कायर कौन हैं नाटो देश या खाड़ी देश?
हार्मुज स्ट्रेट पर हमला करके उसे और ज्यादा भड़काने से बचना चाहते हैं? या खाड़ी देश? जिन्होंने डर के मारे अपनी जमीन अमेरिका के सैन्य अड्डों के लिए दे रखी है।

शकील अख्तर
राजशाही और शासकों की मनमानी नीतियों के खिलाफ अरब देशों में कई बार आवाजें उठ चुकी हैं। 15 साल पहले खाड़ी देशों में अरब स्प्रिंग के नाम से बड़ा जन आंदोलन हुआ था। लोग लोकतंत्र की मांग कर रहे थे। वह आवाजें फिर उठ सकती हैं। जनता की मर्जी के खिलाफ इजराइल अमेरिका को समर्थन देना अरब देशों को भारी पड़ सकता है। ईरान की जनता की बहादुरी मिसाल बन गई है।
कायर कौन? नाटो देश! जो युद्ध को रोकना चाहते हैं। हार्मुज स्ट्रेट पर हमला करके उसे और ज्यादा भड़काने से बचना चाहते हैं? या खाड़ी देश? जिन्होंने डर के मारे अपनी जमीन अमेरिका के सैन्य अड्डों के लिए दे रखी है। जो ईरान में मासूम बच्चों, वहां के नेताओं की टारगेट कीलिंग, गैस तेल क्षेत्रों पर हमले पर एक शब्द नहीं बोल पा रहे हैं?
ट्रंप फ्रस्टेशन में नाटो देशों को कायर कह रहे हैं मगर दुनिया अरब देशों को कायर बता रही है। जो गजा में इजराइल द्वारा किए नरसंहार के खिलाफ खड़े नहीं हो सके। और अब ईरान पर इजराइल और अमेरिका के हमलों के बाद ईरान के ही खिलाफ खड़े हो गए।
ईरान की गलती क्या है? ऐसे ही इराक रासायनिक हथियार बना रहा है कहकर अमेरिका ने उस पर हमला किया था और वहां के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी। ईरान में भी वहां के टाप सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत तमाम बड़े लीडर मार दिए और अब पूरी तरह तबाह करने की धमकी दे रहा है।
कौन है वह? दुनिया का थानेदार? किसने बनाया? स्वघोषित! अमेरिका और इजराइल की भाषा क्या है? मार डालेंगे, तबाह कर देंगे, कुछ नहीं बचेगा! यह दुनिया के सबसे पुराना लोकतंत्र की भाषा है? या गुंडों बदमाशों की!
अरब देश इस्लामिक कंट्री के नाम पर संगठन बनाते हैं। लेकिन इस्लाम के सबसे पवित्र महीने रमजान में एक इस्लामिक देश पर हुए हमलों का समर्थन करते हैं? फिर वही सवाल कि आखिर हमला क्यों? जब संयुक्त राष्ट्र सहित अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी (आईएईए) सब ईरान से बात कर रहे थे। वहां जाकर जांच हो रही थी। वहां के सुप्रीम लीडर ने परमाणु बम को मानवता के खिलाफ बताते हुए उसे बनाने से इनकार किया था फिर अचानक हमला करने और वह भी स्कूल पर जहां दो सौ के करीब बच्चियां मारी गईं का क्या मतलब?
इजराइल को सफाई देना पड़ रही है कि हमने अमेरिका को युद्ध में नहीं फंसाया। अमेरिका निकलने का रास्ता ढूंढ रहा है। लेकिन यह सब तो बाद में हुआ। ईरान के मजबूती से लड़ने के बाद। खासतौर से वहां की अवाम के पूरी हिम्मत से घरों से निकलकर सड़कों पर आ जाने के बाद।
ईरान में बंकर नहीं हैं। जैसे इजराइल ने बना रखे हैं। सायरन बजता है सब बंकरों में चले जाते हैं। इरान में बम गिरते हैं लोग सड़कों पर आ जाते हैं। यह जो जज्बा है उसने ही पूरी दुनिया में खासतौर से अमेरिका में हलचल मचा दी।
वियतनाम में यही हुआ था। अमेरिका वहां की बहादुर जनता से नहीं लड़ पाया और वापस हो गया। ट्रंप को यहां भी युद्ध खत्म करने की बात कहना पड़ रही है। वियतनाम में अमेरिका ने 1965 में हमला किया था। करीब 60 हजार सैनिक उसके मारे गए थे। जनता का भरोसा अपनी सरकार से उठ गया था। बड़े गहरे राजनीतिक और सामाजिक असर पड़े थे। अमेरिका की मीडिया और जनता ने साफ तौर कहा कि सरकार ने उन्हें गुमराह किया। जीत रहे हैं कि झूठे दावे किए गए। और सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ था कि प्रेसिडेन्ट निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था।
ट्रंप को सब याद आ गया है। अमेरिका में फिर उसके सैनिकों के ताबूत लौटने लगे हैं। वियतनाम युद्ध में भी ऐसी ही शुरूआत हुई थी। अमेरिका की जनता किसी दूसरे के युद्ध में अपने सैनिकों को खोना क्यों पसंद करेगी? ईरान से अमेरिका को कोई खतरा नहीं था। वहां के राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केन्द्र (एनसीटीसी) के निदेशक जो केंट ने अभी यही कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि अमेरिका को ईरान से कोई खतरा नहीं था। हम यह युद्ध इजराइल के लिए लड़ रहे हैं।
पूरे अमेरिका में यह माहौल बन रहा है। दुनिया में तो है ही। मगर अरब देशों के शासकों की समझ में नहीं आ रहा है। वे आंख बंद करके अमेरिका और इजराइल का साथ दे रहे हैं। लेकिन क्या वहां की जनता भी अमेरिका और इजराइल के साथ है?
