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नीतीश कुमार से आरसीपी सिंह की मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल, जदयू में वापसी की अटकलें फिर तेज

आरसीपी सिंह पिछले वर्ष नवंबर से ही नीतीश कुमार से मिलने का प्रयास कर रहे थे। हालांकि, पार्टी के अंदर मौजूद कुछ नेताओं के विरोध के कारण यह मुलाकात लगातार टलती रही। शनिवार को आखिरकार दोनों नेताओं की मुलाकात संभव हो सकी, जिसे बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

नीतीश कुमार से आरसीपी सिंह की मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल, जदयू में वापसी की अटकलें फिर तेज
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पटना: बिहार की राजनीति में शनिवार को उस समय नई हलचल पैदा हो गई जब पूर्व केंद्रीय मंत्री और जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री एवं जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार से मुलाकात की। लंबे समय से इस मुलाकात की चर्चा चल रही थी और अब इसके होने के बाद आरसीपी सिंह की जदयू में संभावित वापसी को लेकर राजनीतिक अटकलें एक बार फिर तेज हो गई हैं। मुलाकात के बाद आरसीपी सिंह ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी साझा करते हुए लिखा कि उन्होंने अपने नेता नीतीश कुमार से भेंट की और दोनों के बीच आत्मीय माहौल में बातचीत हुई।

लंबे समय से चल रहे थे मुलाकात के प्रयास

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, आरसीपी सिंह पिछले वर्ष नवंबर से ही नीतीश कुमार से मिलने का प्रयास कर रहे थे। हालांकि, पार्टी के अंदर मौजूद कुछ नेताओं के विरोध के कारण यह मुलाकात लगातार टलती रही। शनिवार को आखिरकार दोनों नेताओं की मुलाकात संभव हो सकी, जिसे बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। हालांकि, इस दौरान नीतीश कुमार के आवास के बाहर कुछ आरसीपी समर्थकों ने जदयू नेता एवं विधान परिषद सदस्य संजय गांधी के खिलाफ नारेबाजी भी की। समर्थकों का आरोप था कि संजय गांधी ही दोनों नेताओं की मुलाकात में अब तक बाधा बने हुए थे।

मुलाकात पर आरसीपी सिंह का बयान

आरसीपी सिंह ने मुलाकात के बाद कहा कि उनकी नीतीश कुमार से अच्छी बातचीत हुई। हालांकि उन्होंने बातचीत के विषयों का विस्तार से खुलासा नहीं किया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वर्तमान समय में नीतीश कुमार आमतौर पर सीमित बातचीत ही करते हैं और मुलाकात के दौरान औपचारिक अभिवादन तथा हालचाल पूछने तक ही सीमित रहते हैं। इसके बावजूद आरसीपी सिंह का उनके आवास तक पहुंचना और मुलाकात होना अपने आप में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

जदयू में वापसी की अटकलें क्यों तेज हुईं?

इस मुलाकात के बाद सबसे ज्यादा चर्चा आरसीपी सिंह की जदयू में संभावित वापसी को लेकर हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि दोनों नेताओं के बीच संवाद का सिलसिला आगे बढ़ता है तो भविष्य में आरसीपी सिंह की पार्टी में नई भूमिका तय हो सकती है। रिपोर्टों के अनुसार, अब आगे की संभावित राजनीतिक प्रक्रिया में स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हाल ही में जदयू की प्रदेश और राष्ट्रीय परिषद की बैठकों में उनके नेतृत्व को सर्वसम्मति से समर्थन मिला था। ऐसे में पार्टी के बड़े फैसलों में उनकी राय को भी अहम माना जा रहा है।

आरसीपी बोले- मैं कभी जदयू से अलग नहीं हुआ

आरसीपी सिंह ने कहा कि उन्होंने वर्षों तक जदयू के संगठन को मजबूत करने का काम किया और पार्टी की इकाइयों को बूथ स्तर तक विस्तार देने में योगदान दिया। उनका कहना था कि वह खुद को कभी जदयू से अलग नहीं मानते। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के लिए उनका समर्पण हमेशा बना रहा है और उन्होंने संगठन को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया।

जदयू से भाजपा और फिर अलग राजनीतिक सफर

आरसीपी सिंह करीब दो दशक तक नीतीश कुमार के सबसे करीबी नेताओं में गिने जाते रहे। इस दौरान उन्होंने जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्र सरकार में मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद भी संभाले। बाद में राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के बाद वह जदयू से अलग हुए और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाई। वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने अपनी पार्टी का विलय जनसुराज में कर दिया था। हालांकि, विधानसभा चुनाव में जनसुराज को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद से ही आरसीपी सिंह के जदयू में लौटने की संभावनाओं को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं।

मुलाकात के राजनीतिक मायने

फिलहाल इस मुलाकात को लेकर जदयू की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है और न ही आरसीपी सिंह की वापसी को लेकर कोई औपचारिक घोषणा की गई है। बावजूद इसके, दोनों नेताओं के बीच संवाद स्थापित होना बिहार की राजनीति में एक अहम संकेत माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यदि दोनों पक्षों के बीच आगे भी बातचीत जारी रहती है, तो जदयू के संगठन और बिहार की राजनीतिक समीकरणों पर इसका असर देखने को मिल सकता है। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर है कि यह मुलाकात केवल शिष्टाचार तक सीमित रहती है या भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक फैसले का आधार बनती है।


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