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सिमोन द बुवा के देश में नारी उत्पीड़न

नारी सशक्तीकरण पर उनके मौलिक और क्रांतिकारी विचारों पर दुनिया में आज भी मंथन होता है।

सिमोन द बुवा के देश में नारी उत्पीड़न
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जिस फ्रांस में सिमोन द बुवा ने पुरुष और स्त्री समानता की मशाल बुलंद की, धार्मिक व्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाई, उसी फ्रांस में सौ साल बाद लैंगिक भेदभाव की ऐसी घटना घटेगी, यह किसी ने नहीं सोचा होगा। इस घटना से आहत एफिल टावर के कर्मचारियों ने सोमवार को प्रदर्शन किया, जिसके चलते टावर को आगंतुकों के लिए बंद रखना पड़ा।

20वीं सदी के फ्रांस में वैश्विक नारीवाद की अहम किरदार थीं- सिमोन द बुवा। नारी सशक्तीकरण पर उनके मौलिक और क्रांतिकारी विचारों पर दुनिया में आज भी मंथन होता है। सिमोन द बुवा की सुप्रसिद्ध किताब है 'द सेकंड सेक्स'। इस किताब में सिमोन कहती हैं कि औरत पैदा नहीं होती है, बल्कि समाज औरत को गढ़ता है। वह बार-बार इस पर ज़ोर देती हैं कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति, हमारा समाज, लड़कियों को मजबूर करता है 'स्त्री' बनने के लिए। सिमोन का कहना है कि इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हमारे धर्म में औरतों की भी पूजा होती है। धर्म तो वास्तव में आदमियों के द्वारा बनाया हुआ एक तरीका है औरतों पर शासन करने का।

फ्रांस ने दुनिया को केवल सिमोन द बुवा जैसी अद्भुत नारीवादी और सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं दी, बल्कि उनसे पहले फ्रांसीसी क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का अद्भुत विचार दुनिया को दिया। यही लोकतंत्र की नींव बना और भारत के संविधान की बुनियाद भी इसी पर टिकी है। अब इसी फ्रांस में मानवता के लिए जरूरी इन मूल्यों पर कुठाराघात करने का काम किया है बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था यानी बीएपीएस ने। पाठकों को बता दूं कि गुजरात के बोचासन से इस संस्था का संबंध है। अक्षरधाम मंदिर इसी संस्था का है। हाल ही में फ्रांस की राजधानी पेरिस में बीएसपीएस के एक मंदिर का उद्घाटन हुआ। जिस पर खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हार्दिक खुशी जाहिर की थी।

इस संस्था के कहां कितने मंदिर बनते हैं यह अलग मुद्दा है। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि इस संप्रदाय में महिला से दूरी बनाए रखने, महिला के साथ अकेले में बात न करने आदि के नियम बनाए गए हैं, जिसका पालन इससे जुड़े लोग करते हैं। यह भी उनका निजी मामला है कि वे महिला से बात करें न करें। लेकिन पेरिस में मंदिर उद्घाटन के लिए संस्था का जो प्रतिनिधि मंडल पेरिस गया था, उसमें करीब 100 लोग एफिल टावर देखने पहुंचे तो उनके कहने पर वहां पहले बाकायदा महिला कर्मचारियों को हटाया गया।

एफिल टावर की कर्मचारी यूनियन की प्रतिनिधि डायने डावोइन के अनुसार, जब प्रतिनिधि मंडल टावर के अंदर से गुजर रहा था, तब महिला कर्मचारियों को उनके कार्यस्थलों से हटने के लिए कहा गया ताकि उनकी जगह पुरुष कर्मचारी खड़े हो सकें। कर्मचारियों का आरोप है कि कुछ महिलाओं को अपनी पोस्ट छोड़कर दूसरे हिस्सों में जाने के लिए कहा गया, जबकि कुछ स्थानों पर उनकी जगह पुरुष कर्मचारियों को तैनात किया गया। महिला कर्मचारियों को प्रतिनिधि मंडल की मौजूदगी के दौरान कुछ खास इलाकों में जाने या उन्हें पार करने से भी रोका गया।

