क्या ईरान मक्का समझौते में शामिल होगा?
मध्य पूर्व के देशों के लिए ईरान का समझौते में शामिल होना सबके लिए फ़ायदेमंद होगा।

- असद मिर्ज़ा
मध्य पूर्व के देशों के लिए ईरान का समझौते में शामिल होना सबके लिए फ़ायदेमंद होगा। हक़ीक़त यह है कि ईरान को अपने पड़ोसी देशों पर जवाबी वार करना पड़ा क्योंकि यही एकमात्र रास्ता था जिससे वह उन्हें अमेरिका पर अपने हमले रोकने के लिए दबाव डालने पर मजबूर कर सकता था। ईरान के ज़्यादातर निशाने पड़ोसी देशों में मौजूद अमेरिकी अड्डे और रडार प्रतिष्ठान थे, हालांकि कुछ आर्थिक ठिकाने भी निशाना बने।
जैसे ही 5 अगस्त को मक्का समझौते पर हस्ताक्षर हुए, इस बात की अटकलें शुरू हो गईं कि कौन से देश जल्द से जल्द इस समझौते में शामिल हो सकते हैं। इस सूची में ईरान सबसे ऊपर है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इस परिदृश्य का समर्थन नहीं करती।
पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुआ मक्का समझौता अपनी स्थापना के बाद से ही ध्यान का केंद्र बना हुआ है। इसे नाटो के अनुच्छेद 5 की तज़र् पर एक समझौता क़रार दिया गया, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमले को सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है। लेकिन असल में, ख़ुद नाटो ने भी ईरान युद्ध और अमेरिका के इराक़ पर हमले के दौरान, जब अमेरिका ने तथाकथित 'सामूहिक विनाश के हथियारों' की खोज का दावा किया था, अनुच्छेद 5 का इस्तेमाल नहीं किया। यह केवल एक बार, 12 सितंबर 2001 को, 9/11 के हमले के बाद इस्तेमाल हुआ है।
तुर्की, जो नाटो की सदस्यता रखने के बावजूद अपनी नाटो ज़िम्मेदारियों से बाहर रहकर इस समझौते में शामिल हुआ है, उस पर होने वाले किसी भी हमले को भी इस समझौते के नतीजे में नाटो का समर्थन हासिल नहीं होगा। इससे ज़ाहिर होता है कि इस समझौते के सदस्यों की ओर से अनुच्छेद 5 जैसी प्रतिबद्धता की संभावना कम है, क्योंकि तुर्की कभी भी नाटो द्वारा नज़रअंदाज़ या अलग-थलग किए जाने का जोखिम नहीं उठाएगा।
इस समझौते में शामिल हर देश के अपने हित और सुरक्षा चिंताएं हैं। सऊदी अरब को ईरान और उसके समर्थित समूहों, ख़ासकर हूती और इराक़ में मौजूद मिलिशिया की ओर से अपनी धरती पर हमलों का डर है। वह अपने तेल निर्यात में किसी भी रुकावट का इच्छुक भी नहीं है। तुर्की उत्तरी सीरिया के हालात, कुर्द विद्रोहियों और इज़रायल के साथ जारी तनाव से प्रभावित है। हाल ही में नेतन्याहू ने तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन को 'यहूदी-विरोधी तानाशाह' क़रार दिया। तुर्की को साइप्रस-ग्रीस-इज़रायल धुरी को लेकर भी चिंता है।
पाकिस्तान अपने पश्चिमी प्रांतों में विद्रोह का सामना कर रहा है; वह अफ़ग़ानिस्तान के साथ टकराव में उलझा हुआ है और भारत के साथ उसका तनाव भी बरक़रार है। वह ईरान के साथ टकराव शुरू नहीं कर सकता क्योंकि बलूचिस्तान के अशांत इलाक़े में उसकी ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी सीमा मिलती है।
