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क्यों सूख रही हैं नदियां

क्यों सूख रही हैं नदियां
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— बाबा मायाराम

नर्मदा उसकी कई सहायक नदियों के सूखने के कारण वह बहुत कमजोर हो गई है। लेकिन हम इस सबसे नहीं चेत रहे हैं और पानी का बेहिसाब इस्तेमाल से पानी के स्रोतों को ही खत्म कर रहे हैं, जो शायद फिर पुनर्जीवित न हो सकें। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है। अगर हम इन पर छोटे-छोटे स्टापडेम बनाकर जल संग्रह करें तो नदियां भी बचेंगी और खेती में भी सुधार संभव है।

गर्मी शुरू होते ही पानी की किल्लत शुरू हो जाती है। भोजन, पानी और हवा हमारी बुनियादी जरूरतें हैं। इनके बिना जीवन असंभव है। पानी के मामले में हमारी स्थिति बहुत ही अच्छी थी। हमारे अपने जीवन में ही कुएं, तालाब, बावड़ी और नदियां थीं, जो सैकड़ों सालों से सदानीरा थीं। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि सब के सब सूखते चले रहे हैं। आज इसी मुद्दे पर बात करना चाहूंगा, जिससे पानी जैसे जरूरी संसाधन के बारे में समझें और इसे बचाने के लिए काम करें।

आमतौर जब कभी नदियों पर बात होती है तो ज्यादातर वह बड़ी नदियों पर केंद्रित होती है। लेकिन इन सदानीरा नदियों का पेट भरने वाली छोटी नदियों पर हमारा ध्यान नहीं जाता, जो आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रही हैं। अगर हम नजर डालें तो पाएंगे कि कई छोटी-बड़ी नदियां या तो सूख चुकी हैं या फिर बरसाती नाले बनकर रह गई हैं। गांव-समाज के बीच से तालाब, कुएं और बावड़ी जैसे परंपरागत पानी के स्रोत तो पहले से ही खत्म हो गए हैं। अब इन छोटी नदियों पर आए संकट से बड़ी नदियां तो प्रभावित हो ही रही हैं। जनजीवन के साथ पशु, पक्षी और वन्य- जीवों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

देश-दुनिया में नदियों के किनारे ही सभ्यताएं पल्लवित-पुष्पित हुई है। जहां जल है, वहां जीवन है। लेकिन आज नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। नदियों का प्रवाह अवरूद्ध हो रहा है। वर्षों पुरानी नदी संस्कृति खत्म रही है। उनमें पानी नहीं हैं,पानी को स्पंज की तरह सोखकर रखने वाली रेत नहीं है। मध्यप्रदेश के सतपुड़ा अंचल की बारहमासी सदानीरा नदियां या तो सूख गई है या बारिश में ही उनकी जलधारा प्रवाहित होती हैं, फिर टूट जाती है। उनके किनारे लगे हरे-भरे पेड़ और उन पर रहने वाले पक्षी भी अब नजर नहीं आते। यानी पानी बिना सब सून।

मध्यप्रदेश में सतपुड़ा पहाड़ और जंगल कई छोटे-बड़े नदी-नालों का उद्गम स्थल है। पहाड़ और जंगलों में पेड़ पानी को जड़ों में संचित करके रखते हैं और धीरे-धीरे वह पानी रिसकर नदियों में जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होता है। जंगल कम हो रहे हैं। कुछ वर्षों से बारिश कम हो रही है या बार-बार सूखा पड़ रहा है।

सतपुड़ा की दुधी, मछवासा, आंजन, ओल, पलकमती और कोरनी जैसी नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। देनवा में अभी पानी नजर आता है लेकिन उसमें भी साल दर साल पानी कम होता जा रहा है। तवा और देनवा में भी पानी कम है। अमरकंटक से निकलकर इस इलाके से गुजरने वाली सबसे बड़ी नर्मदा भी इसी इलाके से गुजरती है। इनमें से ज्यादातर नदियां नर्मदा में मिलती हैं। इनके सूखने से नर्मदा भी प्रभावित हो रही है।

