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युवा इतना 'कॉकरोची' क्यों है?

भारत में इन दिनों सोशल मीडिया पर चल रहा 'कॉकरोच जनता पार्टी' अभियान केवल एक इंटरनेट ट्रेंड या मीम संस्कृति का हिस्सा नहीं है।

युवा इतना कॉकरोची क्यों है?
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  • संदीप सिंह

'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम की यह कैम्पेन भारत के चुनावी-राजनीतिक तंत्र के सीमाओं के खोखलेपन को भी उजागर कर रही है जहां 'चुने हुए राजनीतिक लोग' एक अलग ही वर्ग बन चुके हैं। भारत का 'पोलिटिकल क्लास' जनता से बहुत दूर जा चुका है। इसे एकाउंटेबल बनाने का कोई औजार जनता के पास अब बचा नहीं है। जनता याचक मात्र बनकर रह गई है। 'पॉलिटिकल क्लास' अब नया राजा है।

भारत में इन दिनों सोशल मीडिया पर चल रहा 'कॉकरोच जनता पार्टी' अभियान केवल एक इंटरनेट ट्रेंड या मीम संस्कृति का हिस्सा नहीं है। यह उस गहरे असंतोष, हताशा और गुस्से की अभिव्यक्ति है जो देश के युवाओं और आम लोगों के भीतर धीरे-धीरे जमा होता गया है। देश के मुख्य न्यायाधीश ने जिस भी मानसिकता से बेरोजगार युवाओं के लिए 'कॉकरोच' के रूपक का प्रयोग किया हो, एक बड़ा युवा वर्ग इस रूपक से जुड़ी त्रासदी, तिरस्कार, शोषण, और पीड़ा को अपने जीवन से जोड़ पा रहा है। बेरोजगारी, मंदी, महंगाई, परीक्षा घोटाले, भ्रष्टाचार, राजनीतिक दूरी और सामाजिक अपमान के बीच पिसती एक पीढ़ी ने इस रूपक में अपने जीवन का प्रतिबिंब देख लिया है। यह देश के युवाओं में चौतरफ़ा फैली हताशा, चिढ़ और गुस्से का प्रतीक बन रही है। आज युवा का जीवन किसी कॉकरोच से अलग है क्या? दोनों हमारी व्यवस्था का तिरस्कृत और अदृश्य बहुमत हैं। यह तिरस्कृत, और अदृश्य लोगों का विद्रोह है। इसे कोई दल या विकल्प न समझा जाये। इसके पास आपके हर सवाल का जवाब नहीं है। हमारे समय की त्रासदी पर एक मजाक, एक चुटकुले के रूप में इसकी शुरुआत हुई है। इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है कि एक मजाक पूरी व्यवस्था पर भारी पड़ गया है।

यह तेज संचार का दौर है। लोगों की जानकारी, उम्मीदें और बेचैनी भी बढ़ी है। अब लोग लंबे इंतज़ार के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें आज, अभी अपनी समस्या का हल चाहिए। उन्हें ठोस बदलाव चाहिए। चुनावों में चाहे उन्होंने किसी भी दल को वोट दिया हो, बड़ी संख्या में लोग अपने वर्तमान जीवन से संतुष्ट नहीं दिखते। यही कारण है कि एक व्यंग्यात्मक अभियान अचानक व्यापक जनभावना का प्रतीक बन जाता है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम की यह कैम्पेन भारत के चुनावी-राजनीतिक तंत्र के सीमाओं के खोखलेपन को भी उजागर कर रही है जहां 'चुने हुए राजनीतिक लोग' एक अलग ही वर्ग बन चुके हैं। भारत का 'पोलिटिकल क्लास' जनता से बहुत दूर जा चुका है। इसे एकाउंटेबल बनाने का कोई औजार जनता के पास अब बचा नहीं है। जनता याचक मात्र बनकर रह गई है। 'पॉलिटिकल क्लास' अब नया राजा है। इन्हीं में कोई एक बेरोजगार युवाओं को 'कॉकरोच' कह देता है तो सोशल मीडिया में भूचाल आ जाता है। करोड़ों की संख्या में निकले ये कॉकरोच नए 'राजाओं' के लिए चेतावनी हैं।

'कॉकरोच' शब्द मूलत: तिरस्कार का प्रतीक माना जाता है। लेकिन जब बेरोजगार युवा खुद को इसी रूपक से जोड़ने लगें तो यह केवल भाषा का खेल नहीं रह जाता, बल्कि व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी बन जाता है। करोड़ों युवा इस कैंपेन से जुड़ रहे हैं। यह कितना आर्गेनिक है और कितना प्रायोजित है, इसके पीछे कौन सी बाहरी या भीतरी शक्तियां हैं, यह टिकेगा या एक बुलबुले की तरह ग़ायब हो जाएगा, इसका मकसद क्या है आदि-सवाल हैं जो उठ रहे हैं और उठने भी चाहिए- मगर इस परिघटना को 'ख़ारिज' करने के अंदाज़ से देखने से फ़ायदा नहीं है। सतह के नीचे कुछ तो ऐसा करेंट है जिसे इस कैम्पेन ने छुआ है। सोशल मीडिया पर अतरंगी कंटेंट की आई बाढ़ कुछ तो बता रही है। क्या हम सुनने के लिए तैयार हैं?

