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गांधी के संदेश की जरूरत क्यों है

कल गांधी जयंती थी। इस मौके पर देश भर में कार्यक्रम होते हैं, और हम सब गांधी जी को याद करते हैं

गांधी के संदेश की जरूरत क्यों है
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गांधी जी ने अंग्रेजों से लड़ाई और संघर्ष के साथ-साथ समाज सुधार के कई कार्यक्रम चलाए। एक तरफ उन्होंने समाज को जोड़ने और समाज को बेहतर बनाने के लिए कार्यक्रम चलाए। जैसे शराबबंदी, चरखा और खादी, साफ-सफाई की मुहिम, छुआछूत मिटाना, प्राकृतिक खेती, चिकित्सा और शिक्षा को काम से जोड़ने वाली नई तालीम इत्यादि। दूसरी तरफ अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चलाया। गांधी जी ने स्वावलंबी और आत्मनिर्भर गांवों का सपना देखा था।

कल गांधी जयंती थी। इस मौके पर देश भर में कार्यक्रम होते हैं, और हम सब गांधी जी को याद करते हैं। गांधी ऐसे नेता थे, जिन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा और शांति का नया रास्ता बताया। न केवल बताया और सिखाया बल्कि अपने जीवन में उसे अपनाया। उनका प्रसिद्ध कथन है- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। उन्होंने सार्वजनिक कामों के साथ दैनंदिन जीवन में कई छोटी-छोटी चीजें की, जो उन्हें इंसानियत के स्तर पर ऊंचा बनाती हैं। आज के स्तंभ में गांधी के जीवन और विचारों पर बात करना चाहूंगा, जिससे गांधी के बारे में समझा जा सके।

गांधी जी के बारे में हम बचपन से सुनते- पढ़ते आ रहे हैं। उन्होंने हमारे देश में आजादी की लड़ाई की अगुआई की थी। देश को अंग्रेजों से निजात दिलाई थी। लेकिन इसके साथ ही वे देश-दुनिया में ऐसे नेता थे, जिन्होंने विविध विषयों पर सोच-विचार किया और निरंतर उनके खुद के विचारों में बदलाव किया। उनकी आत्मकथा सत्य के प्रयोग इसकी मिसाल है।

गांधी जी ने अंग्रेजों से लड़ाई और संघर्ष के साथ-साथ समाज सुधार के कई कार्यक्रम चलाए। एक तरफ उन्होंने समाज को जोड़ने और समाज को बेहतर बनाने के लिए कार्यक्रम चलाए। जैसे शराबबंदी, चरखा और खादी, साफ-सफाई की मुहिम, छुआछूत मिटाना, प्राकृतिक खेती, चिकित्सा और शिक्षा को काम से जोड़ने वाली नई तालीम इत्यादि। दूसरी तरफ अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चलाया।

गांधी जी ने स्वावलंबी और आत्मनिर्भर गांवों का सपना देखा था। वे सदैव ही लघु कुटीर, खादी और चरखा जैसे कार्यक्रमों पर जोर देते थे। गांधी जी ने भोग व विलासिता को बढ़ाने वाली अंग्रेजी सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहा था। हिन्द स्वराज्य नामक छोटी पुस्तिका में उन्होंने इस पर विस्तार से लिखा है।

आज गांधी के विचारों की और भी प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है। देश-दुनिया हिंसा-प्रतिहिंसा के दौर में फंसी हुई है। छोटे बड़े कई युद्ध व गृहयुद्ध हो रहे हैं। बड़े युद्धों में व्यापक जान-मान की व्यापक तबाही हुई है। बच्चों व महिलाओं को सबसे ज्यादा कष्ट व कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। जो दृश्य सामने आते हैं, वो दिल दहला देने वाले हैं।

हालांकि गांधी के समय जलवायु बदलाव जैसे मुद्दे बड़े पैमाने पर उभरकर नहीं आए थे, लेकिन गांधी जी ने सदैव ही प्रकृति के साथ सामंजस्य बढ़ाने वाली सोच को ही आगे रखा था। शिक्षा के बारे में उनकी सोच काम के साथ शिक्षा से जुड़ी थी, उन्होंने नई तालीम की पूरी सोच इसी आधार पर बनाई थी। वे चाहते थे कि बच्चे सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि शारीरिक श्रम द्वारा उत्पादन के आधार पर शिक्षा ग्रहण करें। इस तरह के प्रयोग उनकी कर्मस्थली सेवाग्राम में आज भी चल रहे हैं।

