आप माफ करने वाले होते कौन हैं
सबसे आखिरी छठे एपिसोड में यह दिखाया गया है कि 'माफ़ी' देने का काम कौन करता है।

सबसे आखिरी छठे एपिसोड में यह दिखाया गया है कि 'माफ़ी' देने का काम कौन करता है। वे खुद को उस सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर रहे हैं, जो माफ़ करने का हक रखता है, और जनता को प्रजा की तरह दिखाते हुए यह बता रहे हैं कि जनता को सीखना चाहिए। सीखने का मतलब मोदी के नज़रिए को ही सही माना जाए। वीडियो न सिफ़र् विरोध करने वालों की अपनी मज़ीर् या भूमिका को खत्म करता है, बल्कि यह माहौल भी बनाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या तो इतने नादान हैं कि 12 साल देश की सत्ता और लगभग इतने ही वक्त तक गुजरात की सत्ता पर काबिज रहने के बावजूद जनता की नब्ज पकड़ना नहीं जानते हैं, या फिर वे इतने चालाक हैं कि जनभावना और आकांक्षाओं को समझने के बावजूद उन्हें उपेक्षित कर केवल वही करते हैं, जो उनके मन को भाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि रेडियो पर हर महीने के अंत में जनता से संवाद के नाम पर उनका जो कार्यक्रम चलता है, उसका नाम मन की बात ही रखा गया है। क्योंकि इसमें मोदी अपने मनमुताबिक बातें ही करते हैं, संवाद तो सिरे से गायब रहता है। अब इंस्टाग्राम का इस्तेमाल मोदी तथाकथित तौर पर युवा वर्ग से जुड़ने के लिए कर रहे हैं, मगर यह भी मन की बात का विस्तारित संस्करण ही लगता है।
अभी 31 जुलाई की देर रात नरेन्द्र मोदी ने एक और इंस्टाग्राम रील अपलोड की थी। इसमें उन्होंने अभिभावक जैसा भाव अपनाते हुए उन युवा प्रदर्शनकारियों को 'माफ़' करने की मंशा जताई, जिन्होंने उनके और कथित तौर पर उनकी मां के खिलाफ गालियों का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी 'गुमराह बच्चे' थे, जिन्हें सही रास्ता दिखाने की जरूरत थी।
बेशक भाजपा के बहुत से नेता नरेन्द्र मोदी को माई-बाप सब समझते हैं, अमृता फड़नवीस ने तो उन्हें बाकायदा नए भारत का राष्ट्रपिता ही बता दिया था। लेकिन मोदी इस मुगालते में न रहें कि भाजपा नेता चापलूसी में आकर उन्हें जो उपाधि दे, वो सच ही हो। सच्चाई यही है कि नरेन्द्र मोदी इस देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं इससे ज्यादा और कुछ नहीं। प्रधानमंत्री होने के नाते उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे जनता की बात सुने, उसके सवालों का जवाब दें और अगर उसने नाराजगी में प्रधानमंत्री की आलोचना की तो उसे सहज स्वीकार भी करें।
कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बिल्कुल सही सवाल पूछा है कि 'भारत के भविष्यÓ को माफ करने का अधिकार प्रधानमंत्री को किसने दिया? उन्होंने कहा कि छात्र गंभीर पीड़ा झेल रहे हैं, उन्हें प्रधानमंत्री की माफी नहीं चाहिए। मोदी को खुद छात्रों से माफी मांगनी चाहिए। दिल्ली में एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री, उनके सहयोगियों और आरएसएस की सोच के पीछे एक 'खतरनाक और विभाजनकारी' विचार है। उनके अनुसार, यह विचार भारत की विविध पहचान, भाषाओं और इतिहास को महत्वहीन मानता है, जबकि भारत ऐसा कभी स्वीकार नहीं करेगा। राहुल गांधी ने कहा कि छात्र इसी कारण सड़कों पर हैं और वे अपने-अपने तरीके से भारत की विविध संस्कृ ति, भाषाओं और इतिहास की रक्षा कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस भारत का इतिहास नहीं बदल सकता और भारत अपने इतिहास को किसी के द्वारा भी रौंदे जाने को कभी स्वीकार नहीं करेगा।
राहुल गांधी की बात की प्रतिध्वनि ही जंतर-मंतर से लेकर देश भर में हुए प्रदर्शन में दिखाई दी है। इस आंदोलन में भाजपा की विभाजनकारी राजनीति और आडंबरों की भी जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। बेशक इसमें कुछ मौकों पर, कु छ लोगों से भाषा का स्तर गिरा है, लेकिन अब तक देश में ऐसा कानून तो बना नहीं है जिसमें अपशब्दों पर या किसी भी असभ्य टिप्पणी को आपराधिक कृत्य माना जाए। जब अनुराग ठाकुर ने गोली मारो... जैसा बेहूदा नारा मंच से लगाया था, तब भी दिल्ली उच्च न्यायालय ने मार्च 2022 में सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी कि यदि कोई बात मुस्कुराते हुए कही जाए, तो उसमें आपराधिक मंशा (अपराध बोध) नहीं मानी जा सकती। फिर किस लिए प्रदर्शनकारियों पर इस बात के लिए मामले दर्ज किए गए कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी के लिए टिप्पणियां कीं। प्रदर्शनकारियों ने तो न केवल हँसते हुए बल्कि नाचते-गाते भी नरेन्द्र मोदी को खूब सुनाया है। इसलिए सरकार को इन लोगों को स•ाा देने का कोई अधिकार नहीं है कि उन्होंने अपना गुस्सा असभ्य तरीके से जाहिर किया।
