युवा आंदोलन: बिखरा नहीं, एकीकृत नेतृत्व दिलायेगा सफलता
इस या ऐसे आंदोलनों की निरंतरता ज़रूरी है ताकि सरकार को जनता की नाराज़गी को तवज्जो देने और उसकी जायज मांगों के आगे झुकने की आदत पड़े।

बढ़ते जनदबाव के चलते सरकार ने न सिर्फ प्रधान को मंत्रिमंडल से चलता किया वरन शनिवार व रविवार की आधी रातों को प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो संदेश दिये जो मूलत: युवाओं व छात्रों को संबोधित थे। इसमें उन्होंने परीक्षाएं लीक करने को 'घोर पाप' बतलाते हुए जानकारी दी कि परीक्षाएं लीक होने के खिलाफ कड़े प्रावधान किये जा रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था सुधारी जायेगी।
श के युवाओं, छात्रों एवं लोकतंत्र चाहने वाले हर किसी की उम्मीदें जगाने वाले कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने केवल डेढ़ महीने के आंदोलन के जरिये केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा लेकर बेशक एक बड़ी जीत दर्ज की है। यह पहली बार है कि जब आंदोलन के जरिये भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार के किसी मंत्री को अपना पद छोड़ने के लिये मजबूर होना पड़ा है या यूं कहें कि सरकार को प्रधान से इस्तीफा देने के लिये कहा गया है। यह जीत निश्चित ही ठंडी हवा के झोंके की तरह है, लेकिन यह देखते हुए कि इस आंदोलन के कई स्टेकहोल्डर्स हैं, आश्चर्य नहीं होगा कि आगे चलकर इनमें श्रेय और नेतृत्व के लिये मारामारी होने लगे। यदि ऐसा हुआ तो इस आंदोलन के बिखरने में वक्त नहीं लगेगा। उससे केन्द्र और अनेक राज्य सरकारों को आंदोलनकारी युवाओं का दमन करने का मौका मिल जायेगा और अगले कई वर्षों तक शायद ही कोई आंदोलन सरकार के खिलाफ़ देखने को मिले।
इस या ऐसे आंदोलनों की निरंतरता ज़रूरी है ताकि सरकार को जनता की नाराज़गी को तवज्जो देने और उसकी जायज मांगों के आगे झुकने की आदत पड़े। इसके पहले देश ने 2011 का लोकपाल आंदोलन देखा था। जनभावना का सम्मान करते हुए तत्कालीन मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चल रही कांग्रेस प्रणीत यूपीए सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत की थी और तदनुसार आवश्यक संवैधानिक प्रावधान किये थे। यह अलग बात है कि उसके बाद आई नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार ने उन कानूनों को बेहद कमजोर कर दिया है। इतना ही नहीं, उसने आंदोलनों के प्रति न सिर्फ उपेक्षा का बल्कि दमनात्मक का रवैया अपनाया। अनेक राज्यों में छोटी-बड़ी मांगों व समस्याओं को लेकर लोग-बाग बड़े पैमाने पर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन केन्द्र अथवा सम्बन्धित सरकारें या तो आंदोलनकारियों से वार्ता करती ही नहीं, करती भी हैं तो उनके पक्ष को मानती नहीं; और यदि नागरिक आंदोलन करें तो उनके खिलाफ़ शक्ति का प्रयोग करती हैं, उन्हें थानों व अदालतों की मुकदमेबाजी में फंसाती हैं, उनके घरों या कमाई के जरियों को बुलडोज़रों से ध्वस्त करती है।
सरकार की इस तानाशाही और दमनपूर्ण व्यवहार के चलते ही लगभग 6 वर्ष पहले हुए किसान आंदोलन के बाद देश को बड़े आंदोलन देखने को नहीं मिले हैं। सड़कों के सूनेपन और संसद की आवारगी से निराश और अपने अधिकारों के प्रति सचेत नागरिकों, विशेषकर छात्रों तथा युवाओं को आशा की किरण अमेरिका में पढ़े अभिजीत दिपके में नज़र आई जिसने डिजिटल स्वरूप का संगठन सीजेपी बनाया। यह संगठन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत द्वारा युवाओं-बेरोजगारों के लिये अशोभनीय शब्द कहने से आहत और मोदी के कार्यकाल में चिकित्सा संस्थानों में प्रवेश करने के लिये अनिवार्य नीट समेत अनेक परीक्षाओं के निरस्त होने से व्यथित लोगों ने सीजेपी के विचारों को इतना प्रचार-प्रसार दिया कि जंतर-मंतर पर लगभग डेढ़ माह तक बड़ा हुजूम आकर डटा रहा।
