क्यों सफल नहीं हो रही है 'जेन •ाी' को खुश करने की कोशिश
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंस्टाग्राम का सहारा लिया है और जो बात को बिना लाग-लपेट के सीधे कहने के लिए जानी जाती है, उस 'जेन •ाीÓ पीढ़ी तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

- जगदीश रत्तनानी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंस्टाग्राम का सहारा लिया है और जो बात को बिना लाग-लपेट के सीधे कहने के लिए जानी जाती है, उस 'जेन •ाीÓ पीढ़ी तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी इस पीढ़ी से बातचीत शुरू करके बदलते समय के साथ कदम मिलाया है। ऐसा लगता है कि पूरा सिस्टम उन आवाज़ों को सुनना चाहता है जिन्होंने महज़ 12 दिनों में ही उस प्रचार अभियान को ध्वस्त कर दिया जिसे 12 सालों तक बहुत सावधानी से तैयार किया गया था, बड़े पैमाने पर योजना बनायी गयी थी और जिस पर भारी-भरकम खर्च किया गया था ताकि मौजूदा पार्टी लीडरशिप की एक खास छवि बनाई जा सके। यह एक तरह का 'बुलडोज़र असरÓ था जिसने डिजिटल दुनिया में भारतीय जनता पार्टी की 'तोड़-फोड़ वाली राजनीतिÓ को उसी की कड़वी दवा पिला दी।
सवाल यह है कि आप उन लोगों के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे जो कल की विनम्र बातचीत और शालीन आलोचना को छोड़कर पूरी ईमानदारी और बेबाकी से बात करना पसंद करते हैं? भारत के ऊंच-नीच वाले सामाजिक ढांचे में ऐसी बेबाकी या तो समझ नहीं आती या फिर लोग इससे अनजान होते हैं। पुराने ज़माने के तरीके (और कुछ पुरानी मैनेजमेंट ट्रेनिंग) में एक सुरक्षित बात कही जाती थी कि, 'असहमत होना ठीक है लेकिन उसे शालीन तरीके से जाहिर करना चाहिए।Ó भारत में यह माना जाता है कि सत्ता में बैठे लोग जानकार और जिम्मेदार होते हैं। हमें प्रधानमंत्री का 'सम्मानÓ करने के लिए कहा जाता है और 'जेन •ाीÓ पूछना चाहती है: 'क्यों?Ó अगर असहमति के इतने सारे कारण हैं तो क्यों न दिखावटी शिष्टाचार को छोड़कर सीधे और कड़े तरीके से असहमति जताई जाए?
उस रास्ते पर निडरता से आगे बढ़ते हुए, जंतर-मंतर पर इतिहास रचने वाले प्रदर्शनकारियों ने एक अयोग्य मंत्री को हटवाने में कामयाबी हासिल की और बीजेपी-आरएसएस को कुछ अहम सबक सिखाए हैं। उन्होंने कई पुरानी धारणाओं को भी गलत साबित किया है, जैसे कि बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों और शानदार कैंपेन से कुछ समय के लिए तो छवि बन सकती है लेकिन समय के साथ वही छवि बुरी तरह टूट भी सकती है। अगर बहुत ज़्यादा •ाोर-•ाबरदस्ती से प्रचार किया जाए और उससे लोगों में शक या उससे भी बुरा कुछ पैदा हो तो उस प्रचार का बुरा अंजाम हो सकता है। सोशल मीडिया पर लाइक्स या फॉलोअर्स की संख्या का जश्न मनाने का दौर 'इन्फ्लुएंसर्सÓ के जमाने का था। अब 'एंटी-इन्फ्लुएंसर्सÓ का दौर है जो आपकी गलतियों को सबके सामने लाने के लिए तैयार रहते हैं। इसके अलावा सिफ़र् आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि किसी राजनीतिक संदेश को लोगों ने कितना अपनाया है। जब डिजिटल दुनिया शोर-शराबे वाले प्रोपेगैंडा से भरी हो, जिसमें संगठित, खरीदे गए और •ाबरदस्ती पहुंचाए गए व्यू•ा का मिला-जुला असर होता है तो जरूरी नहीं है कि ज़्यादा व्यू काउंट समर्थन में बदल जाएं। आईटी सेल या तो दर्शनीयता को ही असली समर्थन मान लेते हैं या फिर उन्हें इस आसान पैमाने को बढ़ावा देने में दिलचस्पी होती है। इससे वे उस बढ़ते हुए दर्शकों के वर्ग को छिपा देते हैं जो तारीफ़ के लिए नहीं बल्कि गहरे शक और कभी-कभी पूरी तरह नफ़रत के साथ उन्हें देखते हैं।
इस दुनिया में कंटेंट की ईमानदारी मायने रखती है, न कि दिखावटी रूप-रंग। यह बातचीत के उस पुराने और सहज अंदा•ा को वापस लाता है जिसे अब भरोसे और पक्के यकीन की पहचान माना जाने लगा है। असल में यह तरीका कोई नया नहीं है बल्कि यह जीने का एक ऐसा अंदाज था जो दिखावे, झूठी बातों और कंट्रोल किए जाने वाले टीवी व पैसे कमाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर दिखाए जाने वाले बनावटी गुस्से के दौर में कहीं खो गया था। 'जेन •ाीÓ ने उस पुराने अंदा•ा को फिर से अपनाया है और सिर्फ इसी बात के लिए उनकी तारीफ़ होनी चाहिए। सिस्टम ने एक तरफ़ बहुत ज़्यादा •ाोर डाला था और अब स्प्रिंग की तरह वह वापस अपनी जगह पर आ रहा है।
