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बदहाल मुल्क भी भारत से ज्यादा खुशहाल क्यों?

संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनडीपी तमाम आंकड़ों के आधार पर पहले ही बता चुकी है कि भारत टिकाऊ विकास के मामले में दुनिया के 167 देशों की सूची में 99वें स्थान पर है।

बदहाल मुल्क भी भारत से ज्यादा खुशहाल क्यों?
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अनिल जैन

विकास और बाजारवाद की वैश्विक आंधी ने कई मान्यताओं और मिथकों को तोड़ा है। कुछ समय पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन की आई एक अध्ययन रिपोर्ट में भी बताया गया था कि भारत दुनिया में सर्वाधिक अवसादग्रस्त लोगों का देश है, जहां हर तीसरा-चौथा व्यक्ति अवसाद के रोग से पीड़ित है। यह तथ्य भी इस मिथक की कलई उतारता है कि विकास ही खुशहाली का वाहक है।

वैश्विक आर्थिक मामलों के तमाम अध्ययन संस्थानों द्वारा भारत की आर्थिक स्थिति के गाए जा रहे शोक-गीतों के बीच कथित 'फलती-फूलती अर्थव्यवस्था, 'आर्थिक विकास' के तमाम सरकारी दावों की खिल्ली उड़ाने और उन्हें आईना दिखाने वाली एक और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट आ गई है। संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क और गैलप के सहयोग से ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर द्वारा तैयार 'वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2026' बता रही है कि खुशमिजाजी के मामले में भारत का मुकाम दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देशों से ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और नेपाल जैसे बदहाल समझे जाने वाले पड़ोसी देशों से भी पीछे बरकरार है।

संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनडीपी तमाम आंकड़ों के आधार पर पहले ही बता चुकी है कि भारत टिकाऊ विकास के मामले में दुनिया के 167 देशों की सूची में 99वें स्थान पर है। अमेरिका और जर्मनी की एजेंसियों ने जानकारी दी है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के 123 देशों में भारत 102वें स्थान पर है। पेंशन सिस्टम की वर्ल्ड रैंकिंग में भारत 47 देशों में 45वें नंबर पर है। पासपोर्ट रैंकिंग में 199 देशों में भारत का 75वां नंबर भी देश की अर्थव्यवस्था खोखली हो जाने की गवाही देता है और अब 'वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्सÓ में दुनिया के 147 देशों में भारत का मुकाम 116वें नंबर पर है, जो पिछले साल के 118वें नंबर से थोड़ा बेहतर है।

दुनिया भर में भारत की साख सिर्फ आर्थिक मामलों में ही नहीं गिर रही है बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक सौहार्द्र, धार्मिक सहिष्णुता, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन, अभिव्यक्ति की आजादी, मानवाधिकार और मीडिया की आजादी में भी भारत की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग साल दर साल नीचे आती जा रही है। ऐसे में खुशहाली के मामले में भारत की स्थिति में गिरावट दर्ज होना जरा भी नहीं चौंकाता।

'वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट' हर साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वे करके जारी की जाती है। इसमें अर्थशास्त्रियों की एक टीम समाज में सुशासन, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, जीवित रहने की उम्र, दीर्घ जीवन की प्रत्याशा, सामाजिक सहयोग, स्वतंत्रता, उदारता आदि पैमानों पर दुनिया के तमाम देशों के नागरिकों के इस अहसास को नापती है कि वे कितने खुश हैं। खुशहाल देशों के साथ ही सर्वाधिक नाखुश देशों की सूची भी जारी हुई है, जिसमें अफगानिस्तान शीर्ष पर है और भारत 32वें नंबर पर।

