बेंगलुरु देश की राजनीति को एक बार फिर दिशा देगा
जब गुजरात हाईकोर्ट का फैसला आया तो कांग्रेस ने कहा प्रत्याशित! मतलब हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन...!

- शकील अख्तर
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव दिखा देगें कि हवा किस तरफ बह रही है। मगर उससे पहले 18 जुलाई को भी एक झलकी मिलेगी कि किस गठबंधन में कितने और किस कद के लोग शामिल हैं। एक बंगलुरू का विपक्ष का गठबंधन और दूसरा सत्ता पक्ष का दिल्ली में होने वाला जमावड़ा। नेताओं की संख्या, नेताओं का वज़न सबका अच्छा जायजा हो जाएगा!
जब गुजरात हाईकोर्ट का फैसला आया तो कांग्रेस ने कहा प्रत्याशित! मतलब हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन...! प्रक्रिया है हाईकोर्ट तो जाना था।
अब राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट गए हैं। क्या उम्मीद है? उम्मीद तो न्याय से हमेशा करना चाहिए। भारत की न्याय व्यवस्था अतीत में इतनी निर्भय और सत्ता के दबाव से अप्रभावित रही भी है। इन्दिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनका चुनाव अवैध घोषित किया गया था। मगर पहले गुजरात के लोअर कोर्ट में मानहानि के मामले में अधिकतम दो साल की सज़ा, जो इससे पहले किसी को नहीं हुई थी, देना और फिर गुजरात हाई कोर्ट द्वारा सज़ा को बरकरार रखना और साथ ही यह टिप्पणी करना कि उनके खिलाफ दस केस पेंडिग हैं यह बताता है कि कांग्रेस ने सही कहा कि उसे पहले से अंदाजा था।
तो अब सुप्रीम कोर्ट में? लेकिन सवाल सिर्फ सुप्रीम कोर्ट का नहीं है। सवाल बहुत सारी चीजों का है और वह सारी चीजें अगले कुछ दिनों में तय हो जाएंगी। निर्भर सब इस पर करेगा कि अब राजनीति कहां जाती है।
सोमवार 17 जुलाई से बंगलुरू में विपक्षी पार्टियों की बैठक शुरू हो जाएगी और इसकी सफलता ही बताएगी कि देश की केवल राजनीति ही नहीं बल्कि पूरी तस्वीर किस तरह बदलने लगी है। पटना की पहली बैठक बहुत सफल रही थी। उसमें आकर्षण का केन्द्र राहुल थे। उनकी भारत जोड़ो यात्रा और लोकसभा में अडानी के खिलाफ उनके भाषण को सबने सराहा था। उसके बाद राहुल उस मणिपुर और हो आए जिसका नाम भी देश के प्रधानमंत्री नहीं ले रहे। गुजरात का फैसला इन सबके बाद ही आया।
और अब चूंकि मामला अंतिम पायदान पर पहुंच गया है तो यह समझना होगा कि इससे राजनीति पर क्या असर पड़ता है। सीधी बात है कि अगर सुप्रीम कोर्ट से राहुल को राहत नहीं मिलती है तो एक वह अगला चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। दूसरे सज़ा बरकरार रहने की स्थिति में उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है।
हम यहां सिर्फ राजनीतिक स्थितियों की ही बात कर सकते हैं और वहीं करेंगे। हां लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि राजनीतिक स्थितियां क्या मोड़ लेती हैं, किस तरफ झुकती हैं इससे कई तरह के फैसले प्रभावित होंगे। पिछले दिनों में हमने देखा कि विपक्ष की कुछ पार्टियों के रुख में अचानक परिवर्तन आया है और उनका कांग्रेस विरोधी और खासतौर से राहुल के खिलाफ रुख बदला है। ममता बनर्जी जो राहुल पर व्यक्तिगत हमले करने लगी थीं। पटना में उनके साथ स्नेहमयी मुद्रा में थीं। यह सब राजनीतिक हवा बदलने का परिणाम है।
2024 अब विपक्ष के लिए उम्मीदों का केन्द्र बन गया है। नहीं तो अभी तक आएगा तो मोदी ही नारा जो भक्तों की हिम्मत बनाए रखने के लिए प्रचारित किया गया था वह विपक्षी नेताओं को भी सच लगने लगा था। विपक्ष 2024 के लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मगर राहुल की यात्रा ने सारी तस्वीर पलट दी। अब विपक्ष को लग रहा है कि अगर वह एकजुट हो जाएं तो 2024 में मोदी को हटाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी भी यह समझ गए हैं। नहीं तो अभी तक तो वे एक अकेला सब पर भारी का नारा लगा रहे थे। पिछले 9 साल में अपने सबसे पुराने सहयोगी दलों शिवसेना और अकाली दल को भी छोड़ चुके थे। मगर विपक्ष की एकता को देखकर उन्हें भी एनडीए की याद आने लगी है। 18 जुलाई को उन्होंने उसकी मीटिंग दिल्ली में बुलाई है।
