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कांग्रेस, भाजपा को कभी खुशी कभी गम देता रहा बिलासपुर

छत्तीसगढ़ की हाई प्रोफाइल लोकसभा सीट राज्य के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कभी खुशी तो कभी गम की सौगात देता रहा है

कांग्रेस, भाजपा को कभी खुशी कभी गम देता रहा बिलासपुर
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छत्तीसगढ़/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की हाई प्रोफाइल लोकसभा सीट राज्य के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कभी खुशी तो कभी गम की सौगात देता रहा है। अविभाजित मध्य प्रदेश और राज्य पुनर्गठन के बाद बने छत्तीसगढ़ की अति महत्वपूर्ण बिलासपुर लोकसभा सीट समय-समय पर सामान्य और सुरक्षित दोनों ही श्रेणियों में आरक्षित भी होती रही है।

अतीत के झरोंखों में देखा जाए तो बिलासपुर का चुनावी इतिहास बहुत दिलचस्प नजर आता है। सोलह आम चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही सात-सात बार जीत का स्वाद चखा है जबकि एक बार जीत का श्रेय निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गया तथा एक दफा भारतीय लोकदल ने चुनाव जीता। करीब 400 वर्ष पुराने तथा किवदंतियों के मुताबिक एक खूबसूरत मछुआरन ' बिलासा' के नाम पर बना बिलासपुर अपने भीतर कई विभिन्न विशिष्टताओं को समेटे हुए हैं। वर्ष 2000 तक बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र मध्य प्रदेश का हिस्सा था।

पहले आम चुनाव में कांग्रेस के रेशमलाल जांगड़े यहां से सांसद निर्वाचित हुए। जांगड़े ने 1957 के आम चुनाव में अपनी जीत दोहराई। इसके बाद 1962 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार सत्यप्रकाश ने आश्चर्यजनक रूप से चुनावी फतह हासिल की। उन्हें कांग्रेस ने अपना समर्थन दिया था और इस जीत को कांग्रेस ने अपनी जीत मानी। वर्ष 1967 के आम चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस का विजयरथ फिर चल पड़ा और उसके उम्मीदवार अमर सिंह विजयी हुए।

कांग्रेस की जीत का सिलसिला जारी रहा और 1971 के चुनाव में उसके उम्मीदवार राम गोपाल तिवारी ने जीत का परचम लहाराया। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस के विजयरथ को भारतीय लोकदल ने रोक दिया और उसके उम्मीदवार निरंजन प्रसाद केशरवानी ने फतह हासिल की।

वर्ष 1980 के आम चुनाव आने तक कांग्रेस के दो हिस्से हो गये। इस चुनाव में कांग्रेस (आई) के गोदिल प्रसाद अनुरागी ने विजयश्री हासिल की। इसके बाद 1984 में कांग्रेस के खेलनराम जांगड़े ने चुनाव जीतकर पार्टी का वर्चस्व कायम रखा। वर्ष 1989 का आम चुनाव भाजपा के लिए बदलाव लेकर आया।


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