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भाजपा को उम्मीद है यूसीसी ही पार करेगी उसकी नैया

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ परिवार के तीनों मुख्य एजेंडे को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं

भाजपा को उम्मीद है यूसीसी ही पार करेगी उसकी नैया
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- कल्याणी शंकर

यूसीसी की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई। ब्रिटिश सरकार ने 1835 में भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की सिफारिश की थी। यूसीसी का इरादा विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार, विरासत और रखरखाव सहित सभी व्यक्तिगत धार्मिक कानूनों को एकीकृत करने का है।

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ परिवार के तीनों मुख्य एजेंडे को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं? उन्होंने अपने शासन के पिछले नौ वर्षों में अन्य दो मुद्दों- अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और अनुच्छेद 370 को रद्द करना- को लागू किया।

समान नागरिक संहिता लागू करना अभी भी विचाराधीन है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या भारत को ऐसे कानून की आवश्यकता है और क्या इसे आगे बढ़ाने का यही समय है? 1956 में हिंदू कानूनों के संहिताकरण के बावजूद, भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर अभी तक सहमति नहीं बन पाई है। वर्तमान में कई धार्मिक समुदाय अपने स्वयं के विशिष्ट व्यक्तिगत कानूनों का पालन करते हैं।

यूसीसी एक जटिल मुद्दा है। इस प्रश्न के कई कोण हैं, जैसे राजनीतिक, विधायी, धार्मिक, लैंगिक और संवैधानिक दृष्टिकोण। यूसीसी फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में प्रचलित है। हालांकि, केन्या, पाकिस्तान, इटली, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया और ग्रीस जैसे कुछ देशों के पास यह नहीं है।

विश्लेषकों का मानना है कि पिछले हफ्ते भोपाल में भाजपा कार्यकर्ताओं को अपने संबोधन के दौरान मोदी द्वारा इस मुद्दे को फिर से उठाना कोई आकस्मिक टिप्पणी नहीं थी। उन्होंने हर शब्द को मापा था। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में चुनाव होने वाले हैं।

यूसीसी की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई। ब्रिटिश सरकार ने 1835 में भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की सिफारिश की थी। यूसीसी का इरादा विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार, विरासत और रखरखाव सहित सभी व्यक्तिगत धार्मिक कानूनों को एकीकृत करने का है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। राज्य नीति के सिद्धांतों में से एक में कहा गया है कि यूसीसी आवश्यक है। गोवा एकमात्र भारतीय राज्य है जो समान नागरिक संहिता का पालन करता है। सन् 1867 के पुर्तगाली कानून को भारत द्वारा गोवा को भारत में शामिल करने के बाद भी वैसा ही रहने दिया गया।

संविधान सभा ने इस मुद्दे पर बहस की थी। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यह दावा करते हुए समान नागरिक संहिता पर अपना निर्णय स्थगित कर दिया, 'मुझे नहीं लगता कि वर्तमान समय में, मेरे लिए इसे (यूसीसी) आगे बढ़ाने का प्रयास करने का समय आ गया है'। यदि हमारे संविधान निर्माताओं ने इस मुद्दे पर निर्णय लिया होता तो आज समस्या मौजूद नहीं होती। भारत के विधि आयोग ने यूसीसी की नये सिरे से जांच शुरू की है और जनता से सुझाव मांगे हैं।

यूसीसी कानूनी से अधिक राजनीतिक हो गया है। समर्थक और विरोधी दोनों तरफ बहस करते हैं। समर्थकों का मानना है कि, देर-सबेर, एक सामान्य कानून होना चाहिए जो सभी धार्मिक समुदायों पर लागू हो। भाजपा यूसीसी लाने में विश्वास रखती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने यूसीसी की पुरजोर वकालत करते हुए भोपाल में कहा कि संविधान में समान अधिकार का जिक्र है। 'अगर किसी घर में एक सदस्य के लिए एक कानून होगा और दूसरे के लिए दूसरा, तो क्या घर चल पायेगा? तो ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पायेगा?' प्रधानमंत्री ने पूछा।

उन्होंने तर्क दिया कि समान नागरिक कानून पारित होने से कई मतभेदों और संघर्षों के बावजूद लाभ मिलेगा। यह सभी समुदायों के लिए लैंगिक समानता और सभी के लिए एक कानून प्रदान करेगा। मोदी ने मुसलमानों से आग्रह किया कि वे देखें कि विपक्ष ने उन्हें कैसे उकसाया और उनका शोषण किया


इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में (यूसीसी) के महत्व पर प्रकाश डाला। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह राष्ट्रीय एकता बनाये रखेगा। 1995 में, न्यायालय ने सभी नागरिकों को नियंत्रित करने वाले एक ही कानून की सिफारिश की। 2019 में मोदी सरकार ने शीर्ष अदालत के समक्ष यूसीसी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक न्याय प्रदान करने वाले तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित कर दिया था

इसके विरोधी, कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के नेतृत्व में, यूसीसी का घोर विरोध करते हैं। मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक इसके पक्ष में नहीं हैं, हालांकि कुछ इस्लामिक देशों ने सभी के लिए एक समान कानून अपनाया है। समान नागरिक संहिता के लिए मोदी के आह्वान ने विपक्षी दलों की तीखी आलोचना आकर्षित की है। उनका आरोप है कि मोदी बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी और मणिपुर में हिंसा जैसे रोज़ी-रोटी के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस विषय पर आम सहमति के बिना कोई यूसीसी नहीं हो सकता। विरोधियों का कहना है कि मुसलमान यूसीसी को अपनी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप मानते हैं।

भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में, यूसीसी सभी के लिए एक कानून प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण है। पचहत्तर साल बीत चुके हैं और कई विशेषज्ञों का मानना है कि अब इस देश में इस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है, जहां 65 प्रतिशत युवा हैं। उत्तराखंड को पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से गठित एक आयोग से राज्य के लिए यूसीसी की सिफारिश करने वाली एक रिपोर्ट मिली है। शायद भाजपा का इरादा इसे दूसरे राज्यों में दोहराने का है।

भाजपा सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी यूसीसी कानून के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव का सामना करना चाहेंगे। परन्तु यह एक प्रश्नचिह्न है कि क्या वह इसे आगे बढ़ा सकेंगे? 20 जुलाई को मानसून सत्र के साथ खुलने वाली संसद में संभावना है कि भाजपा विपक्ष की परवाह किये बिना इस कानून को लोकसभा में आगे बढ़ायेगी क्योंकि भगवा पार्टी को आप जैसी कुछ गैर-भाजपा पार्टियों का समर्थन मिल सकता है और राज्यसभा में भी उनका समर्थन प्राप्त करना संभव होगे जहां अभी भी भाजपा और उसके सहयोगियों के पास बहुमत नहीं है।

प्रधानमंत्री को यूसीसी के मुद्दे पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए। कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव इसी साल के अन्त तक हो रहे हैं और अगले साल लोकसभा के आम चुनाव होंगे। प्रधानमंत्री को लगता है कि भाजपा के इस तीसरे मुद्दे को कार्यान्वित करने से पार्टी को हिंदुओं से अधिक समर्थन प्राप्त होगा और इससे उसे आगामी चुनावों में हिन्दुओं और मुसलमानों को विभाजित कर बेहतर प्रदर्शन करने में मदद मिल सकती है।


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