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क्या फिर देश का स्वर्ण भंडार बनेगा अर्थव्यवस्था का सहारा?

भारत के आर्थिक इतिहास ने यह सिद्ध किया है कि संकट के समय स्वर्ण भंडार केवल निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति भी बन सकता है।

क्या फिर देश का स्वर्ण भंडार बनेगा अर्थव्यवस्था का सहारा?
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  • अरुण कुमार डनायक

भारत के आर्थिक इतिहास ने यह सिद्ध किया है कि संकट के समय स्वर्ण भंडार केवल निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति भी बन सकता है। यदि सरकार पारदर्शिता, कानूनी सुरक्षा और उचित प्रोत्साहनों के साथ ऐसी योजना लाने में सफल होती है, तो देश के घरों में सुरक्षित पड़ा स्वर्ण राष्ट्रीय आर्थिक शक्ति में परिवर्तित हो सकता है। परंतु यदि विश्वास का आधार कमजोर रहा, तो भारत का विशाल निजी स्वर्ण भंडार पहले की तरह तिजोरियों में ही बंद रहेगा।

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने एक बार फिर भारत की आर्थिक संवेदनशीलताओं को उजागर कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की अस्थिर कीमतों के कारण ब्रेंट क्रूड हाल के दिनों में 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। तेल की बढ़ती कीमतें सीधे आयात बिल, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव डालती हैं। तेल आयात पर सरकार का नियंत्रण सीमित है, किंतु सोने का आयात ऐसा क्षेत्र है जहां नीति के माध्यम से हस्तक्षेप की संभावना बनी रहती है।

इन परिस्थितियों के बीच केंद्र सरकार एक बार फिर स्वैच्छिक स्वर्ण प्रकटीकरण योजना अथवा इससे मिलती-जुलती किसी व्यवस्था पर विचार कर रही है। यदि यह प्रस्ताव साकार होता है, तो तीन दशक बाद भारत अपनी निष्क्रिय स्वर्ण संपदा को आर्थिक शक्ति में बदलने का एक और ऐतिहासिक प्रयोग कर सकता है। ऐसी योजनाएं सामान्यत: जनता के पास निवेश के रूप में निष्क्रिय पड़े सोने—विशेषकर सोने की ईंटों और सिक्कों—को औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने में सहायक होती हैं। इससे सोने के आयात में कमी लाई जा सकती है, विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है तथा चालू खाते के घाटे पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है। यह विचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस मितव्ययिता संबंधी अपील से भी जुड़ा माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने नागरिकों से एक वर्ष तक त्योहारों पर सोना खरीदने से परहेज करने, ईंधन की बचत करने और अनावश्यक विदेशी यात्राएं कम करने का आग्रह किया था।

भारत में सोना निवेश के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक, धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों के पास दुनिया का सबसे बड़ा निजी स्वर्ण भंडार है, जिसका बड़ा हिस्सा निष्क्रिय रूप से घरों और तिजोरियों में पड़ा रहता है। यदि इस संपदा का एक छोटा भाग भी औपचारिक वित्तीय व्यवस्था में आ जाए तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

भारतीय इतिहास बताता है कि राष्ट्रीय संकट के समय सोना देश की आर्थिक सुरक्षा का आधार भी बना है। 1991 का विदेशी मुद्रा संकट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उस समय भारत के विदेशी मुद्रा भंडार घटकर लगभग 1.1 अरब डॉलर रह गए थे, जो केवल दो-तीन सप्ताह के आवश्यक आयात के लिए पर्याप्त थे। ऐसी विकट परिस्थिति में भारतीय रिज़र्व बैंक और सरकार ने अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए लगभग 46.91 टन सोना गिरवी रखकर 405 मिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई। यह निर्णय तत्कालीन परिस्थितियों में अत्यंत कठिन था, किंतु इसी ने भारत को आर्थिक दिवालियेपन से बचाया और आर्थिक उदारीकरण के नए युग का मार्ग प्रशस्त किया।

1993 में संकट से उबरने के बाद सरकार ने 'गोल्ड बॉन्ड योजनाÓ शुरू की। इसके तहत न्यूनतम 500 ग्राम सोना पांच वर्ष के लिए जमा करना अनिवार्य था। परिपक्वता पर वही सोना लौटाया जाता और प्रति ग्राम 40 रुपये का एकमुश्त ब्याज दिया जाता। योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि सरकार ने जमा किए गए सोने के स्रोत पर कोई प्रश्न नहीं उठाया और जांच से छूट का भरोसा दिया। इसी विश्वास और आर्थिक प्रोत्साहन के कारण लगभग 41.12 मीट्रिक टन सोना सरकार के पास जमा हुआ। मोदी सरकार ने 2015 में सोवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना शुरू की, जिसने निवेशकों को लाभ पहुंचाया लेकिन बढ़ती सोने की कीमतों के कारण सरकार पर राजकोषीय बोझ डाल दिया। यह स्वर्ण को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने के प्रयासों की महत्वपूर्ण कड़ी थी।

