क्यों कमजोर हो रहा है खेत और बैल का रिश्ता?
रासायनिक खेती से सबसे बड़ा नुकसान पारंपरिक पशुपालन का हुआ है।

रासायनिक खेती से सबसे बड़ा नुकसान पारंपरिक पशुपालन का हुआ है। पशुओं की संख्या घटी है। इससे आदिवासी, दलित और पिछड़े समुदाय के गरीब लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। पहले देशी गाय, भैंस, बकरी, भेड़, गधे, घोड़े आदि से इनकी आजीविका चलती थी। लेकिन अब इनकी संख्या बहुत कम हो गई है या नहीं के बराबर है।
बारिश का मौसम आने के बाद खेती-बाड़ी का काम शुरू हो गया है। खेतों में अब बैलों की जगह ट्रेक्टर जुताई करते दिख रहे हैं। इससे खेती और पशुओं का रिश्ता कमजोर दिखाई दे रहा है। आज इस पर बात करना चाहूंगा, जिससे हम खेती, बैल और गांव को समग्रता में समझ सकें।
अगर मैं बचपन को याद करूं तो पशुपालन बहुत ही महत्वपूर्ण था। हमारे गांव में लोग परिवार के सदस्य की तरह पशुओं को यानी गाय-बैल को रखते थे। छत्तीसगढ़ में भी पशुओं से प्रेम की परंपरा रही है। खेती बिना बैल का बहुत ही अच्छा रिश्ता था। खेती से मनुष्य को अनाज मिलता था, और बैलों को चारा उपलब्ध हो जाता था। पशुओं के गोबर-गोमूत्र से उपजाऊ गोबर खाद मिलती थी, जिससे मिट्टी उर्वर बनती थी।
रासायनिक खेती से सबसे बड़ा नुकसान पारंपरिक पशुपालन का हुआ है। पशुओं की संख्या घटी है। इससे आदिवासी, दलित और पिछड़े समुदाय के गरीब लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। पहले देशी गाय, भैंस, बकरी, भेड़, गधे, घोड़े आदि से इनकी आजीविका चलती थी।
लेकिन अब इनकी संख्या बहुत कम हो गई है या नहीं के बराबर है। अब जो डेयरी उद्योग के रूप में पशुपालन हो रहा है, वह बहुत महंगा और पूंजी प्रधान है। पशुधन कम होने का एक कारण मवेशियों के लिए चारे और भूसे की कमी है। गांव में पहले चरोखर की जमीन, नदी-नालों व गांव के आसपास की जमीन पर पशु चरा करते थे। अब यह जमीनें कई कारणों से उपलब्ध नहीं हैं।
इसी प्रकार, हार्वेस्टर से कटाई होने के कारण भूसा या फसलों के डंठल जला दिए जाते हैं, इस कारण भूसा भी नहीं मिल पाता। अब यह समस्या है कि अब मवेशियों को क्या चराएं? खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं। खेती में उस समय बड़ा मोड़ आया जब खेतों की जुताई बैलों से होने लगी। यह रिश्ता सैकड़ों सालों से चला आ रहा है। किसान के घरो में गायें होती थीं। उनके बछड़े बड़े होने पर खेतों की जुताई करने के काम आते थे।
अनुकूल मिट्टी, हवा, पानी, बीज, पशु ऊर्जा और मानव ऊर्जा से ही खेतों में अनाज पैदा हो जाता था। अब तक वास्तविक उत्पादन सिर्फ खेती में ही होता है। एक दाना बोओ तो कई दाने पैदा होते हैं और उसी से हमारे भोजन की जरूरत पूरी होती है। परंपरागत खेती में बैलों से जुताई, मोट और रहट से सिंचाई और बैलगाड़ी के जरिये फसलों व अनाज की ढुलाई की जाती थी। खेत से खलिहान तक, खलिहान से घर तक और घर से बाजार तक किसान बैलगाड़ियों से अनाज ढोते थे। गांव में बढ़ई का काम कृषि यंत्र बनाना होता था। वह बैलगाड़ी के चक्के, बक्खर और हल बनाता था। जिसके बदले उसे किसानों से अनाज मिलता था।
परंपरागत खेती में अलग से बाहरी निवेश की जरूरत नहीं थी। न फसलों में खाद डालने की जरूरत थी और न ही कीटनाशक या निंदानाशक। पशुओं की देखभाल में अतिरिक्त खर्च नहीं होता था। फसलों के डंठल से तैयार भूसा, पुआल व मेढ़ पर होने वाले चारे से उनका पेट भर जाता था। खेतों में होने वाली फसलों से जो डंठल,पुआल और खरपतवार होती थी, वह मवेशियों को खिलाने के काम आती थी। बथुआ जैसी हरी भाजी को तो मवेशियों को खिलाया जाता था, उसे मनुष्य भी खाते थे, अब निंदानाशक डालने से खत्म हो गई है।
