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भाजपा ने कवि तिरुवल्लुवर के मुद्दे पर द्रमुक को घेरा, मुरलीधर ने दी चुनौती

प्राचीन तमिल कवि तिरुवल्लुवर की भगवा कपड़ों और माथे पर विभूति लगी तस्वीर जारी किए जाने पर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने हंगामा खड़ा कर दिया तो भाजपा ने तीखा पलटवार किया

भाजपा ने कवि तिरुवल्लुवर के मुद्दे पर द्रमुक को घेरा, मुरलीधर ने दी चुनौती
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नई दिल्ली। प्राचीन तमिल कवि तिरुवल्लुवर की भगवा कपड़ों और माथे पर विभूति लगी तस्वीर जारी किए जाने पर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने हंगामा खड़ा कर दिया तो भाजपा ने तीखा पलटवार किया।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव पी. मुरलीधर ने आईएएनएस से कहा कि संत तिरुवल्लुवर कोई द्रमुक नेता नहीं, बल्कि महान संत थे। उन्होंने द्रमुक को चुनौती देते हुए कहा, "हिम्मत है तो माथे पर विभूति लगाने को तमिल विरोधी कृत्य घोषित कर दें, खुद तमिलियन इसका जवाब दे देंगे।"

दरअसल, तमिलनाडु की भाजपा इकाई ने ट्विटर हैंडल से हाल में तमिल कवि तिरुवल्लुवर की केसरिया वस्त्रों वाली तस्वीर जारी की थी। इस तस्वीर में हिंदू संत-महात्माओं की तरह तिरुवल्लुवर के माथे पर चंदन व राख की विभूति लगी हुई है। डीएमके नेताओं ने इसका विरोध करते हुए भाजपा पर तिरुवल्लुवर का अपमान करने का आरोप लगाया।

इस मुद्दे पर मुरलीधर ने कहा, "लाखों-करोड़ों लोगों के पूज्य महान संत तिरुवल्लुवर भारत ही नहीं, विश्व के लिए आदर्श हैं, उन्हें भाजपा आदर्श मानती है। मगर, डीएमके महान संत को संकीर्ण दायरे में कैद करना चाहती है, जिसका हम विरोध करते हैं।"

भाजपा महासचिव ने कहा कि द्रमुक ने सत्ता के लिए हमेशा तमिलों को धोखा दिया। उन्होंने कहा, "हम हमेशा उन्हें केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों पर सुशासन के लिए रोल मॉडल मानते हैं। वह न केवल भारत और भारतीयों के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक आदर्श हैं।"

पी. मुरलीधर ने कहा, "मैं द्रमुक नेता स्टालिन को चुनौती देता हूं कि वह माथे पर विभूति को तमिल विरोधी कहकर दिखा दें। तिरुवल्लुवर द्रमुक के नेता नहीं बल्कि संत थे। वह सार्वभौमिक मूल्यों के लिए जीते थे जो संपूर्ण मानवता के लिए लागू होते हैं। कभी भी सांप्रदायिक मूल्यों के पक्षधर नहीं थे। एमके स्टालिन को संत की संकीर्ण व्याख्या से बचना चाहिए।

कौन हैं तिरुवल्लुवर?

प्राचीन कवि तिरुवल्लुवर का नाम तमिलनाडु में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जन्म मायलापुर में हुआ था। उनका जन्म कब हुआ, इसका कोई प्रामाणिक समय नहीं है। हालांकि, कहा जाता है कि वह दो हजार साल पहले मायलापुर में रहते थे। संत तिरुवल्लुवर ने लोगों को बताया कि दिव्य जीवन के लिए परिवार को छोड़कर संन्यासी बनने की जरूरत नहीं है। गृहस्थ की जिम्मेदारियों के साथ भी पवित्र जीवन जिया जा सकता है।

उनकी शिक्षाएं 'तिरुक्कुरल' नामक पुस्तक में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते दिनों थाईलैंड में तमिल क्लासिक 'तिरुक्कुरल' का थाई अनुवाद भी जारी कर चुके हैं। जनता में जबर्दस्त प्रभाव के कारण ही तमिलनाडु के राजनीतिक दल तिरुवल्लुवर की विरासत पर हक जताते हैं।


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