आज भारत एक अजीब चौराहे पर खड़ा है। मंदी मुस्कुरा रही है। महंगाई का मकड़जाल जेब और गर्दन दोनों पर कसने लगा है। गैस, पेट्रोल, डीजल, खाद, बिजली और इज्जत की दिक्कत बढ़ती जा रही है। आमदनी बढ़ नहीं रही। इज्जत मिल नहीं रही। अच्छी शिक्षा और सेहत अब सिफ़र् पैसे से पाई जा सकती है। परीक्षा में धांधली अब राष्ट्रीय आयोजन है। किसी को कुछ फ़र्क नहीं पड़ता। टैक्स बढ़ते जा रहे हैं, तनख्वाह वाले लोग सालाना सैलरी बढ़ोतरी और महीनावार ईएमआई के बीच की दूरी पाटने में चुक जा रहे हैं। उद्योग जगत में घबराहट है। निर्यात और निवेश के सारे पैमाने हिले हुए हैं। बाजार और रुपया दोनों धराशायी होने के कगार पर है। दफ़्तरशाही और अफसरशाही अपने चरम पर है। वहां काम की गारंटी भले न हो, आपके अपमान की गारंटी पूरी है। सड़क से लेकर संसद और अदालत तक कहीं भी आपको जलील किया जा सकता है।

शहरों की अर्थव्यवस्था सस्ते श्रम पर टिकी है। ड्राइवर, डिलीवरी बॉय, सफाईकर्मी, निर्माण मजदूर, दर्जी, मिस्त्री और फैक्ट्री कर्मचारी शहरों को चलाते हैं, लेकिन शहर उनकी उपस्थिति को सम्मान देने को तैयार नहीं दिखते। उनसे काम तो चाहिए, मगर पहचान नहीं। यही अदृश्यता धीरे-धीरे असंतोष में बदलती है। थोड़े समय पहले नोएडा में मजदूरों ने क्या आवाज उठाई थी? डंडे के ज़ोर से उसे फ़िलहाल दबाया गया है मगर क्या उनके सवालों का जवाब दिया जा रहा है? बात सिर्फ परीक्षा में धांधली की ही नहीं, धांधली पर टिकी व्यवस्था की भी है। युवाओं के मन में सवाल हैं- धांधली से बनी इस व्यवस्था में मेहनत करके क्या फायदा? यहां न मेहनत का सम्मान है न मेधा का। हुनर हो, हौसला या बुद्धि- धांधली पर, जुगाड़ और दलाली पर टिकी यह व्यवस्था अपने फायदे के अलावा हर चीज को रौंद देती है। यह धन की, ताक़त की, चमक की और चमत्कार की पूजा करती है। अरबपतियों को अपना आदर्श मानती है और आदिवासियों को, मजदूरों को, किसानों को, युवाओं को शोरशराबे की तरह नजरअंदाज करती है। अंदर ही अंदर जनता के असंतोष का एक ज्वालामुखी मचल रहा है। उसकी चिंगारियां अलग-अलग मौकों पर ख़ुद को व्यक्त कर रही हैं। कभी वह अन्ना आंदोलन के पीछे खड़ी हो जाती है और छली जाती है। कभी वह विजय के पीछे खड़ी हो जाती है, कभी किसी के। मगर उसके स्वीकार में इंकार है। वह हर पुराने को ख़ारिज करना चाह रही है। वह किसी पर भरोसा नहीं कर पा रही है। हर बार धोका खा रही है। उसे किसी से ईमानदार और सही जवाब नहीं मिल रहा है। वह 'अपना शीश काटकर हाथ में रखकर घूमने वालेÓ को ढूंढ रही है।