सबसे बड़ा सवाल यही है। राजशाही के कारण वहां की अवाम की कोई बात दुनिया के सामने नहीं आ पाती है। मीडिया पर पूरा कंट्रोल है। लेकिन जनता की आवाज कभी भी किसी भी समय दबाई नहीं जा सकी है। खबरें आती है कि वहां जब ईरान की मिसाइलें गिर रही हैं और नुकसान हो रहा है तो लोग पूछते हैं कि इजराइल का साथ देने की हमारी क्या मजबूरी है? अगर अमेरिका हमें बचा ही नहीं पा रहा तो उसे हमारी जमीन पर सैनिक अड्डे बनाने की छूट क्यों दी गई थी? और असली सवाल कि हमारा ईरान की अवाम से क्या झगड़ा है? जो हम वहां के स्कूल की बच्चियों को मार रहे हैं, दूसरे शहरियों को मार रहे हैं। गजा में भी इसी इजराइल ने किया मासूम बच्चों को मारा। और अब हमारी जमीन से वहां मिसाइलें और ड्रोन भेजकर मार रहे हैं। क्यों?
इस क्यों का जवाब अमेरिका और इजराइल नहीं देंगे। अरब देश के शासकों को देना होगा। शासन ईरान में राजशाही का था। अंतिम पहलवी वंश का। आज उनके वारिस अमेरिका में शरणार्थी बनकर रह रहे हैं। ईरान में सत्ता का पेटर्न बदल सकता है तो अरब देशों में क्यों नहीं?
डर कर जीने से कुछ नहीं होगा। ईरान ने बता दिया कि वह डरता नहीं है। दुनिया के दो सबसे ताकतवर देशों अमेरिका इजराइल के सामने अकेला डटा हुआ है। और सोचिए रूस और चीन कब तक चुप रहेंगे?
जैसा कि ट्रंप ने धमकी दी है 48 घंटे में जबरदस्ती हार्मूज जलडमरूमध्य खोल देने की तो अगर वह ऐसा वह करता है और उस समय रूस चीन और अन्य शांति चाहने वाले देश नहीं बोले तो वर्ल्ड आर्डर पूरी तरह चेंज हो जाएगा। अमेरिका और इजराइल की वैश्विक दादागिरी कायम हो जाएगी। लेकिन यह संभव नहीं है।
पहली बात तो खुद ईरान बहुत जबर्दस्त प्रतिरोध करेगा। युद्ध बहुत खतरनाक मोड़ पर पहुंच जाएगा। और रूस एवं चीन साथ ही यूरोप के दूसरे देश भी इस तरह अमेरिका इजराइल को मनमानी नहीं करने देंगे। क्योंकि इसका सीधा मतलब होगा दुनिया का एक धु्रवीय हो जाना। यहां की जीत का मतलब फिर अमेरिका रूस से अपनी शर्तों पर यूक्रेन से समझौता करवाएगा।
इसलिए आने वाले दो दिन बहुत महत्वपूर्ण होंगे। युद्ध किसी भी सीमा तक जा सकता है। अरब देशों के लिए बड़ा संकट। अमेरिका तो ईरान से 11 हजार किलोमीटर दूर बैठा हुआ है। इजराइल भी दो हजार किलोमीटर है। आसपास तो सारे अरब देश ही लगे हैं।
राजशाही और शासकों की मनमानी नीतियों के खिलाफ अरब देशों में कई बार आवाजें उठ चुकी हैं। 15 साल पहले खाड़ी देशों में अरब स्प्रिंग के नाम से बड़ा जन आंदोलन हुआ था। लोग लोकतंत्र की मांग कर रहे थे। वह आवाजें फिर उठ सकती हैं। जनता की मर्जी के खिलाफ इजराइल अमेरिका को समर्थन देना अरब देशों को भारी पड़ सकता है।
ईरान की जनता की बहादुरी मिसाल बन गई है। अमेरिका ने हमला रीजिम चेंज (शासन बदलने) के नाम पर किया था। मगर जनता और मजबूती के साथ वर्तमान सरकार के साथ खड़ी हो गई।
सरकारों को हराया जा सकता है। जनता को कौन हरा सकता है? और ईरान की जनता का यह मैसेज दूसरे देशों की जनता में भी जा रहा है। खासतौर से अरब देशों की जनता में। वहां के शासकों को सावधान हो जाना चाहिए। अमेरिका इजराइल की गुलामी से बाहर आ जाना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