अगर हम मध्यप्रदेश के पूर्वी छोर पर नर्मदापुरम और नरसिंहपुर जिले विभक्त करने वाली दुधी नदी की बात करें, तो नदियों के संकट को समझा जा सकता है। यह नदी कुछ वर्ष पहले तक एक बारहमासी सदानीरा नदी थी। दुधी यानी दूध के समान। दुधी नदी के नाम से एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। हनुमान और उनकी माता अंजनी से जुड़ी हुई है। इसका पानी साफ और स्वच्छ। छिंदवाड़ा जिले में महादेव की पहाड़ियों से पतालकोट से दुधी निकलती है और सांडिया से ऊपर सिरसिरी व खैरा नामक स्थान में नर्मदा में आकर मिलती है। यह नर्मदा की सहायक नदी है। पर आज दुधी में एक बूंद भी पानी नहीं ढूंढने से नहीं मिलता। बारिश के दिनों में ही पानी रहता है और अप्रैल-मई माह तक आते-आते पानी की धार टूट जाती है और रेत ही रेत नजर आती है। इन पंक्तियों के लेखक का गांव भी इसी नदी के किनारे है।

जहां कभी पानी होने के कारण नदी में जनजीवन की चहल-पहल होती थी, पशु-पक्षी पानी पीते थे। बरौआ- कहार समुदाय के लोग इसकी रेत में डंगरवारी तरबूज-खरबूज की खेती करते थे। धोबी कपड़े धोते थे, मछुआरे मछली पकड़ते थे, केंवट समुदाय के लोग जूट के रेशों से रस्सी बनाते थे। वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है। नदी संस्कृति खत्म हो गई है। अब लोग नदी के स्थान पर हैंडपंप और ट्यूबवेल पर आश्रित हो गए हैं, जिनकी अपनी सीमाएं हैं।

इसी जिले के पिपरिया कस्बे से गुजरने वाली मछवासा नदी भी सूख चुकी है। सोहागपुर की पलकमती कचरे से पट गई है। इन नदियों में जो पानी दिखता है, वह नदियों का नहीं, शहरों की गंदी नालियों का है। पलकमती से ही पूरे सोहागपुर का निस्तार होता था। सोहागपुर का रंगाई उद्योग और पानी की खेती दूर-दूर तक मशहूर थे। इस नदी के किनारे पान की खेती भी होती थी, अब भी कुछ शेष है। रेल से सफर करते हुए यह पान के बरेजे दिखाई देते हैं।

सोहागपुर के दिवंगत शिक्षक ने मुझे बताया था कि पलकमती कभी नदी थी, जो अब नाला दिखाई देती है। यह गहरी थी और इसमें बाढ़ आती थी। मातापुरा का जो क्षेत्र है, वहां से अंग्रेज लोगों का कपड़ा रंगा कर जाता था। बाम्बे, केलकटा सारे बड़े शहरों से रंगाई के काम आते थे। पहले नदी का सहारा था। अब नदी के किनारे हैं तो किस काम के? नदी से न तो पानी मिल रहा है न मिट्टी। रंगाई उद्योग खत्म हो गया है। पान के बरेजे सिमट गए हैं। यहां का बंगला पान फेमस था। यहां की सुराही और मिट्टी के बर्तन का ठेका रेलवे का था। रेलवे स्टेशन पर सुराहियों के ढेर लगे रहते थे।

नदियों में पानी कम होने का गहरा असर उन समुदायों पर हो रहा है जिनकी आजीविका सीधे तौर पर नदियों से जुड़ी है। मछली पकड़ने वाले और डंगरवारी (तरबूज-खरबूज की खेती) करने वाले कहार- केंवट समुदाय पूरी तरह इसी पर आश्रित थे। कहार समुदाय के लोग बताते हैं कि नदियों में पानी नहीं रहने से उनकी डंगरवारी की खेती खत्म हो गई है। उनके पास कोई रोजगार नहीं है। यही वे समुदाय हैं, जिन्हें नदियों की प्रकृति व उसकी पारिस्थितिकीय के बारे में अच्छी समझ है।

हालांकि नर्मदा उसकी कई सहायक नदियों के सूखने के कारण वह बहुत कमजोर हो गई है। लेकिन हम इस सबसे नहीं चेत रहे हैं और पानी का बेहिसाब इस्तेमाल से पानी के स्रोतों को ही खत्म कर रहे हैं, जो शायद फिर पुनर्जीवित न हो सकें। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है। अगर हम इन पर छोटे-छोटे स्टापडेम बनाकर जल संग्रह करें तो नदियां भी बचेंगी और खेती में भी सुधार संभव है। इस पूरे काम में स्थानीय मछुआरों और उनके परंपरागत ज्ञान और कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वे इससे भलीभांति परिचित हैं। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


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