गोदी मीडिया का विकल्प यू ट्यूब और सोशल मीडिया
जब बीजेपी विपक्ष में थी तब भी अखबारों में उसे ही प्राथमिकता दी जाती थी। इसके लिए नई-नई अवधारणाएं लाई जाती थीं।

- शकील अख्तर
सोचिए अगर आज मीडिया निष्पक्ष होता तो २२ लाख नीट के परीक्षार्थियों का दर्द घर-घर सुनाया जाता होता। मगर वह कहानी कहीं नहीं है बल्कि उसे इग्नोर करने और ऐसे ही जनता से जुड़े दूसरे मुद्दे गैस तेल की ८ दिन में तीन बार बढ़ा दी गई कीमतों का सवाल चर्चा का विषय नहीं है बल्कि कॉकरोच पार्टी कैसे इस सरकार के खिलाफ खड़ी हो गई है सब जगह इसकी बातें हैं।
जब बीजेपी विपक्ष में थी तब भी अखबारों में उसे ही प्राथमिकता दी जाती थी। इसके लिए नई-नई अवधारणाएं लाई जाती थीं। सरकार की खबरों के लिए कहा जाता था यह तो सरकारी विज्ञापन हैं। कांग्रेस की खबरों के लिए कहा जाता था अंदर की निकाल कर लाओ। क्या झगड़ा चल रहा है आपस में!
अब बीजेपी सत्ता में है तो खबरों में वो ही वो है। कांग्रेस और विपक्ष के लिए अभी भी वही कहा जाता है कि अंदर क्या चल रहा है वह बताओ। मतलब उनकी कमियां बताओ।
भारतीय पत्रकारिता में भाजपा पवित्र पार्टी के रूप में है। उसके नेता सोच ही नहीं सकते कि कोई उनके खिलाफ भी लिख सकता है। अटलबिहारी वाजपेयी जिन्हें उदार नेता के तौर पर पेश किया जाता जिन्दगी भर हमसे इस बात पर नाराज रहे कि हमने १९८४ में ग्वालियर लोकसभा चुनाव में यह क्यों लिख दिया था कि माधवराव सिंधिया भारी पड़ रहे हैं।
सिंधिया को अचानक ग्वालियर लाया गया था। पहले दिन ही जब वे निकले और इसे जनदर्शन नहीं महाराज दर्शन कहा गया और उन्हें देखने के लिए जिस तरह भीड़ उमड़ी लोग एक के ऊपर गिरे उसने चुनाव का नतीजा काफी हद तक बता दिया था। और उसके बारे में संकेतों में ही लिखने से वाजपेयी जी की समझ में सब आ गया था। मगर बीजेपी हमेशा से मानती रही है कि मीडिया उन दिनों प्रेस कहते थे उसके लिए है।
वाजपेयी जी ने चुनाव नतीजों के बाद कहा कि आपने तो पहले ही हरवा दिया था। पत्रकार न पहले किसी को पहले जितवा-हरवा सकते थे न आज हैं। मगर आज वे झूठे नरेटिव (कहानी) को आगे बढ़ाकर सच को जनता तक पहुंचाने में काफी हद तक जरूर रोक सकते हैं। लेकिन शर्त यह है कि वह नैरेटिव बीजेपी का होना चाहिए। कांग्रेस या विपक्ष का सच भी वे लोगों तक नहीं पहुंचने देते हैं।
आज कांग्रेस और विपक्ष बहुत सारे मुद्दों पर काम कर रही है। मगर सबसे जरूरी चीज मीडिया पर उसका ध्यान बिल्कुल नहीं है।
सोचिए अगर आज मीडिया निष्पक्ष होता तो २२ लाख नीट के परीक्षार्थियों का दर्द घर-घर सुनाया जाता होता। मगर वह कहानी कहीं नहीं है बल्कि उसे इग्नोर करने और ऐसे ही जनता से जुड़े दूसरे मुद्दे गैस तेल की ८ दिन में तीन बार बढ़ा दी गई कीमतों का सवाल चर्चा का विषय नहीं है बल्कि कॉकरोच पार्टी कैसे इस सरकार के खिलाफ खड़ी हो गई है सब जगह इसकी बातें हैं।
मीडिया को मालूम है। सबको मालूम है कि प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब मोड़ पर है। उसे पटरी पर लाने का मोदी के पास न कोई प्लान है न वह इसकी कोई जरूरत महसूस करते हैं। वह तो जो हो रहा है उसका फायदा मीडिया के जरिए कैसे उठा लें बस इसकी ही सोच रखते हैं।
विपक्ष को यह समझना पड़ेगा कि मीडिया अब निर्णायक भूमिका में है लेकिन निष्पक्ष भूमिका में नहीं। प्रेसिडेन्ट ट्रंप जब भारत को नरककुंड कहकर देश को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं तो वह राष्ट्रवाद भूल जाता है। लेकिन जब राहुल कहते हैं कि आर्थिक स्थिति बहुत गंभीर है। मोदी एक साल में चले जाएंगे तो मीडिया भाजपा के इस नैरेटिव को चलाना शुरू कर देती है कि यह देश विरोधी बयान है।
मोदी और देश को एक कर देती है। और जब ट्रंप सीधा देश के खिलाफ बयान देते हैं और मोदी चुप रहते हैं तो वह नैरेटिव चेंज करने में लग जाती है। जनता द्वारा इसीलिए उसे नफरत से गोदी मीडिया कहा जाता है। वह इन १२ सालों में जनता पर कैसी भी परेशानी आई उसके साथ खड़ा नहीं हुआ है कोरोना जैसी महामारी में भी। नोटबंदी, बेरोजगारी, महंगाई किसी में नहीं।