आज की परिस्थितियां 1991 जैसी नहीं हैं। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 675 अरब डॉलर से अधिक है और देश तत्काल किसी भुगतान संकट का सामना नहीं कर रहा। किंतु चुनौतियां बदल गई हैं। पश्चिम एशिया में अस्थिरता के कारण तेल आयात महंगा हो रहा है, जबकि भारत हर वर्ष 700-720 टन से अधिक सोने का आयात भी करता है। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार कीमतों में भारी वृद्धि के बावजूद भारत में सोने की मांग बनी हुई है। 2026 की पहली तिमाही में खरीदे गए सोने का लगभग आधा हिस्सा निवेश के लिए बार और सिक्कों के रूप में खरीदा गया, जो दर्शाता है कि देश का बड़ा स्वर्ण भंडार आज भी निष्क्रिय पड़ा है।

सूत्रों के अनुसार सरकार का मानना है कि भारतीय परिवारों के पास सुरक्षित विशाल स्वर्ण भंडार को निष्क्रिय संपत्ति बने रहने देने के बजाय उसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने के उपाय तलाशे जाने चाहिए। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए नई स्वर्ण नीति के विभिन्न विकल्पों पर उच्चस्तरीय विचार-विमर्श जारी है।

लेकिन इस योजना की सफलता का सबसे बड़ा प्रश्न आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक है—क्या नागरिक सरकार पर विश्वास करेंगे? आयकर, प्रवर्तन निदेशालय तथा अन्य जांच एजेंसियों की सक्रियता के कारण अनेक लोग यह आशंका व्यक्त कर सकते हैं कि यदि उन्होंने अपना स्वर्ण घोषित किया तो भविष्य में जांच या कर संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। यदि ऐसी आशंकाएं बनी रहती हैं तो योजना के सफल होने की संभावना सीमित होगी। इसलिए सरकार को केवल आकर्षक वित्तीय प्रतिफल ही नहीं, बल्कि पारदर्शी और विश्वसनीय कानूनी सुरक्षा भी देनी होगी।

सरकार के सामने एक दूसरी चुनौती भी है। यदि सोने के आयात पर अत्यधिक नियंत्रण या अतिरिक्त कर लगाए जाते हैं, तो तस्करी बढ़ने का खतरा रहेगा। भारत पहले भी इस समस्या का सामना कर चुका है। इसलिए स्वर्ण नीति केवल आयात कम करने तक सीमित नहीं रह सकती; उसे कर नीति, प्रवर्तन व्यवस्था और वित्तीय बाजारों के साथ संतुलित रूप से जोड़ना होगा।

वास्तव में यह केवल सोने का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना का प्रश्न है। जब भारतीय परिवार बड़ी मात्रा में अपनी बचत सोने में निवेश करते हैं, तो वह पूंजी उद्योग, अवसंरचना, नवाचार और उत्पादक निवेश के बजाय निष्क्रिय परिसंपत्ति में बंद हो जाती है। यदि वित्तीय बाजार अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और आकर्षक बनें तो स्वाभाविक रूप से लोग अपनी बचत का बड़ा हिस्सा उत्पादक क्षेत्रों में निवेश करेंगे। इसलिए किसी भी स्वर्ण योजना की सफलता वित्तीय प्रणाली में लोगों के विश्वास को मजबूत करने पर भी निर्भर करेगी।

भारत के आर्थिक इतिहास ने यह सिद्ध किया है कि संकट के समय स्वर्ण भंडार केवल निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति भी बन सकता है। यदि सरकार पारदर्शिता, कानूनी सुरक्षा और उचित प्रोत्साहनों के साथ ऐसी योजना लाने में सफल होती है, तो देश के घरों में सुरक्षित पड़ा स्वर्ण राष्ट्रीय आर्थिक शक्ति में परिवर्तित हो सकता है। परंतु यदि विश्वास का आधार कमजोर रहा, तो भारत का विशाल निजी स्वर्ण भंडार पहले की तरह तिजोरियों में ही बंद रहेगा और आर्थिक नीति का यह महत्वाकांक्षी प्रयोग भी केवल एक विचार बनकर रह जाएगा।

(लेखक समाजसेवी हैं)


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