जिस फ्रांस में सिमोन द बुवा ने पुरुष और स्त्री समानता की मशाल बुलंद की, धार्मिक व्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाई, उसी फ्रांस में सौ साल बाद लैंगिक भेदभाव की ऐसी घटना घटेगी, यह किसी ने नहीं सोचा होगा। इस घटना से आहत एफिल टावर के कर्मचारियों ने सोमवार को प्रदर्शन किया, जिसके चलते टावर को आगंतुकों के लिए बंद रखना पड़ा। गौरतलब है कि एफिल टावर दुनिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है और इसकी वेबसाइट के अनुसार यहां हर साल करीब 70 लाख लोग आते हैं। फिलहाल पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोआर ने मामले की जांच कराने की घोषणा की है। जबकि एफिल टावर का संचालन करने वाली कंपनी एसईटीई ने माना कि हिंदू प्रतिनिधि मंडल की ओर से महिलाओं के साथ बातचीत या संपर्क को सीमित रखने की मांग की गई थी। कंपनी ने कहा कि ऐसी शर्तों को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था। एसईटीई के अध्यक्ष एरियल वेल ने इसे अस्वीकार्य बताया और कहा कि एफिल टावर फ्रांस के गणतांत्रिक मूल्यों तथा महिला और पुरुषों की समानता के सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्ध है। कंपनी ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था उसके मूल्यों और लैंगिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थी तथा मामले में जांच की जाएगी। वहीं फ्रांस की नेशनल असेंबली की अध्यक्ष याएल ब्राउन-पिवे ने भी घटना की आलोचना की। उन्होंने कहा कि विदेशी मेहमानों की मांग पूरी करने के लिए महिलाओं को पीछे हटने या सार्वजनिक जीवन से 'अदृश्य' होने के लिए नहीं कहा जा सकता। उनका कहना था कि दूसरे लोगों का स्वागत करने का अर्थ यह नहीं है कि फ्रांस अपने मूल्यों से समझौता करे।

फ्रांस की समानता मंत्री ऑरोर बर्जे ने भी कहा कि फ्रांस में महिलाओं से खुद को 'मिटा देने' या पीछे हटने के लिए नहीं कहा जाता और कोई भी धार्मिक विचार गणराज्य के कानूनों से ऊपर नहीं हो सकता।

फ्रांसीसी सरकार को यह देखने की भी जरूरत है कि उनके भीतर ऐसे कौन लोग बैठे हैं जिन्होंने महिला से दूर रहने जैसे संकीर्णतावादी विचार को बढ़ावा देने में मदद की।

बीएपीएस का तो कहना है कि उसका प्रतिनिधि मंडल बड़ा था, इसलिए उसने एफिल टावर में व्यवस्था को बदलने कहा, लेकिन उसमें लैंगिक भेदभाव की बात नहीं थी। लेकिन जब टावर संचालन करने वाली कंपनी ही मान रही है कि बीएसपीएस की शर्तों को नहीं मानना चाहिए था, तो जरूर कहीं न कहीं लैंगिक भेदभाव हुआ ही होगा। बहरहाल फ्रांस तो इस मामले की जांच अपनी तरह से कर ही लेगा और जिस देश की बुनियाद उदार मानवतावादी मूल्यों पर पड़ी हो, वह खुद को दुरुस्त कर भी लेगा। लेकिन भारत इस वैश्विक शर्मिंदगी से कब और कैसे उबरेगा, यह एक बड़ा सवाल है।

बीएसपीएस का मंदिर पेरिस में बना तो नरेन्द्र मोदी ने इसे ग्रेट जॉय बताया था, तो क्या इस घटना के बाद उन्हें ग्रेट शेम महसूस नहीं हुई। क्योंकि बीएपीएस से उनकी नजदीकी बरसों पुरानी है। मोदी का वैवाहिक जीवन कैसा रहा और शादीशुदा होने के बावजूद वे अकेले क्यों रहते हैं, यह उनका निजी मामला है। लेकिन वैश्विक स्तर पर जब एक भारतीय धार्मिक संस्था पर महिलाविरोधी होने के आरोप लगते हैं, तो बतौर प्रधानमंत्री क्या उन्हें बीएपीएस से अपने संबंधों को स्पष्ट नहीं करना चाहिए।

वैसे बीएपीएस को भी इस बात पर विचार करना चाहिए कि अगर उन्हें महिलाओं से तकलीफ है, उन्हें देखना भी उनके नियमों में गवारा नहीं है, तो फिर दुनिया भर में मंदिर बनवाने निकले ही क्यों हैं। दुनिया से महिलाओं को तो गायब नहीं किया जा सकता। हो सकता है ये पूरा प्रतिनिधि मंडल चार्टर्ड फ्लाइट से पेरिस गया हो, जिसमें परिचारक ही रहे हों, परिचारिकाएं नहीं। लेकिन फिर वे पेरिस में मंदिर बनवा कर उसी फ्लाइट से भारत वापस आ जाते, उन्हें एफिल टावर या किसी भी विश्वप्रसिद्ध स्थल को देखने की जरूरत ही क्या है।

हमेशा की तरह इस बार भी इस मामले में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कोई बयान या प्रतिक्रिया नहीं आया है। उन्होंने राष्ट्रपति पद को सही अर्थों में रबर स्टैम्प ही बना दिया है, जो केवल मोदी सरकार के हर फैसले, हर बात पर मुहर लगाती है। याद कीजिए कि जब उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया था तो भाजपा ने इस बात का बड़ा श्रेय लिया था उसके शासन में देश को पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिली है। लेकिन उनकी आदिवासी या महिला पहचान से देश में इन वर्गों की वस्तुस्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। मोदी सरकार में दलित, आदिवासी, मुसलमान, और महिला उत्पीड़न के मामले बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कभी ऐसी घटनाओं पर सार्थक हस्तक्षेप किया हो, याद नहीं पड़ता।


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