तीनों देशों के लिए इज़रायल साझा चिंता का विषय है, जो अपनी मज़ीर् से कहीं भी हमला कर सकता है, जैसा कि नवंबर 2025 में क़तर में किया गया, और पारंपरिक सुरक्षा प्रदाता अमेरिका उसे रोकने में नाकाम रहा। हालांकि सऊदी अरब और इज़रायल के बीच सीधी दुश्मनी नहीं है, जबकि तुर्की का वहां दूतावास भी मौजूद है। सिफ़र् पाकिस्तान ही इज़रायल को मान्यता देने से इंकार करता है।
ऐसी ख़बरें भी हैं कि मध्य पूर्व के देशों, जिनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर शामिल हैं, ने निजी तौर पर ईरान से संपर्क कर क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े संदेश भेजे हैं। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़र क़ालीबाफ़ ने बताया कि उन्हें पड़ोसी देशों से नई सुरक्षा व्यवस्थाओं और आर्थिक सहयोग से जुड़े कई संदेश मिले हैं। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका ने इज़रायल की ख़ातिर अपने सहयोगियों के हितों को नज़रंदाज़ करते हुए और दबाव डालते हुए इन सबकी सुरक्षा को इस हद तक जोखिम में डाल दिया है कि उन्हें कुछ समय के लिए अपना अस्तित्व दांव पर लगता महसूस हुआ। ईरान ने मक्का समझौते का स्वागत किया है क्योंकि इसने अमेरिका को बाहर रखा है।
रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक़ डार ने मक्का समझौते से जुड़ी बातचीत में ईरान को भी सूचित रखा, ताकि उसकी इस आशंका को दूर किया जा सके कि यह समझौता उसके ख़िलाफ़ है। अन्य मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि ईरान को मक्का समझौते में शामिल होने का न्योता दिया गया है, हालांकि इसकी पुष्टि न तो समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों ने की है और न ही ख़ुद ईरान ने आधिकारिक तौर पर की है। यहां तक कि हूतियों द्वारा सऊदी जहाज़रानी और तेल प्रतिष्ठानों पर किए गए हमलों का भी समझौते के सदस्यों ने कोई जवाब नहीं दिया।
इसी दौरान पाकिस्तान के आसिम मुनीर ने तेहरान का दौरा किया, जिसका मक़सद अमेरिका के साथ बातचीत दोबारा शुरू करवाना था। यह भी सामने आया है कि ट्रंप ने कुछ दिन पहले आसिम मुनीर से फ़ोन पर बात की थी। ईरानी राष्ट्रपति ने साफ़ किया कि 'दबाव और धौंस' इस्लामाबाद समझौते के क्रियान्वयन को और जटिल ही बनाएंगे। यह मालूम नहीं कि मक्का समझौते में शामिल होने के प्रस्ताव पर बात हुई या नहीं।
पाकिस्तान और समझौते के अन्य सदस्यों की ओर से तेहरान को, अमेरिका के साथ उसके जारी तनाव के बावजूद, साथ लाने की कोशिशें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि ईरान असल में इस समझौते के गठन की मूल वजह नहीं है। इसके अलावा, ईरान के पास इज़रायल की एकतरफ़ा कार्रवाइयों का मुक़ाबला करने की सैन्य क्षमता मौजूद है। ऐसे में दो ही संभावित वजहें बचती हैं: इज़रायल और भारत। सऊदी अरब के इज़रायल के साथ कारोबारी रिश्ते हैं, जबकि भारत के साथ उसका साझा सुरक्षा कार्यकारी समूह है, जिसकी आख़िरी बैठक इसी साल जनवरी में हुई, साथ ही दोनों के बीच गहरे व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध भी क़ायम हैं।
भारत और तुर्की कुछ वर्षों के सर्द रिश्तों के बाद अपने रिश्तों को दोबारा बहाल करने की कोशिशों में हैं। हालांकि तुर्की, चीन के साथ मिलकर पाकिस्तान को हथियार और अन्य सैन्य सहायता देना जारी रखेगा, लेकिन किसी टकराव की स्थिति में उसकी सेना भेजने की संभावना कम है। इस समर्थन का सबूत उस समय मिला जब कई तुर्की विमान, कथित सैन्य साज़ो-सामान — संभवत: ड्रोन और उनके नियंत्रण केंद्र— लेकर हाल ही में पाकिस्तान पहुंचे।