दिलचस्प बात यह है कि 13 साल पहले यानी 2013 की रिपोर्ट में भारत 111वें नंबर पर था। तब से अब तक हमारे शेयर बाजार तो लगभग लगातार बढ़त पर ही रहे हैं। फिर भी इस दौरान हमारी खुशी का स्तर नीचे खिसक आने की वजह क्या हो सकती है? दरअसल यह रिपोर्ट इस हकीकत को भी साफ़ तौर पर रेखांकित करती है कि केवल आर्थिक समृद्धि ही किसी समाज में खुशहाली नहीं ला सकती। इसीलिये आर्थिक समृद्धि के महासागर माने जाने वाले अमेरिका (23) और ब्रिटेन (29) भी दुनिया के सबसे खुशहाल 10 देशों में अपनी जगह नहीं बना पाए हैं।

अगर इस रिपोर्ट को तैयार करने के तरीकों और पैमानों पर सवाल खड़े किए जाएं, तब भी कुछ सोचने का मसाला तो इस रिपोर्ट से मिलता ही है। किसी भी देश की तरक्की को मापने का सबसे प्रचलित पैमाना जीडीपी या विकास दर है। फिर भी इसे लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। एक तो यह कि जीडीपी किसी देश की कुल अर्थव्यवस्था की गति को तो सूचित करती है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि आम लोगों तक उसका लाभ पहुंच रहा है या नहीं। दूसरे, जीडीपी का पैमाना केवल उत्पादन वृद्धि के लिहाज से ही किसी देश की तस्वीर पेश करता है।

ताजा हैप्पीनेस रिपोर्ट में फिनलैंड दुनिया का सबसे खुशहाल मुल्क है। वह लगातार नौवें साल शीर्ष पर बना हुआ है। फिनलैंड को दुनिया में सबसे स्थिर, सबसे सुरक्षित और सबसे सुशासन वाले देश का दर्जा दिया गया है। वह न्यूनतम भ्रष्ट और सामाजिक तौर पर प्रगतिशील है। उसकी पुलिस दुनिया में सबसे ज्यादा साफ़-सुथरी और भरोसेमंद है। वहां हर नागरिक को मुफ्त इलाज की सुविधा प्राप्त है, जो देश के लोगों की खुशहाली की बड़ी वजह है।

वर्ष 2026 की रिपोर्ट में सबसे खुशहाल मुल्कों में फिनलैंड के बाद क्रमश: आइसलैंड, डेनमार्क, कोस्टारिका, स्वीडन, नॉर्वे, नीदरलैंड, इज़रायल, लक्ज़मबर्ग और स्विट्ज़रलैंड है। इन सभी देशों में प्रति व्यक्ति आय काफी ज्यादा है। यानी भौतिक समृद्धि, आर्थिक सुरक्षा और व्यक्ति की प्रसन्नता का सीधा रिश्ता है। इन देशों में भ्रष्टाचार कम है और सरकार की ओर से सामाजिक सुरक्षा भी काफी है। लोगों पर आर्थिक सुरक्षा का दबाव कम है, इसलिए जीवन के फैसले करने की आजादी भी ज्यादा है। जबकि भारत की स्थिति इन सभी पैमानों पर बदतर है। यहां तक कि हम पाकिस्तान, नेपाल और फिलिस्तीन से भी बदतर स्थिति में है, जो कि हैरान करने वाली बात है।

इस हकीकत की वजह शायद यह है कि भारत में विकल्प तो बहुतायत में हैं, लेकिन उन तक सभी लोगों की पहुंच नहीं है, जिसकी वजह से लोगों में असंतोष है। इस स्थिति के बरअक्स कई देशों में जो सीमित विकल्प उपलब्ध हैं, उनके बारे में भी लोगों को ठीक से जानकारी नहीं है, इसलिए वे अपने सीमित दायरे में ही संतुष्ट और खुश हैं। फिर भारत में तो जितनी आर्थिक असमानता है, वह भी लोगों में असंतोष या मायूसी पैदा करती है।

यह बात जरूर गौरतलब है कि कई बड़े देशों की तरह हमारे देश के नीति-नियामक भी आज तक इस हकीकत को गले नहीं उतार पाए हैं कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) या विकास दर बढ़ा लेने भर से हम एक खुशहाल समाज नहीं बन जाएंगे।

