कार्यक्रम को संबोधित करते हुए, यहूदी, ईसाई और मुस्लिम वक्ताओं की ओर से बातचीत, करुणा और इंसानियत की साझा पहचान को फिर से पहचानने का आह्वान किया गया।
'यूनिवर्सल वननेस' कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत और कई देशों के धार्मिक प्रतिनिधि शामिल हुए।
'वर्ल्ड काउंसिल ऑफ रिलीजियस लीडर्स' के संस्थापक महासचिव बाबा जैन ने 30 देशों के प्रमुख धर्मों के 200 से ज्यादा प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के बाद तैयार किया गया एक 'कॉल टू एक्शन' (कार्रवाई का आह्वान) पेश किया।
बाबा जैन ने कहा, "हम जानते हैं कि आस्था में ठीक करने, सुलह कराने और प्रेरित करने की अद्भुत शक्ति है। और यह भी एक दुखद सच है कि धर्म का इस्तेमाल कभी-कभी लोगों को बांटने, अलग-थलग करने और हिंसा को सही ठहराने के लिए किया गया है।" उन्होंने कहा कि धार्मिक नेताओं को सबसे पहले अपने समुदायों के भीतर के शब्दों, शिक्षाओं, संस्थाओं और रीति-रिवाजों की समीक्षा करनी चाहिए।
उन्होंने कहा, "हम नफरत, अपमान, अमानवीय व्यवहार या हिंसा को सही ठहराने के लिए धर्म के इस्तेमाल को नकारेंगे और सिखाएंगे कि गहरी आस्था और अलग-अलग विश्वास रखने वालों के प्रति सम्मान, दोनों एक साथ हो सकते हैं।" जैन ने धार्मिक समुदायों से संकट आने से पहले ही रिश्ते बनाने और युवाओं को धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे एक साथ लाने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा, "जिस व्यक्ति को हम जानते हैं, उससे नफरत करना मुश्किल होता है।"
इमाम शरीफ ने कहा कि इस कार्यक्रम की सफलता इस बात से मापी जाएगी कि इसमें शामिल लोग कार्यक्रम स्थल से जाने के बाद क्या करते हैं। उन्होंने आगे कहा, "सवाल यह है कि आज हमारे यहां होने की वजह से कल क्या अलग होगा।" उन्होंने कहा, "अगर हम यहां से गहरे रिश्तों, नए साहस, साझा जिम्मेदारी और काम करने के संकल्प के साथ जाते हैं, तो शायद हमने कुछ बहुत बड़ी चीज की शुरुआत करने में मदद की होगी।"
शरीफ ने कहा कि एकता को एकरूपता (सबका एक जैसा होना) नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा, "एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए हमें एक जैसा बनने की जरूरत नहीं है। एकता के लिए एक जैसा होना जरूरी नहीं है। गहरी आस्था के लिए दूसरों के प्रति नफरत या तिरस्कार की जरूरत नहीं है।" उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीकी तरक्की ने इंसानियत की सबसे पुरानी प्रवृत्तियों को खत्म नहीं किया है।
शरीफ़ ने कहा, "नफरत सीमाओं के पार और हमारी स्क्रीन के जरिए पहले से कहीं ज्यादा तेजी से फैल रही है। टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है, जबकि इंसानियत नफरत, पूर्वाग्रह, अहंकार, समूह में बंटना, अमानवीय व्यवहार और वर्चस्व के संघर्ष से जूझ रही है।"
रेवरेंड थॉर्न ने कहा कि लोगों को बार-बार यह बताया जा रहा है कि उन्हें किससे डरना चाहिए, किसे दोषी ठहराना चाहिए या किसे अलग-थलग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस सभा ने एक अलग संदेश दिया। उन्होंने आगे कहा, "जब भी इंसान पीछे हटने के बजाय एक साथ आने, चिल्लाने के बजाय सुनने और बुराई करने के बजाय समझने का रास्ता चुनते हैं, तो कुछ पवित्र होता है।" थॉर्न ने आगे कहा, "हमारे ओहदों, धर्मों, राजनीति और नक्शे पर बनी सीमाओं से पहले, हम इंसान हैं, ईश्वर की संतान हैं।"
रब्बी ब्लुमेंथल ने कहा कि यहूदी शिक्षाओं के अनुसार, हर इंसान में ईश्वरीय अंश होता है और उसका मूल्य अनमोल होता है। उन्होंने आगे कहा, "हम सभी बराबर हैं, महत्वपूर्ण हैं और प्यार के हकदार हैं, क्योंकि जब ईश्वर हमें देखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वे आईने में खुद को देख रहे हों।" उन्होंने कहा कि धर्म का मतलब सिर्फ ईश्वर में विश्वास करना ही नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि ईश्वर को इंसानियत पर भरोसा है। ब्लुमेंथल ने कहा, "मेरा मानना है कि आज हमारे समाज में जो परेशानियां हैं, उनकी एक बड़ी वजह हमारा अकेलापन है।" उन्होंने लोगों से एक-दूसरे के साथ "जुड़ाव, प्यार और सम्मान" का रिश्ता बनाने की अपील की।
इस कार्यक्रम में रक्षा बंधन और राखी बांधने की रस्म को देखभाल, सुरक्षा और आपसी जिम्मेदारी के प्रतीक के तौर पर दिखाया गया। लोगों को इस रिश्ते को सिर्फ परिवार तक ही सीमित न रखकर पड़ोसियों, अजनबियों और अलग-अलग धार्मिक समुदायों तक भी बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
बता दें कि भागवत 2009 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का नेतृत्व कर रहे हैं। 1925 में स्थापित आरएसएस अपनी स्थापना के 100 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है, और इस मौके का इस्तेमाल सामाजिक संगठन और सेवा के अपने संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए कर रहा है।