दूसरी तरफ खेत में डंठल व पुआल आदि सड़कर जैव खाद बनाते थे और पशुओं के गोबर से बहुत अच्छी खाद मिल जाती थी। गोबर खाद से खेतों में मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती जाती थी। फसलों के मित्र कीट ही कीटनाशक का काम करते थे।
गाय-बैल को खिलाने के लिए पहले खेतों में कई तरह का चारा उपलब्ध था। लेकिन अब निंदानाशक या खरपतवार नाशक दवाईयों के छिड़काव के कारण ये चारे उपलब्ध नहीं हैं या कम हो गए हैं। इस कारण पशुपालन कम होता जा रहा है। लेकिन ऊर्जा संकट, बिजली संकट और मानव श्रम की बहुलता के मद्देनजर हमें टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना पड़ेगा और इसमें पशु ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था केवल खेती-किसानी से ही नहीं, पशुपालन और छोटे-छोटे लघु-कुटीर उद्योग व लघु व्यवसायों से संचालित होती रही है। मवेशी एक तरह से लोगों के फिक्स्ड डिपॉजिट हुआ करते थे, जिन्हें बहुत जरूरत पड़ने पर वे बेच देते थे।
लेकिन आम तौर पर गाय-बैल और मनुष्य के आपसी स्नेह और प्यार की कई कहानियां अब भी प्रचलन में हैं। उनके प्रति गहरी संवेदनशीलता भी देखने में आती थी। उन्हें बड़े लाड़-प्यार से पाला-पोसा जाता। बैलों के प्रति विशेष प्रेम तब दिखाई देता है जब उन्हें दीपावली के समय रंग-बिरंगी फीते, गेंठा, मुछेड़ी, नाथ और पट्टों से सजाया जाता है। पोला में भी बैलों की पूजा की जाती है। अक्ती त्योहार भी खेती से जुड़ा है।
कुछ समय पहले तक गाय-बैल को नहलाने-धुलाने से लेकर चराने-पिलाने का हर काम जिम्मेदारी से किया जाता था। खासकर महिलाएं और बच्चे मवेशियों की देखभाल में मदद करते थे। महिलाएं मवेशियों को बांधने के कोठा या सार की साफ-सफाई, भूसा-चारा डालना आदि का काम करती थीं। जबकि बच्चे उन्हें घास या भूसा डालने से लेकर पानी पिलाने का काम करते थे। अब भी असिंचित, जंगलपट्टी व मिश्रित खेती वाले क्षेत्रों में पशुपालन होता है। वहां आज भी बैलों से जुताई की जाती है। अब पशुओं की देखभाल नहीं की जा रही है, उन्हें छोड़ दिया गया है।
खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं। इसका उदाहरण राजस्थान से आने वाले घुमंतू पशुपालकों की भेड़-बकरियों, ऊंटों को किसान अपने खेतों में चरने की इजाजत देते हैं जिससे खेत उर्वर बने और उनका पेट भी भरे। यही घुमंतू पशुपालक पशुओं की अच्छी नस्ल उपलब्ध कराने में विशेष भूमिका निभाते थे।
पहले गांव में सभी घरों के मवेशियों को चराने के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया जाता था। एक साथ जो पशु चरने जाते थे उसे नार कहते थे। बदले में उस व्यक्ति को हर घर से अनाज मिलता था, जो मवेशी चराता था। हल-बैल की जगह ट्रैक्टर की जुताई से मिट्टी भी सख्त (भट्टल) हो रही है। इससे उत्पादन भी प्रभावित होता है।
कुल मिलाकर, खेती और पशुपालन का रिश्ता आज टूट रहा है। लेकिन अगर इसको बरकरार रखा जाए तो न केवल हमें भूमि को उर्वर बनाने के लिए गोबर खाद मिलेगी। बल्कि बड़ी आबादी को रोजगार भी मिलेगा। पशु शक्ति के बारे में कई विशेषज्ञ व वैज्ञानिक भी यह मानने लगे हैं कि यह सबसे सस्ता व व्यावहारिक स्रोत है।
मशीनीकरण से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ेगी, जो आज दुनिया में सबसे अधिक चिंता का विषय है। मशीनों से खेती करने से इसमें बढ़ोतरी होती है। आज के वैश्विक ऊर्जा संकट में यह और भी प्रासंगिक हो जाती है। हमें आत्मनिर्भर खेती की ओर बढ़ना चाहिए,जो पशु और मानव ऊर्जा से ही संभव दिखाई देती है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