यह स्थिति ऐसे नेताओं के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है जिनकी सोच सत्ता, मर्दानगी और दिखावटीपन पर टिकी है। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें आज की नई पीढ़ी न तो महसूस करती है और न ही पसंद। जो पीढ़ी विविधता का जश्न मनाती है, जिसे क्लाइमेट चेंज की चिंता हो सकती है एवं जो बड़े कॉर्पोरेट घरानों पर भरोसा नहीं करती, वह स्वाभाविक रूप से 'बुलडो•ार राजÓ और 'क्रोनी कैपिटलिज़्मÓ (खास दोस्तों को फ़ायदा पहुंचाने वाला पूंजीवाद) को नकार देगी जो इस सरकार की पहचान बन गए हैं।
पिछले हफ़्ते आईआईटी दिल्ली के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान भाजपा की सोच और 'जेन •ाीÓ के न•ारिए के बीच का बुनियादी फ़र्क साफ़ दिखा। कैंपस में 'सिलेबसÓ बनाम ज़िंदगी के 'सिलेबस से बाहरÓ वाली बातों या 'जेन •ाीÓ के शब्दों जैसे 'ब्लडलाइनÓ की नकल करने से कहीं आगे बढ़कर मोदी ने ग्रेजुएट होने वाले छात्रों को बड़ी चुनौतियों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर उनका सामना करने की सलाह दी। दुनिया की मुश्किल समस्याओं पर काम करने वाले लोग जानते हैं कि इसे 'रिडक्शनिस्ट अप्रोचÓ (ची•ाों को छोटे हिस्सों में बांटकर समझने का तरीका) कहा जाता है और इसी तरीके को आज के बड़े संकटों, जैसे जलवायु परिवर्तन और इंसानियत को 'एंथ्रोपोसीनÓ (इंसानी गतिविधियों से प्रभावित दौर) के दौर में धकेलने के लिए •िाम्मेदार माना जाता है। हमारे आस-पास की ची•ाों के आपस में जुड़े होने को समझने वाले संवेदनशील नेताओं की आम राय यह है कि इसे सिस्टम के न•ारिए से समझा जाए कि दुनिया और प्रकृति कैसे काम करती है और यह देखा जाए कि एक काम का दूसरे पर क्या असर पड़ता है; तथा इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जाए। इसके साथ ही विज्ञान को बिना मूल्यों वाली दौड़ का हिस्सा न बनाते हुए उसे मानवीय और मूल्यों पर आधारित बनाया जाए। यह शायद 'जेन •ाीÓ की भाषा जैसा लग सकता है लेकिन भाजपा की समझ या शब्दावली में इसका कोई •िाक्र नहीं है।
इस नज़रिए से देखें तो 'जेन •ाीÓ शायद भाजपा-आरएसएस की वैचारिक नींव को पूरी तरह से नकारने का प्रतीक हो सकता है। बेशक, मौजूदा नेतृत्व वाली पार्टी आसानी से पीछे नहीं हटेगी क्योंकि उसके पास मुकाबला करने और अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए संसाधन हैं किन्तु नए समर्थक पाने के लिए अपनी कहानी को फिर से गढ़ने की उम्मीद कम ही है। दूसरी ओर विपक्ष और ख़ासकर राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस एक बहुत आकर्षक विकल्प के तौर पर उभर सकती है। ध्यान दें कि राहुल गांधी सहज बातचीत में माहिर हैं, ठीक वैसी बातचीत जिससे मोदी कतराते हैं। फिर भी, राहुल गांधी को मुश्किल इम्तिहानों का सामना करना होगा। इनमें से एक है झारखंड में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन में आया राजनीतिक मोड़, जहां लाठीचार्ज हुआ। झारखंड की सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही है। राहुल ने वहां पुलिस कार्रवाई की आलोचना करके अच्छा काम किया है।
कुल मिलाकर, बदले हुए राजनीतिक माहौल की कहानी को सिर्फ़ स्टाइल, भाषा या बागी युवाओं का मुद्दा समझना गलती होगी क्योंकि यह असल में हमारे समय की राजनीति के मूल स्वरूप में बदलाव का संकेत हो सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)'जेन •ाीÓ ने उस पुराने अंदा•ा को फिर से अपनाया है और सिर्फ इसी बात के लिए उनकी तारीफ़ होनी चाहिए। सिस्टम ने एक तरफ़ बहुत ज़्यादा •ाोर डाला था और अब स्प्रिंग की तरह वह वापस अपनी जगह पर आ रहा है। यह स्थिति ऐसे नेताओं के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है जिनकी सोच सत्ता, मर्दानगी और दिखावटीपन पर टिकी है। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें आज की नई पीढ़ी न तो महसूस करती है और न ही पसंद।


