2027 यूपी विधानसभा क्या 2024 लोकसभा के नतीजे दोहराएगा?
अखिलेश इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि जमीन पर कम ताकत दिखने के बावजूद प्रभाव में कांग्रेस की ताकत बहुत है।

अखिलेश इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि जमीन पर कम ताकत दिखने के बावजूद प्रभाव में कांग्रेस की ताकत बहुत है। कांग्रेस के साथ आने से उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है। जैसे एक मोटा उदाहरण दलित वोटों का ही है। दलित यूपी में सबसे कम सपा की तरफ जाता है। मायावती ने मुलायम अखिलेश के खिलाफ बोल-बोलकर उनके मन में बहुत गलत भावनाएं भर रखी हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में केवल छह महीने बचे हैं। 2022 में जनवरी के पहले सप्ताह में चुनाव कार्यक्रम घोषित हो गया था। और 10 फरवरी को पहले चरण का मतदान था।
कहने और लिखने को चुनाव अगले साल हैं। मगर समय कितना बचा है? समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इसीलिए कह रहे हैं कि कांग्रेस की तैयारियां कमजोर लग रही हैं। कांग्रेस में इमरान मसूद इसका जवाब यह कह कर दे रहे हैं कि फिर लड़ लें अकेले चुनाव!
अखिलेश ने अकेले लड़ने की बात नहीं कही है। साफ कहा है कि साथ मिलकर लड़ेंगे। मगर उन्हें बेवजह भड़काने की कोशिश बताती है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कौन देख रहा है इसको लेकर स्पष्टता नहीं है।
इमरान मसूद सांसद हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव सपा के साथ गठबंधन से ही बने थे। मगर कांग्रेस में जैसा अन्य प्रदेशों में होता है वैसा ही यूपी में भी हो रहा है कि हर नेता अपनी अलग भाषा बोल रहा है। केन्द्रीय स्तर पर कांग्रेस तैयारियों में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।
चुनाव को देखते हुए ही उसने वहां अपने इन्चार्ज को बदला। यूपी में इस समय एक दलित वोट ही ऐसा है जो पूरी तरह ओपन है। किसी भी तरफ जा सकता है। और जिस तरफ जाएगा बड़ा हिस्सा। लगभग 21 प्रतिशत है। इसी की दम पर मायावती चार बार मुख्यमंत्री रही हैं। मगर अब उनकी राजनीति खुद अपने को बचाने तक ही सीमित हो गई है। हालत यह है कि लोकसभा और राज्यसभा में उनका एक भी सदस्य नहीं है। और विधानसभा में केवल एक। ऐसे में दलित वोट अपना रास्ता ढूंढ रहा है।
कांग्रेस ने यही देखते हुए अपने एससी डिपार्टमेंट के चैयरमेन राजेन्द्र पाल गौतम को यूपी का नया इंचार्ज बनाया है। मगर उन्होंने यूपी जाकर अपना कार्यभार संभालने से पहले ही दिल्ली में राज्य की आधी सीटों पर दावेदारी ठोक दी। यूपी में इस समय 403 विधानसभा की सीटों में से कांग्रेस की केवल 2 सीटें हैं। और दावा 200 से एक या दो ज्यादा सीटों पर!
जैसा कि हमने ऊपर लिखा केवल 6 महीने हैं और राज्य बहुत टफ। कितना? वह इसी से समझ लीजिए कि 37 साल पहले कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री हुए थे नारायणदत्त तिवारी। 1989 तक। उसके बाद से सपा भाजपा बसपा का दौर शुरू हो गया। और कांग्रेस 37 साल से राज्य में अप्रसांगिक पड़ी हुई है। सारे प्रयोग कर लिए अकेले लड़ कर भी और सपा-बसपा के साथ मिलकर भी। अपनी सबसे करिश्माई नेता मानी जाने वाली प्रिंयका गांधी को इंचार्ज बनाकर भी। मगर वह पार्टी जो आजादी के पहले जब संयुक्त प्रान्त कहा जाता था उस समय से बीच का जब गैरकांग्रेस वाद के नाम पर 1967 में संविद सरकारें बन रही थीं का थोड़ा सा अन्तराल छोड़ दें तो 1989 तक हमेशा सत्ता पर काबिज रही वह अब एक कमजोर हालत में पड़ी हुई है।
पांच साल तक कोई काम नहीं होता है। और जब चुनाव आता है तो हर बार वह बेमतलब की बहस शुरू हो जाता है कि साथ लड़ना है या अकेले! अभी समय है। हालांकि संभावनाएं यही कहती हैं कि साथ मिलकर लड़ेंगे। अखिलेश ने बोला ही है। और राहुल साथ मिलकर लड़ने के हिमायती हैं। और सबसे बड़ी बात 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजों ने बता दिया कि साथ मिलकर लड़ने का क्या फायदा है। सपा और कांग्रेस ने मिलकर आधी से ज्यादा सीटें जीत लीं। 80 सीटों में से सपा ने 37 जीतीं। जो उसका आज तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। कांग्रेस ने छह। मिलकर 43 हुईं। और भाजपा केवल 33 पर सिमट गई।