नरेन्द्र मोदी युवा प्रदर्शनकारियों को बच्चा बता कर खुद को उच्च नैतिक आदर्शों वाला बताने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन प्रदर्शनकारियों को बच्चा कहना उनकी राजनीतिक समझ को कम करने का प्रयास करना है।
दरअसल मोदी की माफ करने वाली रील इस विरोध-प्रदर्शन की गंभीरता को कम कर एक पारिवारिक ड्रामे में बदलने की कोशिश है, जो कई बार हम टीवी धारावाहिकों में देखा करते हैं। इस धारावाहिक को छह कड़ियों में बांटे तो पहले एपिसोड में मोदी गुस्से को लिंग के आधार पर चुन रहे हैं। 'हमारी बेटियों' के अपशब्दों के इस्तेमाल पर 'सांस्कृतिक सदमे' की बात वीडियो में है। उसी भीड़ में मौजूद पुरुषों द्वारा वैसी ही भाषा इस्तेमाल करने पर ऐसी कोई बात नहीं कही गई।
दूसरे एपिसोड में पितृसत्तात्मक सोच को हावी करते हुए व्यक्ति की पहचान खत्म करने की कोशिश है। 'भटके हुए बच्चों', 'बेटियों', 'मार्गदर्शन की ज़रूरत' है। यह भाषा विरोध-प्रदर्शन को बच्चों की परवरिश से जुड़ी समस्या में बदल देती है। उन्हें ऐसे लोगों के तौर पर पेश करती है जिन्हें नैतिक सुधार की जरूरत है, न कि ऐसे नागरिकों के तौर पर जो जाय•ा राजनीतिक मांग कर रहे हैं।
इस माफीनामे के तीसरे एपिसोड में माफ़ी का दिखावा और असलियत का अंतर देखा जा सकता है। एक तरफ़ माफ़ी मांगने का सार्वजनिक दिखावा किया जा रहा था, तो दूसरी तरफ़ प्रदर्शनकारियों के घर के पते, फ़ोन नंबर, काम की जगह की जानकारी और परिवार के सदस्यों के नाम भाजपा समर्थकों के जरिए सार्वजनिक किए जा रहे थे। मुंबई में हाथ से पुलिस वैन रोकने वाली प्रदर्शनकारी को धमकियां मिलीं, जिनकी शिकायत उसने साइबर सेल में की, जबकि नोएडा की एक बच्ची से वीडियो पर माफ़ी मांगने का दबाव डाला गया और अब भी उसे ट्रोल करने का सिलसिला चल रहा है। तो एक तरफ मोदी वीडियो में बड़प्पन दिखाने का काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ 'सरकारी कार्रवाई' का तंत्र भी चल रहा है।
चौथे एपिसोड में असल मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए बड़ी सुविधाजनक तरीके से शालीनता का सहारा लिया गया है। गाली-गलौज को असल मुद्दे से ज़्यादा अहमियत देकर पूरी कहानी का रुख बदलने की कोशिश दिखाई दी। क्योंकि मोदी के वीडियो में पेपर लीक के आरोपों या शिक्षा मंत्री के रुख़ और बाद में उनके इस्तीफ़े का कहीं जिक्र नहीं है, जबकि यही असली मुद्दा था जिसकी वजह से लाखों लोग सड़क पर उतरने को मजबूर हुए और उन्होंने वो सारी प्रताड़ना झेली जिसके वे बिल्कुल हकदार नहीं थे। यहां संस्थागत जवाबदेही से बड़ा मुद्दा भाषा के इस्तेमाल को बनाया गया।
इस वीडियो का पांचवां एपिसोड मोदी के व्यवहार और असलियत का फर्क बताता है। एक तरफ 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा देश में आगे बढ़ाया गया और फिर 'देश की बेटियां' वाले मुहावरे से लेकर 'अगर दांत जीभ काट लें, तो भी हम उन्हें बाहर नहीं निकालते' वाली बात कही गई। मोदी का यही पैटर्न रहा है, वे बार-बार देश को परिवार बताते हुए, खुद को नेक इरादों वाले, समझदार और सुधार करने वाले पिता या मुखिया के तौर पर पेश करते हैं। उनके नजरिए से देखें तो असहमति का मतलब गुमराह होना है, जिसके लिए उनके धैर्यपूर्ण मार्गदर्शन की जरूरत हो।
और सबसे आखिरी छठे एपिसोड में यह दिखाया गया है कि 'माफ़ी' देने का काम कौन करता है। वे खुद को उस सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर रहे हैं, जो माफ़ करने का हक रखता है, और जनता को प्रजा की तरह दिखाते हुए यह बता रहे हैं कि जनता को सीखना चाहिए। सीखने का मतलब मोदी के नज़रिए को ही सही माना जाए। वीडियो न सिफ़र् विरोध करने वालों की अपनी मज़ीर् या भूमिका को खत्म करता है, बल्कि यह माहौल भी बनाता है कि जो लोग अभी भी नाराज़ हैं, वे किसी जायज सवाल को उठाने के बजाय नेता की उदारता को देखें और अपनी मांगों को हाशिए पर धकेल दें। यह बहुत ही चालाकी भरा कदम था। लेकिन अच्छा है कि देश के युवा ने इसे पहचान लिया और अब राहुल गांधी ने सवाल उछाल ही दिया है कि आप माफ करने वाले होते कौन हैं।