शारीरिक श्रम के बारे में उनका मानना था बौद्धिक व शारीरिक काम का मूल्य एक जैसा होना चाहिए। महान लेखक रस्किन की किताब अनटू दिस लास्ट से वे बहुत प्रभावित थे। इसे उन्होंने एक ट्रेन यात्रा में पढ़ा था, और फिर उस पर अमल किया। इसमें शारीरिक श्रम को काफी महत्व दिया था। वे मानते थे कि वकील और बाल काटने वाले दोनों का मूल्य समान ही है। मजदूर, किसान और कारीगर का जीवन ही सच्चा है। यानी शारीरिक श्रम बहुत ही जरूरी है। इस किताब का गांधी जी ने अनुवाद भी किया, जो सर्वोदय नाम से उपलब्ध है।

सादगी और स्वावलंबन उन्हें बहुत पसंद थे। वे अपने कपड़े खुद धोते थे। वे अपनी रोजाना की चीजें व्यवस्थित रखते थे। घर को सुघड़ता से रखने के पक्षधर थे। साफ-सफाई को बहुत ही तरजीह देते थे। वे मानते थे अगर कोई चीज़ सही जगह पर नहीं रखी गई है, तो वह कचरा है। वे बहुत मितव्ययी थी, वे एक-एक पैसे का हिसाब रखते थे। शाम को रोज अपने का खर्चे का ब्यौरा लिखते थे।

उन्होंने स्वस्थ रहने के लिए कई प्रयोग किए, इसके बारे में किताबों में पढ़ते थे, फिर इसके प्रयोग करते थे। पानी और मिट्टी के साथ उनके प्रयोग बहुत ही चर्चित हैं। भोजन और खान-पान को लेकर भी वे बहुत ही संजीदा था। क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए, उसके बारे में उनके नियम थे। खान-पान पर उनके प्रयोग भी लिखित हैं। समय-समय पर उपवास भी करते थे। वे न केवल अनशन करते थे, बल्कि विचारों में शुद्धता के लिए और किसी गलती का पश्चाताप के लिए भी उपवास करते थे।

गांधी जी के जीवन और काम पर देश-दुनिया में काफी किताबें लिखी गई हैं। उन पर लिखकर बातों को दोहराना उचित नहीं होगा। लेकिन उन पर अनु बंद्योपाध्याय की लिखी किताब मेरी प्रिय किताबों में से एक है। इसमें गांधी ने जो भी काम किए हैं, उनकी एक झलक मिलती है। कई लोग सोचते हैं कि गांधी जी बहुत ही अनोखे व अलौकिक व्यक्ति थे, जिन्होंने बड़े-बड़े काम किए, लेकिन इस किताब को पढ़कर यह भ्रम टूट जाता है। इसमें सार्वजनिक जीवन से अलग वे न जाने कितनी ही चीजों में रूचि लेते थे और पूरी तरह उसमें डूब जाते थे। वे मामूली और छोटी चीजें समझी जाने वाले कार्य को बहुत ही लगन व कुशलता से करते थे। और यही बात उन्हें इंसानियत के ऊंचे स्तर पर पहुंचाने के लिए काफी है।

यह किताब बताती है कि वे साधारण व्यक्ति थे, लेकिन उन्होंने बहुत ही असाधारण काम किए, जिन्होंने सत्य और अहिंसा के राह पर चलकर ऐसी राह दिखाई, जिससे देश-दुनिया के कई लोगों को प्रभावित किया और उन्होंने इस पर अमल भी किया। आज भी कई लोग, समूह, और संस्थाएं उनके बताए रास्ते पर चल रही हैं।

इसमें बैरिस्टर, दर्जी, बाल काटने वाला, कपड़े धोने वाला, सफाईकर्मी, जूता सिलने और बनाने वाला, नौकर, रसोइया, स्वास्थ्यकर्मी, देखभालकर्ता, शिक्षक, बुनकर, कतैया, हिसाब रखने वाला, किसान और लेखक, पत्रकार जैसे काम किए हैं।

कई लोग पूछते हैं कि वे आज होते तो क्या करते। इस बारे में कहना कठिन है, पर उनके विचार व जीवन ही उनकी विरासत है। इसमें एक ऐसे भारत और दुनिया की सोच है, जो आत्मनिर्भर हो, स्वावलंबी, न्यायप्रिय और अग्रसर हो। आज की हिंसा-प्रतिहिंसा के दौर में शांति का संदेश बहुत ही उपयोगी है।

मुझे लगता है कि अगर हम गांधी जी के विचारों में किसी एक या कुछ ऐसी बातें जो हमें पसंद हैं, उनको जीवन में अपना लें तो हम जीवन में एक कदम आगे बढ़ेंगे। इसी संदर्भ में गांधी जी का एक और प्रसिद्ध कथन याद आता है कि मेरे लिए एक कदम ही काफी है।


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