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क्या निजीकरण से सुधरेगी स्वास्थ्य व्यवस्था?

मध्यप्रदेश सरकार ने रीवा, देवास और गुना जिलों में कुछ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन के लिए आउटसोर्स प्रणाली पर आधारित एक पायलट परियोजना को मंजूरी दी है।

क्या निजीकरण से सुधरेगी स्वास्थ्य व्यवस्था?
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  • राजु कुमार

जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश सहित स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे कई संगठनों ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि सरकार को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। उनका कहना है कि समस्या की पहचान सही है, लेकिन समाधान पर गंभीर सवाल है। यदि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी है तो प्राथमिकता उन कमियों को दूर करने की होनी चाहिए।

मध्यप्रदेश सरकार ने रीवा, देवास और गुना जिलों में कुछ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन के लिए आउटसोर्स प्रणाली पर आधारित एक पायलट परियोजना को मंजूरी दी है। मंत्रि-परिषद के अनुसार यह व्यवस्था उन स्वास्थ्य केंद्रों में लागू की जाएगी जहां चिकित्सकों के अधिकांश पद लंबे समय से रिक्त हैं। सरकार का दावा है कि इससे आम लोगों को स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी और छोटी-मोटी बीमारियों के उपचार के लिए जिला अस्पतालों पर निर्भरता कम होगी। सरकार ने इस व्यवस्था को पांच वर्ष की पायलट परियोजना के रूप में लागू करने का निर्णय लिया है। इसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा और अनुभव सकारात्मक रहने पर इसे प्रदेश के अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक विस्तारित किया जा सकता है।

जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश सहित स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे कई संगठनों ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि सरकार को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। उनका कहना है कि समस्या की पहचान सही है, लेकिन समाधान पर गंभीर सवाल है। यदि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी है तो प्राथमिकता उन कमियों को दूर करने की होनी चाहिए, न कि संस्थानों के संचालन को आउटसोर्स व्यवस्था के हवाले करने की। यह बहस केवल तीन जिलों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद कमियों का समाधान सरकारी संस्थाओं को मजबूत करके किया जाएगा या उनके संचालन की जिम्मेदारी धीरे-धीरे निजी क्षेत्र को सौंपी जाएगी।

प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ताजा आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण के साथ-साथ मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी गैर-संचारी बीमारियां भी बढ़ रही हैं। शिशु और मातृ स्वास्थ्य से जुड़े कई संकेतकों में भी प्रदेश को अभी लंबा रास्ता तय करना है। ऐसे समय में सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की जरूरत और बढ़ जाती है।

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी के अनुसार प्रदेश में 4134 उप स्वास्थ्य केंद्रों, 1045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। इसके साथ ही चिकित्सकों, विशेषज्ञों, नर्सिंग और पैरामेडिकल कर्मचारियों के बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के अधिकांश पद खाली होने के कारण बड़ी संख्या में मरीजों को जिला अस्पतालों के लिए रेफर करना पड़ता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में जिला अस्पताल 100 से 200 किलोमीटर दूर हैं, जिससे उपचार में देरी और मरीजों की परेशानी बढ़ जाती है।

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सरकार का नया निर्णय सामने आया है। लेकिन इसे लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्कि्सस्ट) का कहना है कि यदि समस्या डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी है तो उसका समाधान नियमित भर्ती, बेहतर पदस्थापना, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा के लिए प्रोत्साहन और स्वास्थ्य संस्थानों की क्षमता बढ़ाने में खोजा जाना चाहिए। उनका मानना है कि सरकारी व्यवस्था की कमियों को दूर करने के बजाय संचालन की जिम्मेदारी किसी बाहरी एजेंसी को सौंपना स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।

मध्यप्रदेश में यह पहला अवसर नहीं है जब स्वास्थ्य संस्थानों को निजी भागीदारी के माध्यम से संचालित करने की कोशिश की गई हो। वर्ष 2015 में अलीराजपुर जिला अस्पताल और जोबट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ऐसा प्रयोग किया गया था। जन स्वास्थ्य अभियान के अनुसार वह मॉडल अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया और क्षेत्र के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं देखा गया, नतीजतन सरकार को इसे वापस लेना पड़ा था। इसी तरह वर्ष 2024 में जिला अस्पतालों को पीपीपी मॉडल के माध्यम से मेडिकल कॉलेजों से जोड़ने के प्रस्ताव पर भी व्यापक विरोध हुआ था। तब चिकित्सक संगठनों और नागरिक समाज के विभिन्न वर्गों ने आशंका जताई थी कि इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर होगी।

इसी कारण वर्तमान निर्णय को भी कई लोग एक अलग प्रशासनिक प्रयोग के बजाय स्वास्थ्य सेवाओं में निजी भागीदारी बढ़ाने की व्यापक प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देख रहे हैं। उनकी चिंता यह है कि यदि यह मॉडल सफल घोषित किया गया तो भविष्य में इसका दायरा और बढ़ सकता है। स्वास्थ्य सेवा को सामान्य बाजार व्यवस्था की तरह नहीं देखा जा सकता। शिक्षा और स्वास्थ्य ऐसे क्षेत्र हैं जहां राज्य की भूमिका केवल नियामक की नहीं बल्कि सेवा प्रदाता की भी होती है। संविधान के नीति-निदेशक सिद्धांत भी जनस्वास्थ्य के संरक्षण और सुधार की जिम्मेदारी राज्य पर डालते हैं। इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े किसी भी बड़े फैसले का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं किया जा सकता।

डॉक्टरों की कमी, विशेषज्ञ सेवाओं का अभाव और प्रबंधन की कमजोरियां वास्तविक समस्याएं हैं। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यदि किसी सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं तो समाधान डॉक्टरों की नियुक्ति है या अस्पताल का संचालन निजी हाथों को सौंप देना। यदि स्कूलों में शिक्षकों की कमी हो तो उसका समाधान स्कूलों का निजीकरण नहीं माना जाता। यदि पुलिस बल में रिक्तियां हों तो थानों का संचालन निजी एजेंसियों को नहीं सौंपा जाता। उसी प्रकार स्वास्थ्य संस्थानों की समस्याओं का स्थायी समाधान भी उनकी क्षमता बढ़ाने, रिक्त पद भरने और संसाधनों को मजबूत करने में ही निहित है।

मध्यप्रदेश जैसे राज्य में, जहां बड़ी आबादी आज भी सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है, इस प्रश्न का महत्व और बढ़ जाता है। स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियां वास्तविक हैं और उनका समाधान भी आसान नहीं है। फिर भी दीर्घकाल में सबसे भरोसेमंद व्यवस्था वही होगी जिसमें सरकार अपनी संस्थाओं को मजबूत करे, रिक्त पद भरे, विशेषज्ञ सेवाओं का विस्तार करे और लोगों का भरोसा सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र पर कायम रखे। आखिरकार एक कल्याणकारी राज्य की पहचान केवल योजनाएं बनाने से नहीं, बल्कि अपनी सार्वजनिक संस्थाओं को सक्षम और सुलभ बनाए रखने से भी होती है।


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