देखना दिलचस्प होगा कि एक 17-18 जुलाई को उस कर्नाटक बंगलुरू में विपक्षी दलों की बैठक होगी जिस कर्नाटक ने दो बार भारत की राजनीति उलट कर रख दी थी। 1978 में इन्दिरा गांधी ने कर्नाटक के चिकमंगलूर से ही चुनाव लड़कर 1980 में जनता पार्टी का तख्ता पलट दिया था। इस तरह 1999 में अपना पहला चुनाव कर्नाटक के बेल्लारी से लड़कर सोनिया गांधी ने जो राजनीति में एंट्री की तो 2004 में वाजपेयी सरकार को पलट दिया।
जो लोग यह सवाल उठा रहे थे कि कांग्रेस ने विपक्षी दलों की बैठक जिन राज्यों में अभी विधानसभा चुनाव होना है- राजस्थान, छत्तीसगढ़ जहां सरकारें भी हैं वहां न करके कर्नाटक में क्यों किया तो उसका कारण यही है कि कांग्रेस के लिए हमेशा से कर्नाटक खेल का रुख बदल देने वाला राज्य रहा है। और कांग्रेस एवं विपक्ष अब वहीं से 2024 का रोडमेप लेकर सामने आएंगे।
दूसरी तरफ यह पहली बार है कि भाजपा विपक्ष के अजेंडे को फालो कर रही है। अभी तक तो वह विपक्षी दलों के इकठ्ठा होकर चुनाव लड़ने का मजाक बना रही थी कि कोई एक नहीं लड़ सकता है इकठ्ठा होकर मोदी का मुकाबला करेंगे! लेकिन अब भाजपा खुद ढूंढ-ढूंढकर एक एक दल को मना रही है। चिराग पासवान जिन्हें सरकारी बंगले से निकाल दिया था। उनकी पार्टी तोड़कर चाचा को अपने साथ मिला लिया था उन्हें अब बुलाया गया है। ऐसे ही राजभर जो अभी तक भाजपा की कड़ी आलोचना कर रहे थे उन्हें खुद अमित शाह ने मनाया है। मतलब भाजपा समझ गई है कि 2024, 2014 या 2019 नहीं है।
यात्रा के बाद राहुल का कद बहुत बढ़ गया है। विपक्ष में तो वे स्वीकार्य हो ही गए हैं। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनसे प्रभावित होने वालों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा हो रहा है। अभी एक जैन मुनि ने जिस तरह उनकी दिल खोलकर मगर वास्तविक प्रशंसा की वह बताती है कि धार्मिक क्षेत्रों में भी अब राहुल को चाहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
दरअसल रोजगार और महंगाई वास्तविक मुद्दे हैं। और मोदी सरकार इन पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही है। वह सोचती है कि हिन्दू-मुसलमान का खेल खेलकर वह हमेशा लोगों को बेवकूफ बनाती रहेगी। मगर अभी कर्नाटक में यह नहीं चला। लोग इतने बेवकूफ नहीं हैं। वे देखते हैं कि यहां आप कपड़ों से पहचानने की बात करते हैं। और अरब मुल्कों में जाकर वहां के शेखों, जो कपड़ों से ही हमेशा पहचाने जाते हैं, से गले मिलते हैं। कहते हैं कि हर भारतवासी आपसे प्यार करता है। मतलब भक्त भी करते हैं! जिन्हें दिन-रात व्हाट्सअप मैसेज भेजकर, न्यूज़ चैनलों पर नफरत भरी विभाजनकारी बहसें दिखाकर रोजी रोटी के सारे वास्तविक सवालों से काट दिया है, वे भी!
तो आपका दोहरा रवैया सामने आ जाता है। भारत में श्मशान कब्रिस्तान की बात करना और वहां उनसे फें्रडशिप बेंड बंधवाना! जनता इतनी भी बेवकूफ नहीं है। वह समझ गई है कि हिन्दू-मुसलमान का सवाल केवल वोटों के लिए है। हम जब तक नफरत में अंधे रहेंगे महंगाई बेरोजगारी हमें दिखेगी ही नहीं। हमारे बच्चे पढ़ने नहीं जा पा रहे हैं सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं। मगर भाजपा सांसद जो देश में हिन्दू-मुसलमान करने में सबसे आगे रहते हैं उनका बेटा विदेश से पढ़कर विदेश में बढ़िया नौकरी ज्वाइन कर गया।
यह सब अब छुपा नहीं रह पा रहा है। अभी राहुल हरियाणा के गांव में किसानों के साथ थे तो किसान उनसे सबसे ज्यादा बेरोजगारी और महंगाई की ही बात कर रहे थे।
हवा तेजी से बदल रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव दिखा देगें कि हवा किस तरफ बह रही है। मगर उससे पहले 18 जुलाई को भी एक झलकी मिलेगी कि किस गठबंधन में कितने और किस कद के लोग शामिल हैं। एक बंगलुरू का विपक्ष का गठबंधन और दूसरा सत्ता पक्ष का दिल्ली में होने वाला जमावड़ा। नेताओं की संख्या, नेताओं का वज़न सबका अच्छा जायजा हो जाएगा!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