लोकसभा की सीटों पर विधानसभा के परिणाम नहीं मापे जा सकते। मगर दो साल में राज्य में भाजपा की हालत और कमजोर हो गई है। उसके आन्तरिक विवाद जो भाजपा में सामान्यत: होते नहीं हैं वह तो हैं ही। अखिलेश यादव इन्हें दो इंजनों का टकराना कहते हैं। भाजपा बातों से लोगों को भरमाने के लिए इस तरह के भाषाई खेल करती रहती है। डबल इंजन की सरकारें। अखिलेश अच्छा तंज करते हैं इस पर कि यूपी में तो दोनों इंजन आपस में ही टकराते रहते हैं। मोदी और योगी के बीच तनाव होने की बात करते हुए वे कहते हैं कि एक दूसरे के नमस्कार भी नहीं लिए जाते।
किसी और राज्य में इस तरह की स्थिति की आप कल्पना भी नहीं कर सकते। मगर यूपी में भाजपा के आन्तरिक झगड़ों का गहरा असर है। ऐसे में श्रीराम मंदिर के चढ़ावे में चोरी का मामला भाजपा के लिए सबसे बड़ी समस्या बन गया है।
खुद भाजपा विश्व हिन्दू परिषद के लोग इससे बेहद आहत हैं। दोषियों के लिए फांसी की मांग कर रहे हैं। तब आप सोच सकते हैं कि आम जनता में इसको लेकर कितना दु:ख और रोष होगा। पेपर लीक बेरोजगारी जैसी दूसरी समस्याएं तो हैं हीं।
कांग्रेस छात्रों की समस्या पर प्रयागराज में एक बड़ा छात्र सम्मेलन कर रही है। यहां यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि विधानसभा में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व चाहे कम हो मगर उसके मुद्दों का राज्य में बहुत समर्थन है। पहले प्रयागराज में 10 जुलाई को छात्र सम्मेलन होने वाला था। मगर इसके लिए छात्र और युवाओं का उत्साह देखते हुए कांग्रेस ने और ज्यादा तैयारी के साथ इसे करने के लिए इसकी तारीख बढ़ा दी है। अब यह 19 जुलाई को होगा।
एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस की टीमों के साथ कांग्रेस के समन्वयक भी प्रयागराज और उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों में छात्र और युवाओं के बीच जाकर उन्हें सम्मेलन में आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। राहुल गांधी कोटा के पहले छात्र सम्मेलन की तरह यहां भी रहेंगे। और प्रियंका गांधी भी यहां आएंगी।
अखिलेश इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि जमीन पर कम ताकत दिखने के बावजूद प्रभाव में कांग्रेस की ताकत बहुत है। कांग्रेस के साथ आने से उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है। जैसे एक मोटा उदाहरण दलित वोटों का ही है। दलित यूपी में सबसे कम सपा की तरफ जाता है। मायावती ने मुलायम अखिलेश के खिलाफ बोल-बोलकर उनके मन में बहुत गलत भावनाएं भर रखी हैं। मगर जब कांग्रेस सपा के साथ आती है तो दलित भी कांग्रेस पर विश्वास करके गठबंधन के साथ आता है। 2024 लोकसभा में उसने सपा कांग्रेस को वोट दिया।
वैसे तो 2027 में सात राज्यों में विधानसभा चुनाव है। और हर राज्य का अपना अलग महत्व है। यूपी के अलावा उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात, हिमाचल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के साथ मणिपुर एवं गोवा में भी चुनाव है।
मगर सबसे बड़ा राज्य होने के कारण और अभी श्रीराम मंदिर जो सीधा प्रधानमंत्री मोदी की देखरेख में है। वहां ट्रस्ट में उनके ही सारे आदमी लगाए गए थे। वहां चढ़ावे में चोरी हो जाना बताता है कि या तो सरकार का नियंत्रण कमजोर हो गया है या यह सब कुछ सरकार की जानकारी में हो रहा था।
एक ड्राइवर टिन्नू यादव को मुख्य अभियुक्त बनाया जा रहा है। उसके लिए फांसी की सज़ा की मांग की जा रही है। बाकी एफआईआर में जिन आरोपियों के नाम हैं उनके लिए कहा जा रहा है कि छह-छह महीने जेल में रखकर फिर इन्हें छोड़ दिया जाए।
राहुल गांधी यही कहते हैं कि यह मनुस्मृति लागू करना चाहते हैं। फिर कानून ऐसे ही होंगे। ओबीसी, दलित, आदिवासी, महिला के लिए अलग सज़ा। कठोर। बाकी के लिए हल्की। माफी।
यूपी विधानसभा चुनाव में यह सब मुद्दे बनेंगे। अखिलेश पीडीए के नाम से चुनाव लड़ रहे हैं। पीडीए मतलब पी से पिछड़ा, डी से दलित और ए से अल्पसंख्यक। अखिलेश इससे जरा भी इधर-उधर नहीं हो रहे। चुनाव पूरी तरह मुद्दों और सिद्धांतों का बनता जा रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