कांग्रेस बताती है कि इस दौरान राहुल गांधी ने १२९ प्रेस कान्फ्रेंस कीं। और मोदी विदेश में एक सवाल का जवाब भी नहीं दे पाए। लेकिन फिर भी मीडिया के निशाने पर राहुल ही हैं। मीडिया का क्लास करेक्टर तो भाजपा वाला है ही। दक्षिणपंथी, दकियानूसी, गरीब विरोधी, सेठ समर्थक मगर इन दिनों भय भी एक बड़ा कारण बन गया है।
मीडिया को नौकरी जाने का डर। अभी मेरठ में एक पत्रकार राजेश अवस्थी ने नौकरी न होने के कारण आत्महत्या कर ली। नौकरी ठेके की हैं। जब सेना में ठेके पर भर्ती होने लगी है तो मीडिया क्या है? यहां भी एक साल, दो साल ज्यादा से ज्यादा तीन साल के एग्रीमेन्ट होते हैं। और उस एग्रीमेंन्ट का भी कोई महत्व नहीं है चाहे जब निकाला जा सकता है। सरकार ने इस भय को और बढ़ा रखा है। मामला मुकदमा कभी भी किसी पर हो सकता है।
तो इस डर में और विचारधारा से उनका समर्थक भी होने के कारण यह मीडिया जनसमर्थक नहीं हो पा रहा। जनता रो रही है और मीडिया को इसमें मोदी मोदी सुनाई दे रहा है।
लेकिन क्या विपक्ष के पास और कोई विकल्प नहीं हैं। विकल्प बहुत हैं मगर विपक्ष उनका उपयोग करने का इनिशेटिव नहीं ले पा रहा। वह उस होस्टाइल मीडिया पर ही दांव खेलने की कोशिश फिर-फिर करता है जो उसे कभी जीतने ही नहीं दे सकती। उसका ध्यान कभी उस जनसमर्थक मीडिया की तरफ नहीं जाता जो लगातार जनता की आवाज उठाती रहती है। भारत में यूट्यूब पर समाचार देखने वालों की संख्या लगभग ५२ करोड़ है। और इसमें सबसे ज्यादा युवा। जिसे आगे आने का आह्वान ही विपक्ष करता रहता है। २५ से लेकर ३५ साल तक का युवा। बेरोजगारी, पेपर लीक का शिकार भी यही है। और करीब इतने ही ५० करोड़ से ऊपर सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। यह दोनों माध्यम आज की तारीख में सबसे ताकतवर हैं।
अभी जिस कॉकरोच जनता पार्टी ने प्याले में तूफान पैदा किया वह सोशल मीडिया के जरिए ही किया। राहुल की भारत जोड़ो यात्रा (पार्ट वन) इसी सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनलों से गांव-गांव तक पहुंची।
यह जो २४० पर रोक दिया था मोदी को यह गोदी मीडिया से लड़ते हुए यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया का कमाल था। सब टीवी चैनल एक खबर दिखा रहे हों, अखबार लिख रहे हों मगर सोशल मीडिया के एक विश्वसनीय हेंडल पर अगर उस संबंध में दूसरा तथ्यात्मक पहलू आ जाए तो जनता सोशल मीडिया को विश्वास करती है।
राहुल लोकसभा में बोल रहे थे कहा कि खुद को हिन्दू कहते हैं और चौबीस घंटे हिंसा और नफरत फैलाते हैं। मोदी पहली बार हस्तक्षेप करने को उठे। कहा कि यह पूरे हिन्दू समाज को हिंसा और नफरत फैलाने वाला बता रहे हैं।
राहुल ने तगड़ा प्रतिवाद किया कि हिन्दू समाज नहीं भाजपा और आरएसएस। हिन्दू मैं भी हूं। भाजपा और संघ पूरा हिन्दू समाज नहीं है। मैं भाजपा और संघ के लिए बोल रहा हूं।
सरकार और मीडिया ने राहुल को हिन्दू विरोधी साबित करने में पूरी ताकत लगा दी। मगर उसी समय सच की ताकत दिखी। प्रेस गैलरी में बैठे कुछ पत्रकारों ने सही परिप्रेक्ष्य में राहुल का बयान यू ट्यूब और सोशल मीडिया पर रख दिया।
साफ था कि राहुल संघ और भाजपा के लिए बोल रहे थे। मगर उसे पेश पूरे हिन्दू समाज के खिलाफ करने की कोशिश हुई। अगर वह हो जाता तो मोदी राहुल की राजनीति उसी दिन खत्म कर देते। लेकिन राहुल ने भी सही समय पर पूरी ताकत से वहीं मोदी की बात का प्रतिवाद किया और अपनी बात सही तरीके से रखी। और सदन के बाहर भी वह फिर सही तरीके से आई। राहुल की ऐसी कोशिशों का तो जवाब ही नहीं है। मगर उन्हें सामने आना जरूरी है। वह कैसे आएंगी यह कांग्रेस को सोचना है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


