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ग्रामीणों ने थाने पहुंचकर कहा नहीं देंगे नक्सलियों का साथ

दंतेवाड़ा ! नक्सलियों के खिलाफ दक्षिण बस्तर में युद्ध जैसा माहौल है। इसमें पुलिस, मुठभेड़ और नक्सल समर्पण के मोर्चे पर बेहतर काम तो कर ही रही है।

ग्रामीणों ने थाने पहुंचकर कहा नहीं देंगे नक्सलियों का साथ
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दंतेवाड़ा ! नक्सलियों के खिलाफ दक्षिण बस्तर में युद्ध जैसा माहौल है। इसमें पुलिस, मुठभेड़ और नक्सल समर्पण के मोर्चे पर बेहतर काम तो कर ही रही है। अब नये वर्ष की नई शुरूआत में मनोवैज्ञानिक आधार पर नक्सलियों को कमजोर करने की तकनीक भी खोजी गयी है और इसी का असर हुआ कि आज कुआकोंडा ब्लाक के गढ़मिरी पंचायत के लगभग 1 हजार से भी ज्यादा ग्रामीण खुद थाना पहुंचे और नक्सलियों का साथ नहीं देने का ऐलान कर दिया।
ग्रामीणों ने खुद होकर ऐसा फैसला लिया। यह पुलिस के लिए एक सकारात्मक संकेत है तो नक्सलियों के लिए खतरे की घंटी। नक्सलियों के खिलाफ इस तरह की एकजुटता अब से करीब 12 वर्ष पहले बीजापुर जिले के अंबेली गांव में दिखी थी, जहां से सलवा जुडूम का जन्म हुआ था, लेकिन इसे जुडूम से जोडऩा गलत होगा और विकास की ललक लिये ग्रामीणों में बदलाव के रूप में समझना बेहतर होगा। कुआकोंडा गांव का गढ़मिरी गांव आज दोपहर अचानक प्रदेश की सूर्खियों में आ गया। इस पंचायत के साथ ही धनीकरका और रेंगानार के कुछ ग्रामीण भी कुआकोंडा थाने की ओर कूच करने लगे। शुरू में जब यह खबर जिला मुख्यालय पहुंची तो कई तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी, लेकिन हजारों की भीड़ थाने के पास पहुंची और उनका संकल्प सामने आया तो बदलाव की नई बयार दिखने लगी।
तीन गांव के लगभग 1 हजार से भी ज्यादा ग्रामीण कुआकोंडा थाने पहुंचे, इनमें महिलाएं और बच्चे भी थे। ग्रामीणों ने थाने पहुंचकर कहा कि उनके गांव के उन लोगों के नाम थाने में दर्ज नक्सल समर्थकों की सूची से हटा दिया जाए। हम ग्रामीण उन्हें नक्सलियों का साथ नहीं देने, सहयोग नहीं देने और बैठक में नहीं जाने की समझाईश देंगे। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि अब कोई भी नक्सलियों का साथ नहीं देगा, सभी विकास के सहभागी बनकर नई राह पर आगे बढ़ेंगे। ग्रामीणों ने जब यह संकल्प व्यक्त कर रहे थे उस दौरान अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नक्सल आपरेशन जीएन बघेल भी वहां मौजूद थे। श्री बघेल ने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि उनके गांव के नक्सल समर्थक अगर मुख्यधारा से जुड़ते हैं, विकास में साथ देते हैं तो कोई कार्रवाई उनके खिलाफ नहीं होगी। ग्रामीणों को यह भी समझाईश दी गयी कि नक्सली उनके गांव का विकास रोकते हैं और उन्हें केवल इस्तेमाल करते हैं। ग्रामीणों ने श्री बघेल के समक्ष कहा कि वे नक्सलियों का साथ कभी नहीं देंगे और गांव में आने पर उन्हें किसी तरह का सहयोग भी नहीं करेंगे।
कुआकोंडा थाने में इस तरह हजारों ग्रामीणों का स्वत:स्फूर्त पहुंचना एक निर्णायक बात मानी जा रही है। इससे तो एक बात साफ हो रही है कि ग्रामीण खुद नक्सलियों से तंग आ चुके हैं। नक्सलियों और पुलिस बल के बीच जारी कथित युद्ध में दोनों तरफ की बंदूक के बीच सीना आदिवासी ग्रामीणों का ही होता है, चाहे वह नक्सलियों के रूप में हो अथवा पुलिस जवानों के रूप में। इसी पीड़ा और विकास अवरूद्ध होने से निराश ग्रामीणों में यह नया परिवर्तन आया है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आयी है कि हर थाने में उस इलाके के गांव के नक्सल समर्थकों और मददगारों की सूची एक रजिस्टर में दर्ज है, जिसकी जानकारी ग्रामीणों को समय-समय पर दी जाती है और उनके बारे में पूछा जाता है। इसके बाद ग्रामीण खुद गांव में जाकर संबंधित लोगों के बारे में तस्दीक करते हैं। पूरे जिले के थानों में यह प्रक्रिया काफी अरसे से चल रही है, लेकिन पूरी पंचायत ही उठकर जन प्रतिनिधियों के साथ थाने पहुंचे और भटके हुए लोगों को समझाने अथवा सुधारने की बात कहे, ऐसा पहली बार हुआ है। कुआकोंडा के गढ़मिरी से हुई यह शुरूआत हर गांव में पहुंचेगी और बदलाव की नई हवा बहेगी यह उम्मीद भी की जा रही है। नक्सलियों को उनके ही हथियार यानि ग्रामीणों के सहारे पराजित करने का यह मनोवैज्ञानिक तरीका है जो पुलिस के लिए काफी उपयोगी साबित होने जा रहा है।


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