ललित सुरजन की कलम से आत्मकथा लिखना आसान नहीं
'एक आत्मकथा में समृद्ध अनुभव, सघन विचार और समर्थ अभिव्यक्ति से मिलकर वह आकर्षण होना चाहिए जो दूर-दूर तक प्रभावित कर सके।

'एक आत्मकथा में समृद्ध अनुभव, सघन विचार और समर्थ अभिव्यक्ति से मिलकर वह आकर्षण होना चाहिए जो दूर-दूर तक प्रभावित कर सके। यह भी तभी कारगर होगा जब जीवनीकार पारदर्शी सच्चाई के साथ अपनी कहानी कहने के लिए तैयार हो। उसमें मानसिक बाधा या संकोच होगा तो वह कभी भी पाठक का ध्यान बांधकर नहीं रख पाएगी। आत्मकथा एक आईना है, जिससे लेखक स्वयं को देख सकता है, लेकिन वह शायद एक ऐसा शीशा भी है जिसके पार खड़ा व्यक्ति भी लेखक के अंतर्मन में झांक सकता है। जो जीवनीकार यह सोचे कि वह पूरी-पूरी सच्चाई सामने रखे बिना भी काम चला सकता है वह अपने आपको भरम में रखता है। इसीलिए ज्यादातर आत्मकथाएं प्रकाशन के बाद बहुत जल्दी भुला दी जाती हैं; भले ही उसकी बिक्री के लिए बढ़-चढ़कर प्रचार क्यों न किया गया हो। हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती, यह पुरानी कहावत यहां लागू होती है।'
(अक्षर पर्व सितम्बर 2014 में प्रकाशित प्रस्तावना)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2018/09/blog-post.html