मध्य पूर्व के देशों के लिए ईरान का समझौते में शामिल होना सबके लिए फ़ायदेमंद होगा। हक़ीक़त यह है कि ईरान को अपने पड़ोसी देशों पर जवाबी वार करना पड़ा क्योंकि यही एकमात्र रास्ता था जिससे वह उन्हें अमेरिका पर अपने हमले रोकने के लिए दबाव डालने पर मजबूर कर सकता था। ईरान के ज़्यादातर निशाने पड़ोसी देशों में मौजूद अमेरिकी अड्डे और रडार प्रतिष्ठान थे, हालांकि कुछ आर्थिक ठिकाने भी निशाना बने।
क्षेत्र के देशों की मुख्य चिंता इज़रायल की सैन्य ताक़त, उसकी मज़ीर् से कहीं भी हमला करने की क्षमता और उसे मिला अमेरिकी समर्थन है। अब ईरान, जो इसका मुक़ाबला करने की क्षमता रखता है, एक साझा प्रतिद्वंद्वी बन जाएगा। समझौते में शामिल देश वाशिंगटन और तेहरान के बीच भविष्य की बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं। वे अपने अड्डों को अमेरिकी सेना द्वारा ईरान पर हमले के लिए इस्तेमाल होने से रोककर तेहरान की चिंताओं को दूर कर सकते हैं। क्षेत्र का कोई भी देश परमाणु क्षमता वाला ईरान नहीं चाहता, और इस बात को सुनिश्चित किया जा सकता है।
इसके अलावा भी कई फ़ायदे होंगे। लाल सागर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो सऊदी तेल टैंकरों के लिए बंद हैं, खुल जाएंगे। इसके अलावा हूतियों और इराक़ में मौजूद ईरान-समर्थित समूहों पर क़ाबू पाया जा सकेगा। उन्हें इज़रायल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की आज़ादी मिलेगी, मगर सऊदियों के ख़िलाफ़ नहीं। ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों का ख़ात्मा हो जाएगा। बदले में खाड़ी देश ईरान के पुनर्निर्माण के लिए धन मुहैया करा सकते हैं।
इस क़दम से यह धारणा भी ख़त्म हो जाएगी कि मक्का समझौता एक 'सुन्नी नाटो' है। यह क्षेत्र को एकजुट करेगा, और देशों को अपनी ओर खींचेगा, ख़तरे कम करेगा, और अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत करेगा। ऐसे में अमेरिका की भूमिका सीमित हो जाएगी, जो उसे नागवार गुज़रेगा।
यह क़दम चीन के लिए भी फ़ायदेमंद होगा क्योंकि फ़िलहाल वह ईरान से नज़दीकी की वजह से मुश्किलों का सामना कर रहा है, जो उसके लिए चिंता का विषय है। अमेरिकी भूमिका में कमी और ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों के ख़ात्मे से चीन के लिए अपना प्रभाव बढ़ाने के रास्ते खुल जाएंगे।
भारत के लिए, जिसके मध्य पूर्व के देशों के साथ-साथ इज़रायल से भी अच्छे आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं, सबसे बड़ा फ़ायदा यह होगा कि किसी आतंकवादी कार्रवाई के जवाब में भारत की किसी कार्रवाई के ख़िलाफ़ मक्का समझौते का इस्तेमाल करने की पाकिस्तान की किसी भी कोशिश को ख़ास समर्थन हासिल नहीं होगा। कुल मिलाकर, ईरान की मक्का समझौते में शमूलियत मध्य पूर्व के लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकती है, लेकिन ऐसा होना फ़िलहाल नामुमकिन नज़र आता है।
(लेखक अंतरराष्ट्रीय, रक्षा और रणनीतिक मामलों के नई दिल्ली स्थित वरिष्ठ समीक्षक हैं।)