नारे और नैरेटिव ताकतवर चीज होते हैं। देश, धर्म और जाति बड़ी शक्तियां हैं और इनसे बड़ा कोई नशा भी नहीं। मगर ज़िंदगी के सच की कील जब पैर में गड़ती है, इंसान चिंहुककर सड़क किनारे खड़ा हो जाता है। जब बात पेट और परिवार पर आती है तो राजनीतिक व्यवस्था का ढोंग उसे दिखाई पड़ जाता है। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं मगर इंसान की सच्चाई नहीं बदलती। चुनाव से पहले उसे वर्ल्डकप का टिकट दिखाया जाता है, चुनाव बाद उसे गली क्रिकेट भी नहीं मिलती। उसका गुस्सा मचल उठता है। लोकतंत्र के नाम पर कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक टिक नहीं सकती- अगर जनता का भरोसा उसकी निष्पक्षता से उठ गया हो। आज वैसी स्थिति बन आई है। आर्थिक विभाजन गहराता जा रहा है। आमदनी और इज्जत, शिक्षा और सेहत लोगों को मिल नहीं रही।

आज बीजेपी यह सोचकर जो इतना इतरा रही है कि उसने भारत के चुनावी तंत्र का तोड़ पैदा कर लिया है और धन-बल-ध्रुवीकरण से संचालित अपनी चुनावी मशीन से वह कोई भी चुनाव जीत सकती है- ऐसा समय आने वाला है कि जनता के आक्रोश के सामने उसका पूरा 'कॉम्पलेक्स' ध्वस्त हो जाएगा। 'कॉकरोच कैम्पेन' एक झांकी है, असली शक्ति दिखना अभी बाक़ी है। वैज्ञानिक जानते हैं कि कॉकरोच जैसे कीड़ों के बगैर हमारी यह पृथ्वी एक हफ़्ते भी जीवित नहीं रह सकती। हम उन्हें देखते ही कुचल देते हैं। काला 'हिट' से मार देते हैं। मगर 'कॉकरोच' कभी मरते नहीं हैं। सत्ताएं समाप्त हो जाती हैं, कॉकरोच हमेशा रहते हैं। क्या आप उन्हें देख पा रहे हो?

इतिहास जनता के साथ बारंबार हुए छलों की लिस्ट लेकर बैठा हैं। 'कॉकरोचों' के साथ भी आज वह खतरा मौजूद है। सिर्फ ग़ुस्से से परिवर्तन नहीं आता। स्वत:स्फूर्तता हमेशा बदलाव नहीं लाती। इंस्टाग्राम से स्थिति नहीं बदल सकती। मीम से मूवमेंट नहीं खड़ा होता। भारत कोई नेपाल, श्रीलंका या बांग्लादेश नहीं है। आर्थिक असमानता, कॉरपोरेट वर्चस्व, जातीय जकड़न, भ्रष्ट नौकरशाही, धार्मिक ध्रुवीकरण से जूझते हमारे देश को एक सिफ़र् 'ऑनलाइन झटके' से नहीं बदला जा सकता। एक टिकाऊ संगठन और सकारात्मक राजनीतिक विजन की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। गुस्से को एकताबद्ध होना पड़ेगा। फॉलोवर को ऑर्गेनाइजर बनना होगा। इन्हें रीयलिस्टिक रहते हुए असंभव की मांग करनी होगी! क्या गुस्से का तूफ़ान भागीदारी और ज़िम्मेदारी के अहसास में बदला जा सकता है? क्या इन 'कॉकरोचों' में नई और ज़िम्मेदार नागरिकता का निर्माण किया जा सकता है? हमें स्कूल बनाने वाले, पेड़ लगाने वाले, नदियां बचाने वाले, पशुओं को बचाने वाले, बीमार को दवा दिलाने वाले, भूखे को रोटी देने वाले, कूड़ा न फैलाने वाले, सड़कों पर हॉर्न न बजाने वाले, लाइन न तोड़ने वाले, गरीब बच्चों को किताबें देने वाले, अपने आसपास कमजोर, गरीब लोगों के लिए मदद के प्लेटफार्म बनाने वाले लोग चाहिए- न कि चिढ़े हुए नकारात्मक लोग- उसके लिए भारत में ट्विटर (ङ्ग) काफ़ी है। असल में हमें एक नई व्यवस्था चाहिए- जहां ईमानदारी अभिशाप न हो और एक नागरिक की गरिमा के सामने प्रधानमंत्री का प्रोटोकॉल छोटा पड़ जाए।

'कॉकरोचों' को ख़ारिज करने की बजाय, डरने की बजाय, उनका चरित्र प्रमाण पत्र बनाने की बजाय, इसकी सफलता को देखने की बजाय उस संभावना को देखिए, जिससे यह पैदा हुआ है। इस संभावना का स्वागत करिए, ज़मीन पर उसे मज़बूत करिए। इतनी नुक़्ताचीनी करने की जगह, तपती धूप में राह चलते 'कॉकरोचों' को दो घूंट ठंडा पानी तो पिलाइये महाराज! ये कॉकरोच कह रहा है-

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूं मैं।

तू मेरा शौक देख, मिरा इंतिज़ार देख।।

(लेखक जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं और कांग्रेस से जुड़े हैं।)


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