मई के पहले हफ्ते में आकर जब दिपके एवं उनके साथियों ने देश के युवाओं से जंतर-मंतर पर एकत्र होकर प्रदर्शन का आह्वान किया तो उन्हें और उनकी टीम को जैसा प्रतिसाद मिला, उससे जनता तो उत्साहित हुई परन्तु सरकार के लिये वह स्तब्ध करने वाला जमावड़ा साबित हुआ। लेख-लद्दाख के पर्यावरणविद व अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक सोनम वांगचुक भी इसमें न केवल शामिल हुए बल्कि उन्होंने लम्बी भूख हड़ताल भी की। सोनम वांगचुक को 20-21 दिनों की हड़ताल के बाद उनकी प्राण रक्षा के नाम पर पुलिस ने उन्हें पहले सफदरजंग तत्पश्चात मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया। इससे 20 जुलाई को आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया जिसमें दिल्ली पुलिस ने बर्बरता दिखाई। बड़ी संख्या में युवा, छात्र तथा अन्य लोग घायल हुए। पुलिस के साथ रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों द्वारा ज़रूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया उससे एक ओर तो देश भर के छात्र-युवा उग्र हो उठे, तो वहीं दुनिया भर में इसके वीडियो, चित्र आदि वायरल हुए। इतना ही नहीं, कई देशों के शहरों में भारतीयों ने प्रदर्शन कर भाजपा सरकार की आलोचना की।
बढ़ते जनदबाव के चलते सरकार ने न सिर्फ प्रधान को मंत्रिमंडल से चलता किया वरन शनिवार व रविवार की आधी रातों को प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो संदेश दिये जो मूलत: युवाओं व छात्रों को संबोधित थे। इसमें उन्होंने परीक्षाएं लीक करने को 'घोर पापÓ बतलाते हुए जानकारी दी कि परीक्षाएं लीक होने के खिलाफ कड़े प्रावधान किये जा रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था सुधारी जायेगी। इसके अलावा केन्द्र सरकार ने सोनम की भूख हड़ताल तुड़वाई और दूसरे, सीजेपी के नेताओं से समझौता किया जिसके बाद जंतर-मंतर के धरने को समेटने का ऐलान हो गया। संगठन के प्रवक्ता सौरव दास ने बताया कि सरकार ने वादा किया है कि धरना-प्रदर्शन को लेकर जिन लोगों के खिलाफ दर्ज मामले हटा दिये जायेंगे; नये प्रकरण भी दर्ज नहीं होंगे। हालांकि कई स्थानों पर इसके बाद भी पुलिस द्वारा कार्रवाइयां जारी रहीं जिसके चलते सीजेपी ने चेतावनी दी कि यदि ऐसा हुआ तो कॉक्रोच दोबारा जंतर-मंतर पर जुटेंगे। उन्होंने सरकार से कहा कि वादे के अनुसार वह सभी राज्यों की पुलिस को मंगलवार तक इस आशय का आदेश जारी करे।
इस आदेश का सबसे बड़ा उल्लंघन बिहार में होता दिखा जहां रविवार व सोमवार को पुलिस ने आंदोलनकारियों को उनके घरों से उठाना शुरू किया। इससे नाराज 'आंदोलन की उपलब्धिÓ कही जाने वाली ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष (दिल्ली विवि से निकलीं तथा वर्तमान में जेएनयू में शोधार्थी) नेहा बोरा ने बिहार सरकार को धमकी दी कि यदि कार्रवाइयां जारी रहीं तो युवा व छात्र बिहार बंद कराएंगे। नेहा ने राज्य के पुलिस महानिदेशक से मुलाकात कर तत्काल प्रभाव का आदेश जारी कराया कि बिहार में कोई कार्रवाई न की जाये और नये मामले दर्ज न हों। अब नेहा देश की युवा-छात्र शक्ति का बड़ा चेहरा है जिनकी एक बड़ी फॉलोइंग है- डिजिटल और ज़मीनी दोनों स्तरों पर। वे इस अभियान की एक शक्ति केन्द्र बनी रहेंगी।
हालांकि इस आंदोलन के प्रमुख नेता अभिजीत दिपके एवं उनके कुछ प्रमुख सिपहसालारों को माना जाता है जो सीजेपी बनाने में परस्पर सहयोगी थे। जब तक दिपके भारत (दिल्ली) नहीं आये थे, बाकियों ने अभियान की कमान सम्हाली थी। वांगचुक के शामिल होने से माना गया कि वे भी एक प्रमुख नेता हैं जो आंदोलन को आगे बढ़ायेंगे। अस्पताल में आधी रात को सरकार के मंत्रियों के हाथों जूस पीकर अपनी भूख हड़ताल तोड़ने से उनकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है। हालांकि पहले से ही उनके तथा उनकी पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो को भाजपा की समर्थक बताया जाता रहा है।
इस मसले में कांग्रेस भी एक बड़ी स्टेकहोल्डर है। वह पहले से इस मुद्दे को कई राज्यों में उठा रही है। इतना ही नहीं, राहुल गांधी ने मुद्दे को संसद के भीतर-बाहर उठाया। मीडिया के समक्ष पैलेट गन से घायल व्यक्ति को तत्पश्चात इन युवा व छात्र नेताओं को लाया। वे प्रदर्शन स्थल पर संविधान को लेकर अपने विचारों से सबको प्रभावित करने वाले मोहम्मद इरफान से उनकी झोपड़ी में जाकर भी मिले। साफ है कि इस पूरे मुद्दे को जो भी भावी स्वरूप दिया जायेगा, उसमें कांग्रेस को डिस्कार्ड नहीं किया जा सकेगा। इस मामले में सफलता हासिल करने के लिये सभी शक्ति केन्द्रों को संयुक्त लड़ाई लड़नी होगी। अपने वैचारिक आग्रहों को कुछ समय के लिये किनारे रखना होगा- सभी को।
(लेखक देशबन्धु के राजनीतिक संपादक हैं)