किसी देश की समृद्धि तभी मायने रखती है, जब वह नागरिकों के स्तर पर हो। भारत और चीन की सरकारों का जोर अपने आम लोगों की खुशहाली के बजाय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने पर रहता है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि लंबे समय से जीडीपी के लिहाज से दुनिया में दूसरे और तीसरे नंबर पर रहने के बावजूद चीन और जर्मनी 'वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट' में अभी भी क्रमश: 65वें और 21वें स्थान पर हैं।

भारतीय आर्थिक दर्शन और जीवन पद्धति के सर्वथा प्रतिकूल 'पूंजी ही जीवन का अभीष्ट है' के अमूर्त दर्शन पर आधारित नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों और वैश्वीकरण से प्रेरित बाजारवाद के आगमन के बाद समाज में बचपन से अच्छे नंबर लाने, कैरिअर बनाने, पैसे कमाने और सुविधाओं के संसाधन जुटाने की एक होड़ शुरू हो गई है। इसमें जो पिछड़ता है वह निराशा और अवसाद का शिकार हो जाता है, लेकिन जो सफल होता है वह भी अपनी मानसिक शांति गंवा बैठता है। एकल और डिज़ाइनर परिवारों के चलन ने लोगों को बड़े-बुजुर्गों के सान्निध्य की उस शीतल छाया से भी वंचित कर दिया है जो अपने अनुभव की रोशनी से यह बता सकती थी कि जिंदगी का मतलब सिर्फ 'सफलÓ होना नहीं, बल्कि समभाव से उसे जीना है। जाहिर है कि इसी का दुष्प्रभाव बढ़ती आत्महत्याओं, नशाखोरी, घरेलू कलह, रोडरेज और अन्य आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी के रूप में दिख रहा है।

विकास और बाजारवाद की वैश्विक आंधी ने कई मान्यताओं और मिथकों को तोड़ा है। कुछ समय पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन की आई एक अध्ययन रिपोर्ट में भी बताया गया था कि भारत दुनिया में सर्वाधिक अवसादग्रस्त लोगों का देश है, जहां हर तीसरा-चौथा व्यक्ति अवसाद के रोग से पीड़ित है। यह तथ्य भी इस मिथक की कलई उतारता है कि विकास ही खुशहाली का वाहक है। अध्ययन में दुख, निराशा, अरुचि, अनिद्रा आदि अवसाद के जो मानक बनाए गए थे, उनके आधार पर हमारे देश को स्वाभाविक रूप से सर्वाधिक अवसादग्रस्त कहा जा सकता है। क्योंकि हमारे यहां व्यवस्था के जितने भी प्रमुख अंग हैं, चाहे वह राजनीतिक नेतृत्व हो, कार्यपालिका हो, न्यायपालिका हो, पुलिस हो- सभी से आम आदमी को निराशा-हताशा ही हाथ लगी है।

देश के प्राकृतिक संसाधनों पर मु_ी भर लोगों के कब्जे के चलते भी देश में आर्थिक और सामाजिक विषमता को बढ़ावा मिला है। लोकविमुख विकास की सरकारी नीतियों के चलते देश भर में व्यापक पैमाने पर लोगों का विस्थापन हुआ है। उनका यह विस्थापन महज अपने घर-जमीन से ही नहीं, बल्कि अपनी सामाजिकता और संस्कृति से भी हुआ है, जिसने उनमें दुख और नैराश्य भर दिया है।

कुल मिलाकर 'वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट' में भारत की हर वर्ष गिरती स्थिति और विश्व स्वास्थ्य संगठन का भारत को सर्वाधिक अवसादग्रस्त देश बताने वाला सर्वे इसी हकीकत की ओर इशारा करता है कि विपन्नता और बदहाली के महासागर में समृद्धि के चंद टापू खड़े हो जाने से पूरा महासागर समृद्ध नहीं हो सकता है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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